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संपादकीय | विरोध से परिपक्वता तक

“मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है,

मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ!”

यह पंक्तियाँ केवल शायरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का घोषवाक्य हैं। आज के दौर में, जहाँ असहमति को देशद्रोह और सवाल को साज़िश मान लिया जाता है, वहाँ यह सोच एक ज़रूरी हस्तक्षेप है।

लोकतंत्र का मूल स्वभाव ही प्रश्न करना है। सत्ता, समाज और विचार—तीनों तभी स्वस्थ रहते हैं जब उन पर सवाल उठते रहें। इतिहास गवाह है कि जिन व्यवस्थाओं ने आलोचना से मुँह मोड़ा, वे आत्ममुग्धता का शिकार होकर अंततः ढह गईं। इसके उलट, जिन समाजों ने विरोध को सुना, बहस को जगह दी और असहमति को सम्मान दिया, वे समय के साथ अधिक मज़बूत हुए।

आज दुर्भाग्य यह है कि विरोध करने वाला “दुश्मन” बना दिया जाता है। असहमति रखने वाला नागरिक नहीं, बल्कि “एजेंडा” माना जाता है। सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, भाषा में शिष्टता की जगह कटुता ने ले ली है। नतीजा यह कि संवाद टूट रहा है और लोकतंत्र शोर में बदलता जा रहा है।

वास्तव में विरोधी वह आईना होता है जो हमारी कमज़ोरियाँ दिखाता है। आलोचक वह शिक्षक है जो बिना शुल्क लिए हमें बेहतर बनने का अवसर देता है। जो व्यक्ति या सत्ता अपने आलोचकों का सम्मान करना सीख लेती है, वही परिपक्व कहलाने की हक़दार होती है। आत्मविश्वास तालियों से नहीं, सवालों से बनता है।

इसलिए ज़रूरत है कि हम विरोध को सहन करना नहीं, स्वीकार करना सीखें। असहमति से डरने के बजाय उससे संवाद करें। क्योंकि जो समाज अपने “दुश्मनों” का सम्मान करना जानता है, वही वास्तव में अपने लोकतंत्र की रक्षा करता है।

आज के भारत में यह सोच सिर्फ़ साहित्यिक सौंदर्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक आवश्यकता है। विरोध से सँवरने की क्षमता ही हमें भीड़ से नागरिक और सत्ता से लोकतंत्र बनाती है।


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By udaen

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