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संपादकीय | कोटद्वार से उठता सवाल: दूसरे प्रदेशों की उपज को बाजार देने की पहल अच्छी है, लेकिन अपने खेतों, किसानों और पहाड़ की पारंपरिक फसलों का भविष्य कौन संवारेगा?

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार में मखाने की वैज्ञानिक खेती को लेकर किसानों, युवाओं और उद्यमियों को प्रशिक्षण दिया जाना एक स्वागतयोग्य पहल है। भारत सरकार के बागवानी मिशन के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम से कृषि में नए प्रयोगों और किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा का अवसर मिला है। लेकिन इस पहल के साथ एक जरूरी सवाल भी खड़ा होता है—जब बिहार के मखाने को उत्तराखंड में नई संभावनाओं के रूप में देखा जा रहा है, तो उत्तराखंड की अपनी कृषि उपज को बाजार, तकनीक और सरकारी प्रोत्साहन देने पर उतना ही जोर क्यों नहीं दिखाई देता?

मखाना बिहार की एक महत्वपूर्ण कृषि उपज है। उसकी खेती, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच ने उसे देशभर में पहचान दिलाई है। उत्तराखंड में मखाने को प्रोत्साहित करना किसी भी तरह गलत नहीं है। कृषि में नए प्रयोग होने चाहिए और किसानों को लाभ देने वाली हर संभावना का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन दूसरे प्रदेशों की सफलताओं से सीखने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हम अपनी कृषि की संभावनाओं को पीछे छोड़ दें।

गढ़वाल और कुमाऊं के खेतों में मंडुवा, झंगोरा, चौलाई, गहत, भट्ट, राजमा और अनेक पारंपरिक फसलें पैदा होती हैं। माल्टा, नींबू, बुरांश और स्थानीय जड़ी-बूटियों में भी मूल्यवर्धन तथा उद्यमिता की संभावनाएं हैं। इसके बावजूद अनेक किसानों के सामने उत्पादन से ज्यादा बड़ी चुनौती अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करना है। कहीं बाजार तक पहुंच नहीं, कहीं प्रसंस्करण की सुविधा का अभाव, तो कहीं बिचौलियों और सीमित मांग के कारण मेहनत का पर्याप्त प्रतिफल नहीं मिल पाता।

नतीजा यह है कि पहाड़ में खेती की लागत और जोखिम बढ़ने के साथ युवाओं का कृषि से मोहभंग होता है। खेत खाली होते हैं, पारंपरिक बीज और खेती का ज्ञान कमजोर पड़ता है और रोजगार की तलाश में पलायन बढ़ता है। ऐसे में केवल नई फसल का प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि किसान को उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बिक्री तक सहायता मिले।

मखाने के साथ मंडुवा-झंगोरे को भी मिले प्राथमिकता

कोटद्वार में मखाने की खेती की संभावनाओं पर विचार हो रहा है, तो इसी अवसर पर उत्तराखंड की स्थानीय फसलों के लिए भी ठोस कार्ययोजना बननी चाहिए। मंडुवा और झंगोरे से पौष्टिक खाद्य उत्पाद, गहत और भट्ट से मूल्यवर्धित खाद्य सामग्री तथा माल्टा और बुरांश से पेय पदार्थ और अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इनके लिए स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों, किसान समूहों, सहकारी समितियों और छोटे उद्यमियों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

हालांकि, हर फसल हर क्षेत्र में उपयुक्त नहीं होती। मखाने की खेती के लिए भी उपयुक्त जलक्षेत्र और वैज्ञानिक आकलन जरूरी हैं। इसलिए सरकार को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसलों का चयन करना चाहिए, न कि केवल किसी लोकप्रिय उत्पाद को नई संभावना मानकर आगे बढ़ना चाहिए।

किसानों को प्रशिक्षण ही नहीं, बाजार भी चाहिए

उत्तराखंड में कृषि नीति की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि कितने किसानों की आय बढ़ी, कितनी स्थानीय उपज का प्रसंस्करण राज्य में हुआ, कितने ग्रामीण उद्यम स्थापित हुए और कितने युवाओं को अपने गांव में रोजगार मिला।

सरकार को जिला स्तर पर स्थानीय कृषि उपज का सर्वेक्षण कराना चाहिए। जिन फसलों में उत्पादन और बाजार की वास्तविक संभावना है, उनके लिए तकनीकी प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई, भंडारण, प्रसंस्करण, विपणन और संस्थागत वित्त की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकारी खरीद, स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग और पर्यटन स्थलों पर बिक्री के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।

कोटद्वार जैसे मैदानी प्रवेशद्वार वाले शहर में पहाड़ की उपज के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन का केंद्र विकसित करने की संभावना पर भी विचार किया जाना चाहिए। इससे पर्वतीय किसानों को बड़ा बाजार मिल सकता है और स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर बन सकते हैं।

सवाल मखाने का विरोध करने का नहीं, बल्कि कृषि प्राथमिकताओं में संतुलन का है। बिहार के मखाने को उत्तराखंड में बाजार और अवसर मिलें, यह अच्छी बात है। लेकिन उत्तराखंड के मंडुवे, झंगोरे, गहत, भट्ट, माल्टा और बुरांश को भी वही महत्व मिलना चाहिए।

आखिरकार, किसी राज्य की कृषि नीति की असली सफलता इस बात में नहीं है कि वह दूसरे प्रदेशों की उपज को कितनी अच्छी तरह अपनाता है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने किसानों की मेहनत को कितना सम्मान, अपनी मिट्टी की उपज को कितना बाजार और अपने युवाओं को अपने गांव में कितने अवसर देता है।

दूसरे प्रदेशों की उपज का स्वागत हो, लेकिन अपनी मिट्टी की संभावनाओं की अनदेखी नहीं। उत्तराखंड की खेती को नई फसलों के साथ अपनी पारंपरिक ताकत के आधार पर भी आगे बढ़ाना होगा।


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By udaen

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