संवाद या संग्राम?
अमर उजाला के मंच पर कार्यक्रम था “संवाद” और सामने थे बाबा रामदेव। माहौल गंभीर चर्चा का था, शब्दों से विचारों के आदान–प्रदान का।
लेकिन जैसे ही एंकर ने बाबा रामदेव से योग करने की विनम्र गुजारिश की, संवाद ने अचानक सक्रिय योग-प्रदर्शन का रूप ले लिया।
योग करते-करते बाबा जी इतने जोश में आ गए कि शब्द पीछे छूट गए और एंकर आगे आ गए। आसन से आक्रामकता तक की यह यात्रा इतनी सहज थी कि दर्शक समझ ही नहीं पाए—यह प्राणायाम है या प्राइम टाइम का नया पंच?
बाबा रामदेव ने पूरी कोशिश की कि एंकर को “पटकी” लग जाए, मगर सौभाग्य से योग, योग ही रहा—कुश्ती नहीं बन पाया।
यहीं संवाद की असली विडंबना सामने आई।
कार्यक्रम का नाम “संवाद” था, पर मंच पर जो हुआ वह संकेतों, हरकतों और हल्के-फुल्के संघर्ष का दृश्य बन गया। सवाल यह नहीं कि योग हुआ या नहीं, सवाल यह है कि क्या मंच पर विचारों की कसरत होनी थी या शरीर की?
फिर भी, इस पूरे प्रकरण ने एक बात साफ कर दी—
आज के दौर में संवाद सिर्फ बोलने से नहीं, दिखाने से भी होता है।
बस फर्क इतना है कि दर्शक संवाद सुनने आए थे, दंगल देखकर लौटे।
कह सकते हैं—
संवाद में शरीर नहीं, विचार भिड़ने चाहिए।
