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संपादकीय | कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

देश के प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर निकलते हैं, तो वह केवल राजनयिक दौरा नहीं होता, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है। निवेश, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी—इन सबका संदेश यही होता है कि देश आगे बढ़ रहा है। इसी बीच देश और राज्यों पर बढ़ते कर्ज़ के आँकड़े भी सामने आते हैं। हैरानी यह है कि इन आँकड़ों के बावजूद व्यवस्था निर्बाध चलती रहती है। सरकारें आश्वस्त हैं, योजनाएँ जारी हैं और घोषणाओं का सिलसिला थमता नहीं।

यही दृश्य आम नागरिक के मन में एक अजीब-सा आत्मविश्वास पैदा करता है। जब देश और प्रदेश कर्ज़ लेकर विकास का दावा कर सकते हैं, तो आम आदमी भी अपने सीमित दायरे में वही तर्क अपनाने लगता है। घरेलू बजट हो या व्यक्तिगत जीवन—उधार अब संकट नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा बनता जा रहा है। फर्क सिर्फ पैमाने का है, सोच की दिशा एक जैसी होती जा रही है।

सरकारें कर्ज़ को भविष्य के निवेश के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कहा जाता है कि आज लिया गया कर्ज़ कल की समृद्धि का आधार बनेगा। पर सवाल यह है कि क्या हर कर्ज़ उत्पादक होता है? क्या हर उधार विकास में बदलता है, या फिर उसका बड़ा हिस्सा केवल व्यवस्था को चलाए रखने में खर्च हो जाता है? यही सवाल राज्यों के वित्त से लेकर आम आदमी की जेब तक समान रूप से लागू होता है।

चिंता का विषय यह नहीं है कि कर्ज़ लिया जा रहा है, बल्कि यह है कि कर्ज़ को सामान्य और अनिवार्य मान लिया गया है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कर्ज़ को सहजता से स्वीकार करते हैं, तो समाज के निचले स्तर तक यही संदेश जाता है कि उधार लेकर चलना कोई असामान्य बात नहीं। धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की जगह किस्तों की संस्कृति ले लेती है।

लोकतंत्र में सरकारें जवाबदेह होती हैं और आर्थिक फैसलों की समीक्षा ज़रूरी है। देश और राज्यों के कर्ज़ का बोझ आखिरकार जनता पर ही आता है—करों के रूप में, महंगाई के रूप में और भविष्य की सीमाओं के रूप में। इसलिए यह बहस जरूरी है कि विकास और कर्ज़ के बीच संतुलन कहाँ है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ हों या राज्यों की विकास योजनाएँ—इनका मूल्यांकन केवल प्रतीकों और भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक परिणामों से होना चाहिए। उसी तरह, आम आदमी के लिए भी यह ज़रूरी है कि वह सरकारों से मिले ‘आत्मविश्वास’ को आँख बंद कर न अपनाए।

कर्ज़ पर चलती अर्थव्यवस्था कुछ समय तक रफ्तार बनाए रख सकती है, लेकिन स्थायी प्रगति के लिए वित्तीय अनुशासन अपरिहार्य है। वरना एक दिन यह सवाल केवल सरकारों से नहीं, बल्कि हर नागरिक से पूछा जाएगा—

“चल तो रहा था, लेकिन किस कीमत पर?”


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By udaen

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