उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य के बड़े सवाल!
26 साल बाद भी पहाड़ अपने हिस्से के विकास का इंतजार क्यों कर रहा है?
संपादकीय | 5 नवंबर 2026
उत्तराखंड का गठन केवल एक नए राज्य के निर्माण की घटना नहीं थी। यह पहाड़ के लोगों के लंबे संघर्ष, बलिदान और बेहतर भविष्य की उम्मीदों का परिणाम था। आंदोलनकारियों ने अलग राज्य इसलिए नहीं मांगा था कि देहरादून में एक नई सत्ता स्थापित हो जाए, बल्कि इसलिए मांगा था कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान पहाड़ में ही हो।
9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड अस्तित्व में आया। आज 26 साल का सफर पूरा होने जा रहा है। इन वर्षों में राज्य ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है। सड़कें बनीं, बिजली उत्पादन बढ़ा, पर्यटन का विस्तार हुआ, शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों का नेटवर्क बढ़ा और अर्थव्यवस्था का आकार भी विस्तृत हुआ।
लेकिन विकास की चमक के बीच कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
आखिर उत्तराखंड के विकास का लाभ किसे मिला? पहाड़ को कितना मिला और मैदान को कितना? गांवों को कितना मिला और शहरों को कितना?
विकास के आंकड़े और जमीन की सच्चाई
सरकारें अक्सर सकल घरेलू उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय, निवेश, सड़कों और औद्योगिक विकास के आंकड़ों से अपनी उपलब्धियां बताती हैं। ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी राज्य की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन केवल आर्थिक वृद्धि से नहीं हो सकता।
यदि राज्य की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन गांवों से पलायन जारी है, स्थानीय युवाओं को अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल रहा और किसानों की आय में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा, तो विकास के मॉडल की समीक्षा जरूरी है।
नीति आयोग की उत्तराखंड संबंधी रिपोर्ट में 2022-23 के लिए बेरोजगारी दर 4.5 प्रतिशत बताई गई थी, जो उस समय राष्ट्रीय अनुमान से अधिक थी। यह आंकड़ा बताता है कि रोजगार का सवाल केवल राजनीतिक भाषणों से हल नहीं होगा।
खाली होते गांव किसकी असफलता हैं?
उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौतियों में पलायन शामिल है। पौड़ी, अल्मोड़ा, टिहरी, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे जिलों के अनेक गांवों में आबादी घटने की समस्या लंबे समय से सामने आती रही है।
सरकारी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार, 2018 से 2022 के बीच लगभग 3.07 लाख लोगों का अस्थायी पलायन हुआ। इसी अवधि में 28,531 लोगों का स्थायी पलायन दर्ज किया गया। राज्य में पहले से खाली हो चुके गांवों की संख्या भी चिंता का विषय है।
सवाल यह है कि जिन गांवों से लोग रोजगार और सुविधाओं की तलाश में बाहर जा रहे हैं, वहां विकास की योजनाएं किसके लिए बनाई जा रही हैं?
गांवों में सड़क पहुंच जाना पर्याप्त नहीं है। वहां रोजगार, स्वास्थ्य सुविधा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बाजार और सम्मानजनक जीवन के अवसर भी पहुंचने चाहिए।
सरकारी धन का हिसाब कौन देगा?
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सार्वजनिक धन का पारदर्शी और प्रभावी उपयोग करना है।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की उत्तराखंड की वर्ष 2023-24 की राज्य वित्त रिपोर्ट को 10 मार्च 2026 को विधानसभा में प्रस्तुत किया गया। इसमें राज्य के बजट प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन और सार्वजनिक व्यय से जुड़े विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की गई है।
इसी तरह मनरेगा के वर्ष 2019-24 के प्रदर्शन ऑडिट में सामने आया कि राज्य में पंजीकृत परिवारों को औसतन साल में केवल 21 दिन का रोजगार मिला। केवल एक से चार प्रतिशत परिवारों को अलग-अलग वर्षों में पूरे 100 दिन का रोजगार उपलब्ध हो सका।
यह आंकड़ा पहाड़ के ग्रामीण रोजगार की वास्तविक चुनौती को समझने के लिए पर्याप्त है।
जब गांव का मजदूर काम मांग रहा हो और रोजगार की कानूनी गारंटी पूरी न हो पा रही हो, तब योजनाओं के बजट खर्च होने भर को सफलता कैसे माना जा सकता है?
सत्ता और व्यवस्था से पांच बड़े सवाल
उत्तराखंड में सरकारें बदलती रहीं। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समय में विकास के दावे किए। लेकिन अब राज्य की जनता को घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाब चाहिए।
- राज्य गठन के बाद पहाड़ी जिलों में स्थायी रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए?
- पलायन रोकने के लिए खर्च किए गए सरकारी धन का स्वतंत्र मूल्यांकन कब होगा?
- जल, जंगल और जमीन से प्राप्त आर्थिक लाभ में स्थानीय समुदायों की हिस्सेदारी कितनी है?
- सरकारी भर्तियों, ठेकों और भूमि आवंटन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था बनी?
- राज्य के बजट का कितना हिस्सा वास्तव में दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार पर खर्च हुआ?
इन सवालों का जवाब किसी एक सरकार को नहीं, बल्कि राज्य गठन के बाद सत्ता में रही सभी सरकारों को अपने-अपने कार्यकाल के संदर्भ में देना चाहिए।
क्या गैरसैंण केवल प्रतीक बनकर रह जाएगा?
उत्तराखंड आंदोलन में गैरसैंण का महत्व केवल भौगोलिक नहीं था। यह पहाड़ की आकांक्षाओं और सत्ता को जनता के करीब लाने की सोच का प्रतीक था।
राजधानी और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का प्रश्न आज भी राज्य की राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या पहाड़ की समस्याओं को समझने के लिए पहाड़ में मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की गई? क्या दूरस्थ जिलों में अधिकारियों की उपलब्धता और जवाबदेही सुनिश्चित हुई? क्या गांवों को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी मिली?
राज्य का निर्माण तभी सार्थक होगा जब शासन की पहुंच अंतिम गांव तक होगी।
अब उत्सव नहीं, आत्ममंथन का समय
उत्तराखंड ने 26 वर्षों में उपलब्धियां भी हासिल की हैं और अनेक चुनौतियां भी विरासत में पाई हैं। इन उपलब्धियों को नकारना उचित नहीं, लेकिन कमियों पर पर्दा डालना भी राज्य के भविष्य के साथ न्याय नहीं होगा।
यह समय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही तय करने का है।
सरकार को प्रत्येक जिले के विकास का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक करना चाहिए। विधानसभा में पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। CAG की आपत्तियों पर कार्रवाई की स्थिति जनता के सामने रखी जानी चाहिए।
राज्य की जनता को यह अधिकार है कि वह अपने प्रतिनिधियों से पूछे कि उसके नाम पर लिए गए फैसलों से उसके जीवन में क्या बदलाव आया।
उत्तराखंड का निर्माण किसी एक राजनीतिक दल की उपलब्धि नहीं, बल्कि यहां के लोगों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम है।
इसलिए 9 नवंबर को केवल स्थापना दिवस का उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह भी पूछना होगा कि जिन सपनों के लिए उत्तराखंड बना था, उनमें से कितने सपने पूरे हुए और कितने आज भी अधूरे हैं।
क्योंकि राज्य की असली सफलता सचिवालय की इमारतों, बजट के आकार या विकास के विज्ञापनों से नहीं, बल्कि उस पहाड़ी परिवार की जिंदगी से मापी जाएगी, जिसे अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए अपना गांव छोड़ने की मजबूरी न हो।
उत्तराखंड का सवाल केवल विकास का नहीं, विकास में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी का भी है। यही 26 वर्षों के सफर का सबसे बड़ा आत्ममंथन होना चाहिए।
