रक्षासूत्र आंदोलन से बचाए 14 लाख से अधिक पेड़, जल-जंगल-जमीन और हिमालय की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया
उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण, वन बचाओ आंदोलन और हिमालय की पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए दशकों से सक्रिय पर्यावरणविद् सुरेश भाई को उत्तराखंड गौरव सम्मान 2026 से सम्मानित किया जाएगा। टिहरी जनपद के निवाल गांव में जन्मे सुरेश भाई ने अपना जीवन जल, जंगल, जमीन, नदियों और हिमालय के संरक्षण के लिए समर्पित किया है।
सुरेश भाई का पर्यावरण संरक्षण से जुड़ाव बचपन से ही सर्वोदय कार्यकर्ताओं के संपर्क में आने के बाद बढ़ा। शिक्षा पूरी करने के बाद वे लोक जीवन विकास भारती से जुड़े और वर्ष 1984 से 1994 तक उत्तराखंड के करीब 5,000 गांवों में पदयात्रा कर शराबबंदी और वन संरक्षण के लिए जनजागरण अभियान चलाया।
रक्षासूत्र आंदोलन से बचाए 14 लाख से अधिक पेड़
वर्ष 1993-94 में टिहरी और उत्तरकाशी जनपद के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वनों के व्यावसायिक कटान को रोकने के लिए उन्होंने रक्षासूत्र आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन में हजारों महिलाओं ने कटान प्रभावित जंगलों में पहुंचकर पेड़ों को रक्षासूत्र बांधे और उनके संरक्षण का संकल्प लिया। इस जनभागीदारी के परिणामस्वरूप अब तक 14 लाख से अधिक पेड़ों को बचाए जाने का दावा किया जाता है।
यह आंदोलन चिपको आंदोलन की पर्यावरण संरक्षण परंपरा को आगे बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण जनपहल के रूप में देखा जाता है।
जल, जंगल और नदियों के संरक्षण के लिए नीतिगत पहल
वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से सुरेश भाई प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संतुलित विकास के लिए नीतिगत स्तर पर भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने लोक जल नीति, लोक पुनर्वास नीति, उत्तराखंड विकास का दस्तावेज और हिमालय लोक नीति जैसे दस्तावेज तैयार कर केंद्र और राज्य सरकारों को सुझाव दिए।
उत्तराखंड के पूर्व मंत्री प्रकाश पंत और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में लोक जल नीति के आधार पर राज्य की जल नीति तैयार करने की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई थी।
नदी बचाओ अभियान से जलविद्युत परियोजनाओं पर बहस
वर्ष 2008 में उन्होंने उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान शुरू किया। इस अभियान ने नदियों के अविरल प्रवाह, जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव और हिमालयी पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सवालों को व्यापक स्तर पर उठाया। अभियान के चलते राज्य में एक दर्जन से अधिक सुरंग आधारित जलविद्युत परियोजनाओं को रोकने की पहल और निर्णयों का मार्ग प्रशस्त होने की बात कही जाती है।
वर्ष 2013 में देहरादून के निकट छरबा गांव की पंचायत के साथ मिलकर उन्होंने गांव के लोगों द्वारा पाले गए 2,000 से अधिक पेड़-पौधों वाले जंगल को प्रस्तावित कोका-कोला प्लांट से बचाने के लिए जनआंदोलन किया। ग्रामीणों के विरोध के बाद वहां प्लांट स्थापित नहीं हो सका।
हिमालय नीति के लिए गंगोत्री से गंगासागर तक यात्रा
हिमालय के संरक्षण के लिए अलग हिमालय नीति बनाने की मांग को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के उद्देश्य से सुरेश भाई ने 14 अक्टूबर 2014 से फरवरी 2015 तक गंगोत्री से गंगासागर तक यात्रा की।
इस दौरान हिमालय के विषय को संसद में उठाया गया। प्रधानमंत्री को 50 हजार से अधिक हस्ताक्षरों वाला हिमालय नीति संबंधी दस्तावेज सौंपा गया तथा नीति आयोग में भी इस विषय पर बैठक हुई।
हिमालय की आवाज को व्यापक जनसमर्थन दिलाने के प्रयासों में वे हिमालय दिवस की शुरुआत से जुड़े रहे हैं। प्रत्येक वर्ष 9 सितंबर को मनाए जाने वाले हिमालय दिवस के प्रारंभिक सदस्यों में उनका नाम शामिल है।
हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान की स्थापना
सुरेश भाई ने वर्ष 1994 में हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान की स्थापना की। वर्तमान में वे जल, जंगल, जमीन, जलवायु परिवर्तन, किसानों की आजीविका तथा महिलाओं और बच्चों के अधिकारों जैसे विषयों पर सक्रिय हैं। वे हिंदी समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठों पर भी नियमित रूप से इन मुद्दों को उठाते रहते हैं।
हाल के वर्षों में गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर देवदार के पेड़ों को बचाने के लिए तीन बार रक्षासूत्र आंदोलन किया गया। इसके बाद सड़क चौड़ीकरण में 7,000 से अधिक पेड़ों को काटने के प्रस्ताव के स्थान पर न्यूनतम आवश्यक पेड़ों के कटान की सूचना सामने आई।
उनका संदेश है—
ऊंचाई पर पेड़ रहेंगे,
नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे।
पेड़ कटेंगे, पहाड़ टूटेंगे,
बिना मौत के लोग मरेंगे।
जंगल बचेगा, देश बचेगा,
गांव-गांव खुशहाल रहेगा।
वर्ष 2023, 2024 और 2025 की आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों का भ्रमण कर उन्होंने जलवायु परिवर्तन और आपदा के कारणों तथा प्रभावों पर अनेक लेख और रिपोर्ट प्रकाशित कीं। इन विषयों पर उनके सुझावों के बाद केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संबंधित विभागों को कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
अब तक मिले प्रमुख सम्मान
पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में योगदान के लिए सुरेश भाई को अब तक विभिन्न संस्थाओं और संगठनों द्वारा सम्मानित किया गया है। इनमें प्रमुख हैं—
- दून श्री सम्मान – 2008
- तरुण भारत पर्यावरण रक्षण सम्मान – 2013
- नदी मित्र पुरस्कार – 2013-14
- बीना स्मृति पर्यावरण सम्मान – 2010
- भागीरथी पुरस्कार – 2017
- कमलाराम नौटियाल स्मृति सम्मान – 2017
- सुंदरलाल बहुगुणा स्मृति पर्यावरण भूषण सम्मान – 2022
- चिपको नेत्री गौरा देवी सम्मान – 2022
- ईएसडीए पर्यावरण विभूषण अवार्ड – 2022
- गौरा देवी स्मृति सम्मान – 2024
- समलौंण सम्मान – 2024
- बदलाव के पुरोधा सम्मान – 2024
- राष्ट्रीय पर्यावरण सेवी सम्मान – 2024
- बदलाव के पौधा सम्मान – 2024
- जेपी इंटरनेशनल अवॉर्ड – 2024
- उत्तराखंड रजत वर्ष सम्मान – 2025
- ग्लोबल ग्रीन वॉरियर सम्मान – 2025
- उत्तराखंड सरकार का वरिष्ठ नागरिक सम्मान – 30 अप्रैल 2026
हिमालयी पर्यावरण संरक्षण के लिए दशकों से जारी उनका संघर्ष उत्तराखंड की उस जनचेतना का प्रतीक है, जो विकास के साथ प्रकृति के संतुलन को भी जरूरी मानती है। रक्षासूत्र आंदोलन से लेकर हिमालय नीति की मांग तक सुरेश भाई का सफर बताता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी और निरंतर जनजागरण से भी संभव है।
उत्तराखंड गौरव सम्मान के लिए उनका चयन उन लोगों के योगदान को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने अपने कार्यों से राज्य की प्राकृतिक विरासत और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की चिंता को निरंतर जीवित रखा है।
