Reforms 3.0: देश को सुधारने से पहले क्या सरकार अपनी कार्यशैली बदलेगी?
आर्थिक विकास के आंकड़े चमकदार हो सकते हैं, लेकिन क्या उनका लाभ आम नागरिक, छोटे उद्यमियों और रोजगार तलाश रहे युवाओं तक पहुंच रहा है?
भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर को लेकर सरकार के पास उपलब्धियां गिनाने के लिए आंकड़ों की कमी नहीं है। तेज आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। लेकिन किसी देश की आर्थिक सफलता का मूल्यांकन केवल जीडीपी की वृद्धि से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि इस विकास में आम आदमी की हिस्सेदारी कितनी है और आर्थिक व्यवस्था में अवसरों की समानता कितनी है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कॉरपोरेट क्षेत्र की कार्यप्रणाली, प्रतिस्पर्धा, उत्पादकता और कारोबारी वातावरण से जुड़े कुछ सवालों ने इसी बहस को नया आधार दिया है। राजनीतिक विचारक और स्तंभकार प्रताप भानु मेहता ने अपने विश्लेषण में सरकार की आर्थिक और प्रशासनिक सुधार नीति पर सवाल उठाते हुए एक बुनियादी मुद्दा उठाया है—क्या भारत में सुधार केवल नीतियों और नारों तक सीमित हैं या प्रशासनिक व्यवस्था की सोच भी बदल रही है?
विकास बनाम आर्थिक अवसरों की असमानता
भारत में आर्थिक विकास के बावजूद छोटे उद्यमियों, लघु उद्योगों और स्वरोजगार से जुड़े लोगों की चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। बड़े उद्योगों के लिए निवेश, संसाधन और नीतिगत सुविधाएं जुटाने की व्यवस्था अपेक्षाकृत आसान हो सकती है, लेकिन छोटे उद्यमी को लाइसेंस, बैंक ऋण, विभागीय मंजूरी, अनुपालन और बाजार तक पहुंच बनाने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
सवाल यह है कि क्या आर्थिक सुधारों का उद्देश्य केवल बड़े निवेश को आकर्षित करना है या उस व्यक्ति को भी आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है, जो अपने गांव या छोटे शहर में रोजगार का एक अवसर पैदा करना चाहता है?
यदि एक छोटा उद्यमी सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाता है, तो ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का वास्तविक अर्थ उसके लिए क्या रह जाता है?
प्रशासनिक सुधार या नियंत्रण का विस्तार?
सरकारी व्यवस्था में सुधार का अर्थ केवल नए पोर्टल, डिजिटल प्रक्रियाएं और नियमों में संशोधन नहीं है। वास्तविक सुधार तब होगा जब प्रशासन नागरिकों और उद्यमियों पर अनावश्यक संदेह करने के बजाय उन पर भरोसा करना सीखे।
भारत में नियमों की संख्या और प्रक्रियाओं का बोझ कई बार उस उद्देश्य से भी बड़ा हो जाता है, जिसके लिए उन्हें बनाया गया था। छोटे कारोबारी को गलती सुधारने का अवसर देने के बजाय दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही के नाम पर अनावश्यक नियंत्रण भी उचित नहीं है।
यहीं Reforms 3.0 की वास्तविक परीक्षा है।
केंद्रीकरण से नहीं, विकेंद्रीकरण से मजबूत होगा लोकतंत्र
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में हर समस्या का समाधान दिल्ली या राज्य की राजधानी में बैठकर नहीं निकाला जा सकता। गांव, नगर निकाय और स्थानीय संस्थाएं अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं को बेहतर समझती हैं।
इसके बावजूद अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए स्थानीय निकायों को उच्च स्तर की स्वीकृति पर निर्भर रहना पड़ता है। पंचायतों और नगर निकायों को जिम्मेदारियां तो दी जाती हैं, लेकिन उनके अनुरूप वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार नहीं मिलते।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह समस्या और महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां पलायन, बेरोजगारी, कृषि की घटती आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरी जैसी चुनौतियों का समाधान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ही संभव है।
यदि किसी गांव में कृषि आधारित उद्यम, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन या स्थानीय उत्पादों के कारोबार की संभावना है, तो वहां के उद्यमी को सरकारी प्रक्रियाओं में उलझाने के बजाय उसे सहयोग देने की व्यवस्था होनी चाहिए।
सुधार का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कब पहुंचेगा?
देश की आर्थिक नीतियों की सफलता का आकलन कुछ सीधे सवालों से होना चाहिए।
क्या युवाओं को पर्याप्त रोजगार मिल रहा है? क्या छोटे उद्योग बड़े कारोबारियों के साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा कर पा रहे हैं? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश और उद्यमिता बढ़ रही है? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद तक पहुंच रहा है? क्या नागरिक को सरकारी कार्यालय में सम्मान और समय पर सेवा मिल रही है?
यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े विकास की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर सकते।
सरकार को अब आत्ममंथन करना होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने आर्थिक सुधारों और प्रशासनिक बदलावों के अनेक प्रयास किए हैं। इन प्रयासों की उपलब्धियों को नकारना उचित नहीं होगा। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सफलता इस बात में भी है कि वह आलोचना को सुने और अपनी नीतियों की कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस दिखाए।
Reforms 3.0 को यदि वास्तव में बदलाव का तीसरा चरण बनना है, तो उसे सरकारी तंत्र की जवाबदेही, संस्थागत स्वतंत्रता, स्थानीय स्वशासन, छोटे उद्यमियों के अधिकार और नागरिकों के प्रति प्रशासनिक व्यवहार को केंद्र में रखना होगा।
देश को केवल ऐसी सरकार की जरूरत नहीं है जो विकास के आंकड़े प्रस्तुत करे, बल्कि ऐसी व्यवस्था की भी जरूरत है जो नागरिकों को विकास में भागीदार बनाए।
आखिरकार आर्थिक सुधारों की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि सरकार ने कितने नए नियम बनाए या कितनी योजनाएं शुरू कीं, बल्कि इससे तय होगी कि आम नागरिक के जीवन से कितनी बाधाएं कम हुईं।
Reforms 3.0 का असली अर्थ देश को बदलने से पहले शासन करने के तरीके को बदलना होना चाहिए।
