Category: Editorial

₹22 हजार करोड़ बनाम ₹6.5 करोड़: आम आदमी के लिए कर्ज का बोझ, बड़े कॉरपोरेट के लिए ‘हेयरकट’?

भारत की बैंकिंग और दिवालियापन व्यवस्था के सामने शायद इससे बड़ा सार्वजनिक सवाल हाल के वर्षों में कम ही आया…

आखिर खनिज किसके हैं?—उत्तराखंड में पहाड़, खनिज और अधिकार की नई लड़ाई

संपादकीय: आखिर खनिज किसके हैं?—उत्तराखंड में पहाड़, खनिज और अधिकार की नई लड़ाई उत्तराखंड को हम देवभूमि कहते हैं। लेकिन…

प्रशांत किशोर, बिहार की राजनीति और ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ की बहस: तथ्य, आशंकाएँ और लोकतंत्र की कसौटी

बिहार की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर का…

संपादकीय: क्या नरेंद्र मोदी एक महान नेता हैं, या भारत के सबसे सफल राजनीतिक ऑर्गेनाइज़र?

भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का नाम पिछले एक दशक से अधिक समय से सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में गिना जाता…

पत्रकारिता का संकट: क्या कलम सचमुच स्वतंत्र है, या स्वतंत्र होने का भ्रम बचा है?

“लोकतंत्र का चौथा स्तंभ”—यह उपाधि किसी संविधान की धारा में लिखी हुई नहीं है, फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिता…