Spread the love

शुद्धिकरण यज्ञ या सियासी अशुद्धता?

हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद रामलीला मैदान में किए गए कथित ‘शुद्धिकरण यज्ञ’ ने उत्तराखंड की राजनीति को एक बार फिर उस सवाल के सामने खड़ा कर दिया है, जिससे आधुनिक भारत को बहुत पहले आगे निकल जाना चाहिए था—किसी व्यक्ति को उसकी जाति, विचार या राजनीतिक पहचान के आधार पर ‘शुद्ध’ या ‘अशुद्ध’ मानने का अधिकार आखिर किसे है?

श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से यज्ञ और गंगाजल छिड़कने को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। संगठन का कहना है कि यह कार्रवाई खरगे की जाति के कारण नहीं, बल्कि उनके कथित सनातन-विरोधी बयानों और रैली में लगे नारों के विरोध में थी। कांग्रेस ने इसे दलित नेता का अपमान और सामाजिक भेदभाव बताया है। भाजपा ने इस आयोजन से पार्टी का संबंध होने से इनकार किया है और जांच की बात कही है।

लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू राजनीतिक दलों से भी आगे जाता है।

भारत का संविधान किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान को उसकी गरिमा का पैमाना नहीं मानता। लोकतंत्र में किसी नेता के विचारों का विरोध कीजिए, उसके भाषण पर सवाल उठाइए, उसकी नीतियों की आलोचना कीजिए, उसके खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाइए—लेकिन किसी व्यक्ति को ‘अशुद्ध’ ठहराने की मानसिकता लोकतांत्रिक असहमति नहीं हो सकती।

और यदि ‘शुद्धिकरण’ शब्द का इस्तेमाल वास्तव में किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान को लेकर किया गया है, तो मामला और गंभीर हो जाता है। क्योंकि फिर यह केवल कांग्रेस बनाम भाजपा का विवाद नहीं रहता, बल्कि सामाजिक बराबरी और संवैधानिक मूल्यों का प्रश्न बन जाता है।

विडंबना देखिए—उत्तराखंड स्वयं सामाजिक परिवर्तन और जनआंदोलनों की धरती रहा है। यहां पहाड़ की जनता ने जंगल, जमीन, पानी और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। महिलाओं ने शराब के खिलाफ आंदोलन किया। ग्रामीण समाज ने अपने संसाधनों पर अधिकार की आवाज उठाई। ऐसे प्रदेश में यदि राजनीति फिर जातिगत शुद्धता-अशुद्धता की भाषा में लौटती है, तो यह केवल राजनीतिक पतन नहीं, सामाजिक चेतना के लिए भी चेतावनी है।

धर्म आस्था का विषय है; राजनीति जनसेवा का। दोनों का अपना सम्मान है। लेकिन जब धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधी को सामाजिक रूप से नीचा दिखाने के लिए होने लगे, तब धर्म भी राजनीति के हाथों में एक हथियार बन जाता है और राजनीति भी समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने लगती है।

खरगे का विरोध करना है तो उनके विचारों का विरोध होना चाहिए। यदि उन्होंने कोई आपत्तिजनक बात कही है तो उसके प्रमाण सामने रखे जाने चाहिए। यदि रैली में कोई आपत्तिजनक नारा लगा है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में जवाब तर्क, तथ्य और कानून से दिया जाता है—‘शुद्धिकरण’ से नहीं।

दूसरी तरफ कांग्रेस को भी इस घटना को केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने के बजाय तथ्य सामने रखने चाहिए। यदि वास्तव में जातिगत आधार पर अपमान किया गया है, तो दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग होनी चाहिए। लेकिन हर धार्मिक अनुष्ठान को स्वतः जातिगत भेदभाव बताना भी उचित नहीं होगा। जांच के बाद तथ्य स्पष्ट होने चाहिए।

उत्तराखंड को ऐसी राजनीति की जरूरत नहीं है जिसमें मंदिर, मैदान और धार्मिक प्रतीक चुनावी संघर्ष के अखाड़े बन जाएं। पहाड़ पहले ही पलायन, बेरोजगारी, आपदा, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण जैसे गंभीर सवालों से जूझ रहा है। जनता को नेताओं से यह जवाब चाहिए कि उनके गांव खाली क्यों हो रहे हैं, युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा, पहाड़ों में स्कूल और अस्पताल क्यों कमजोर हो रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों तक क्यों नहीं पहुंच रहा।

रामलीला मैदान का शुद्धिकरण हुआ या नहीं, यह जांच का विषय है। लेकिन राजनीति के भीतर बढ़ती कटुता और सामाजिक विभाजन का शुद्धिकरण जरूर जरूरी है।

लोकतंत्र में विरोधी को हराया जाता है, अपवित्र घोषित नहीं किया जाता।

और यही अंतर एक सभ्य लोकतंत्र और भीड़ की राजनीति के बीच की सबसे महत्वपूर्ण रेखा है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *