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मीडिया की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का आधार और मौलिक अधिकारों की अभिव्यक्ति माना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि दुनिया भर में सच सामने लाने और सत्ता से सवाल पूछने वाले पत्रकारों को आज भी धमकियों, हिंसा, मुकदमों, ऑनलाइन उत्पीड़न, अवैध निगरानी और जेल तक का सामना करना पड़ रहा है। कई पत्रकार अपनी जान तक गंवा चुके हैं। ऐसे में सवाल केवल पत्रकारों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों के जानने के अधिकार को बचाने का भी है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने 2 नवंबर को पत्रकारों के खिलाफ अपराधों में दंडमुक्ति समाप्त करने के अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पत्रकार सच बताने की कीमत असाधारण रूप से चुका रहे हैं। पत्रकारों को उनके काम के कारण प्रताड़ित किया जाता है, उन पर निगरानी रखी जाती है, मुकदमे किए जाते हैं, शारीरिक हमले होते हैं और उन्हें जेल में डाला जाता है। कई मामलों में यातना और हत्या तक की घटनाएं सामने आती हैं।

गुटेरेस का स्पष्ट संदेश था कि पत्रकारों के काम में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र पत्रकारिता मानवाधिकारों, लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए बुनियादी महत्व रखती है।

यह बयान केवल एक अंतरराष्ट्रीय औपचारिक संदेश नहीं, बल्कि दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है। आखिर पत्रकारिता का उद्देश्य क्या है? क्या पत्रकार का काम केवल सरकारी घोषणाओं, उपलब्धियों और आयोजनों को प्रकाशित करना है या फिर उन सवालों को भी उठाना है जिनके जवाब सत्ता और व्यवस्था से मांगे जाने चाहिए?

वैश्विक प्रयास और जमीनी चुनौतियां

पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र मीडिया को मजबूत करने के लिए यूरोपीय संघ की पहल भी उल्लेखनीय है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 56 देशों में 100 से अधिक परियोजनाएं शुरू की गई हैं। जोखिम का सामना कर रहे लगभग 13 हजार पत्रकारों को प्रत्यक्ष सहायता दी गई है, जिनमें अकेले वर्ष 2025 में 686 पत्रकार शामिल हैं।

यूरोपीय संघ में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए यूरोपीय मीडिया स्वतंत्रता अधिनियम (European Media Freedom Act) भी लागू किया गया है।

ये प्रयास बताते हैं कि पत्रकारों की सुरक्षा को केवल पत्रकार संगठनों की समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय माना जा रहा है।

हालांकि, कानून बनाना और सहायता परियोजनाएं चलाना पर्याप्त नहीं है। असली कसौटी यह है कि पत्रकारों पर हमले होने पर कितनी निष्पक्ष जांच होती है, दोषियों को कितनी सजा मिलती है और पत्रकार बिना भय के अपना काम कितनी स्वतंत्रता से कर पाते हैं।

भारत में भी प्रासंगिक हैं ये सवाल

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है।

विशेषकर जिला, तहसील और ग्रामीण स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों की परिस्थितियां अलग हैं। सीमित संसाधन, आर्थिक असुरक्षा, संस्थागत संरक्षण का अभाव और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों के दबाव जैसी चुनौतियां उनके काम को प्रभावित कर सकती हैं।

कई बार प्रशासनिक अव्यवस्थाओं, भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं में अनियमितताओं, भूमि विवादों, पर्यावरणीय नुकसान और जनहित के मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को व्यक्तिगत विरोध और दबाव का सामना करना पड़ता है।

यह भी समझना होगा कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ किसी को निराधार आरोप लगाने या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की छूट देना नहीं है। स्वतंत्रता के साथ तथ्यात्मकता, निष्पक्षता और जवाबदेही भी जरूरी हैं। लेकिन आलोचना को अपराध मानना और सवाल पूछने वाले पत्रकार को निशाना बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं हो सकता।

पत्रकारिता कमजोर होगी तो नागरिकों का अधिकार भी कमजोर होगा

लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाओं की जवाबदेही और जनता का सूचना पाने का अधिकार स्थायी महत्व रखते हैं। पत्रकार इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

जब कोई पत्रकार किसी सड़क, अस्पताल, स्कूल, वन क्षेत्र, सरकारी योजना या स्थानीय प्रशासन की विफलता पर सवाल उठाता है, तो वह केवल एक समाचार नहीं लिख रहा होता, बल्कि उन नागरिकों की आवाज बन रहा होता है जिनकी शिकायतें अक्सर व्यवस्था तक नहीं पहुंच पातीं।

इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा को केवल मीडिया उद्योग या पत्रकार संगठनों का आंतरिक विषय मानना एक बड़ी भूल होगी।

जरूरत है कि पत्रकारों के खिलाफ हिंसा और धमकियों की शिकायतों पर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई हो। पत्रकारों पर हमलों की जांच प्रभावी ढंग से हो, दोषियों को कानून के अनुसार सजा मिले और पत्रकारों को डिजिटल निगरानी, ऑनलाइन उत्पीड़न तथा संस्थागत दबाव से सुरक्षा मिले। साथ ही, छोटे समाचार पत्रों और स्वतंत्र पत्रकारों की आर्थिक एवं संस्थागत स्थिति को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया जाए।

अंततः सवाल सत्ता से नहीं, जवाबदेही से है

पत्रकारिता का धर्म किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि जनता के पक्ष में खड़े होकर तथ्यों को सामने लाना है। सत्ता से सवाल पूछना लोकतंत्र विरोधी गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जीवंत रखने की प्रक्रिया है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव का संदेश हमें याद दिलाता है कि पत्रकारों की सुरक्षा केवल पत्रकारों के हित में नहीं, बल्कि उस समाज के हित में है जो सच जानना चाहता है।

जिस लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले असुरक्षित हों, वहां जवाबदेही कमजोर होने का खतरा हमेशा बना रहता है। पत्रकार की कलम पर भय का पहरा अंततः नागरिकों के सूचना के अधिकार पर पहरा बन जाता है।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पत्रकार सत्ता से सवाल क्यों पूछते हैं, बल्कि यह होना चाहिए कि पत्रकारों को सवाल पूछने की स्वतंत्रता और सुरक्षा देने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

क्योंकि पत्रकार सुरक्षित होंगे, तभी सच सुरक्षित रहेगा और सच सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा।


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By udaen

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