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थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति

जब वैश्विक कूटनीति व्यापार, शुल्क और समझौतों की भाषा बोलती है, तब कभी-कभी एक थाली भी वही बात उससे अधिक प्रभावशाली ढंग से कह देती है। 27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय संघ (EU) के नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज ऐसा ही एक मौन लेकिन गहरा संवाद था—संस्कृति, प्रकृति और आत्मनिर्भर भारत का संवाद।

इस भोज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें किसी आयातित लक्ज़री या पश्चिमी व्यंजनों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारतीय हिमालय की मिट्टी, मौसम और परंपरा से जन्मे स्वाद थे। कश्मीर से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर तक—पूरा हिमालय मानो एक थाली में सिमट आया हो।

यह मेन्यू केवल भोजन नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था—

👉 भारत अपनी पहचान को छुपाकर नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के साथ वैश्विक मंच पर खड़ा है।

आज जब विकास को अक्सर प्रकृति के विरोध में खड़ा कर दिया जाता है, तब यह हिमालयी मेन्यू पहाड़ी समाज की उस समझ को सामने लाता है, जहाँ भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का तरीका है। जखिया आलू, थिचोनी, गुच्छी मशरूम, जंगली साग, रागी और मिलेट—ये सब उस जीवन दर्शन के प्रतीक हैं जो कम संसाधनों में संतुलन सिखाता है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि इस मेन्यू को युवा भारतीय शेफ्स ने रचा—जो परंपरा को “म्यूज़ियम की चीज़” नहीं, बल्कि जीवित और प्रासंगिक ज्ञान मानते हैं। उन्होंने भारतीय भोजन को बदले बिना, उसकी प्रस्तुति को वैश्विक भाषा दी। यह आत्मविश्वास का संकेत है, न कि अनुकरण का।

दरअसल, यह राजकीय भोज भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का सटीक उदाहरण है। जिस समय FTA जैसे समझौतों में आर्थिक लाभ-हानि की गणनाएं चल रही थीं, उसी समय भारत ने यह भी दिखाया कि वह केवल बाज़ार नहीं, बल्कि सभ्यता भी है।

हिमालयी व्यंजनों की यह थाली यूरोपीय नेताओं के लिए सिर्फ स्वाद का अनुभव नहीं थी, बल्कि एक संकेत भी थी—

कि भारत के विकास मॉडल में प्रकृति, परंपरा और समुदाय हाशिये पर नहीं, केंद्र में हैं।

शायद यही असली आत्मनिर्भरता है—

जब आप दुनिया से संवाद करते हैं, लेकिन अपनी आवाज़ में।

और उस आवाज़ में, हिमालय की ख़ामोशी भी सुनाई देती है।


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By udaen

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