हजारों साल पहले भी मनुष्य था, उसकी आस्था थी, प्रकृति के प्रति श्रद्धा थी और जीवन-मृत्यु को लेकर जिज्ञासा थी। फिर धर्मों का जन्म कैसे हुआ? क्या धर्म मनुष्य ने बनाए या मनुष्य ने धर्मों के माध्यम से ईश्वर को समझने की कोशिश की?
आज दुनिया में धर्म के नाम पर करोड़ों लोगों की पहचान है। कोई सनातनी है, कोई बौद्ध, कोई जैन, कोई मुस्लिम, कोई ईसाई तो कोई सिख। हर धर्म की अपनी मान्यताएं, परंपराएं, ग्रंथ, उपासना पद्धतियां और जीवन-दर्शन हैं। लेकिन कभी हमने यह सोचने की कोशिश की है कि इन धर्मों के अस्तित्व में आने से पहले मनुष्य क्या था? उसकी पहचान क्या थी? वह किसकी पूजा करता था और जीवन को किस तरह समझता था?
इतिहास की ओर देखें तो लगभग पांच हजार साल पहले भी दुनिया में विकसित सभ्यताएं मौजूद थीं। सिंधु घाटी, मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं में धार्मिक विश्वास, प्रकृति से जुड़े अनुष्ठान और मृत्यु के बाद जीवन की कल्पनाएं थीं। उससे भी हजारों साल पहले के मानव समाज में प्रकृति, पूर्वजों और अदृश्य शक्तियों से जुड़ी मान्यताओं के प्रमाण मिलते हैं।
अर्थात धर्म से पहले भी आस्था थी, लेकिन आज की तरह संगठित धार्मिक पहचान और संस्थाएं नहीं थीं।
मनुष्य ने सबसे पहले प्रकृति को समझने की कोशिश की। सूर्य से रोशनी मिलती थी, वर्षा से खेती होती थी, नदियों से जीवन मिलता था और अग्नि से सुरक्षा तथा ऊर्जा। दूसरी ओर भूकंप, बिजली, बाढ़, सूखा और महामारी जैसी घटनाएं उसके लिए रहस्य थीं। संभवतः इन्हीं अनुभवों से प्रकृति के प्रति श्रद्धा और अदृश्य शक्तियों में विश्वास की अनेक परंपराएं विकसित हुईं।
भारतीय उपमहाद्वीप में वैदिक परंपराएं, उपनिषदों का दर्शन, श्रमण परंपरा, जैन और बौद्ध विचारधाराएं अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों में विकसित हुईं। हिंदू परंपरा का कोई एक संस्थापक नहीं है। जैन धर्म में महावीर स्वामी, बौद्ध धर्म में गौतम बुद्ध, इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद, ईसाई धर्म में यीशु और सिख धर्म में गुरु नानक देव जी का ऐतिहासिक महत्व है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी अलग-अलग सभ्यताओं ने अपने धार्मिक और दार्शनिक विचार विकसित किए।
इन परंपराओं के बीच एक समानता भी दिखाई देती है। लगभग सभी ने किसी न किसी रूप में मनुष्य को जीवन का अर्थ समझाने, नैतिकता सिखाने और समाज को व्यवस्थित करने का प्रयास किया। हालांकि उनके ईश्वर, आत्मा, सृष्टि और मुक्ति संबंधी विचार एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
यहां एक बुनियादी सवाल पैदा होता है। क्या ईश्वर ने मनुष्य को बनाया और धर्म दिए, या मनुष्य ने अपने ज्ञान, अनुभव, परिस्थितियों और आध्यात्मिक खोज के आधार पर ईश्वर और धर्म की अलग-अलग अवधारणाएं विकसित कीं?
आस्था रखने वाले व्यक्ति का उत्तर अपनी धार्मिक मान्यता पर आधारित होगा। वहीं इतिहासकार और वैज्ञानिक उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर धार्मिक परंपराओं के विकास का अध्ययन करेंगे। दोनों के प्रश्न और उनकी पद्धतियां अलग हैं।
लेकिन इस पूरी बहस में एक बात को नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य की उत्पत्ति किसी आधुनिक धार्मिक पहचान के साथ नहीं हुई थी। वह पहले मनुष्य था। उसकी पहली जरूरत भोजन, पानी, सुरक्षा, परिवार और समुदाय थी। उसने प्रकृति के साथ जीना सीखा, अनुभवों से ज्ञान अर्जित किया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी मान्यताएं आगे बढ़ाईं।
समस्या तब शुरू होती है जब आस्था व्यक्तिगत विश्वास से आगे बढ़कर दूसरे मनुष्य की पहचान, सम्मान और अधिकार तय करने का आधार बन जाती है। जब धर्म करुणा के बजाय नफरत, संवाद के बजाय टकराव और मानवता के बजाय श्रेष्ठता का माध्यम बनने लगता है, तब उसके मूल उद्देश्यों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
धर्मों के इतिहास को समझने का अर्थ किसी धर्म को छोटा या बड़ा साबित करना नहीं है। इसका अर्थ है मनुष्य की सभ्यता, उसकी कल्पनाशीलता, ज्ञान, भय, उम्मीदों और सत्य की तलाश को समझना।
आज विज्ञान ब्रह्मांड की उत्पत्ति, जीवन के विकास और प्रकृति के नियमों को समझने की कोशिश कर रहा है। दर्शन मनुष्य के अस्तित्व और चेतना पर सवाल उठा रहा है। वहीं धर्म अब भी करोड़ों लोगों के जीवन में आस्था, नैतिकता और आध्यात्मिक सहारे का स्रोत है।
शायद समय की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हम अपने धर्म को समझने के साथ-साथ दूसरे की आस्था का सम्मान करना भी सीखें।
क्योंकि धर्म की पहचान चाहे अलग-अलग हो, लेकिन मनुष्य की बुनियादी जरूरतें, उसकी संवेदनाएं, उसका दुख और उसकी खुशियां एक जैसी हैं।
धर्मों से पहले भी मनुष्य था। धर्मों के बाद भी मनुष्य ही रहेगा। सवाल यह है कि हम अपनी धार्मिक पहचान के साथ कितनी मानवता बचाकर रख पाते हैं?
