संपादकीय | मृत्यु नहीं, ‘मैं’ का भय
हम मृत्यु को शरीर के रुक जाने से जोड़ते हैं, जैसे कोई मशीन अचानक बंद हो गई हो। पर यह समझ अधूरी है। जो दिखता है, वह अंत है; जो भीतर घटता है, वही वास्तविक घटना है। भीतर तो हर दिन कुछ न कुछ मरता रहता है—कोई उम्मीद, कोई पहचान, कोई संबंध। फिर भी मृत्यु से भय बना रहता है, क्योंकि डर शरीर के मिटने का नहीं, उस “मैं” के टूटने का है जिसे हमने वर्षों से पकड़े रखा है।
यह “मैं” स्मृतियों, उपलब्धियों, अपमानों और अपेक्षाओं से बनी एक कहानी है। इसी कहानी को बचाने में पूरी उम्र लग जाती है। आलोचना इस पर चोट करती है, प्रशंसा इसे मोटा करती है। धीरे-धीरे यही कथा जीवन बन जाती है—जबकि यह अस्थिर, उधार और बदलती हुई है। सच यह है कि हमारे डर, लालच, ईर्ष्या और सुरक्षा की चाह किसी निजी तिजोरी में पैदा नहीं होते; वे मानवीय चेतना के साझा रंग हैं।
व्यक्तिगत होने का भ्रम ही भय की जड़ है। हम कहते हैं—मेरा दुख अलग है, मेरी पीड़ा अनोखी है। जबकि दुख का स्वाद सब जगह एक सा है। जब तक भीतर एक केंद्र बना रहता है जो खुद को दूसरों से अलग मानता है, तब तक मृत्यु शत्रु लगती है—क्योंकि वह उसी केंद्र को गिरा देती है। इसी डर से अमरता की कल्पनाएँ रची जाती हैं, ताकि कहानी किसी और रूप में चलती रहे।
पर अगर कहानी ही भ्रम हो तो? तब मृत्यु कोई भविष्य की घटना नहीं रहती; वह हर पल घटती है—जब कोई झूठी पहचान ढहती है, जब कोई पुरानी छवि गिरती है। तब मृत्यु बोझ उतरने जैसी लगती है। जीवन और मृत्यु विरोधी नहीं रहते; वे एक ही प्रक्रिया के दो पहलू बन जाते हैं—जैसे सांस लेना और छोड़ना।
चेतना कोई बंद कमरा नहीं, खुला मैदान है। इसमें सदियों की स्मृतियाँ, डर, युद्ध, प्रेम और प्रार्थनाएँ बहती हैं। हम इसी प्रवाह में जन्म लेते हैं और उसे “अपनी” कहानी मान लेते हैं। यह देखने से “मैं” का आकार छोटा होता है, सीमाएँ पिघलती हैं, और मृत्यु एक व्यक्ति का अंत नहीं, लहर का समुद्र में लौटना लगती है।
प्रेम भी तब निजी संपत्ति नहीं रहता। वह किसी कहानी पर नहीं टिकता; वह वह अवस्था है जहाँ दूसरे का दर्द अलग नहीं दिखता। ऐसे प्रेम में खोने का भय नहीं टिकता, क्योंकि पकड़ने को कुछ अलग बचता ही नहीं।
यह दृष्टि कोई सांत्वना नहीं देती, कोई वादा नहीं करती। यह सिर्फ़ स्पष्टता देती है—कठोर, पर हल्की। और शायद इसी स्पष्टता में जीवन की वह शांत तीव्रता छिपी है, जो न मृत्यु से सौदा करती है, न जीवन से भागती है।
