‘मदर ऑफ़ ऑल डील्स’ और पाखंड की राजनीति
भारत और यूरोपीय संघ जिस समझौते को ‘मदर ऑफ़ ऑल डील्स’ कहकर दुनिया के सामने परोस रहे हैं, उस पर अमेरिका की प्रतिक्रिया ने पश्चिमी दुनिया के दोहरे चरित्र को नंगा कर दिया है। अमेरिका का यह कहना कि यूरोप यूक्रेनी लोगों के हितों से ज़्यादा अपने व्यापार की चिंता कर रहा है, दरअसल दूसरों पर उंगली उठाने से पहले आईना देखने से बचने की कोशिश है।
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से ही पश्चिमी शक्तियां इसे मानवीय संकट नहीं बल्कि रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। प्रतिबंध, हथियार सप्लाई, बयानबाज़ी और अब व्यापार—सब कुछ अपने हितों के तराज़ू पर तौला जा रहा है। ऐसे में यूरोप अगर अपने आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करता है, तो यह अचानक नैतिक अपराध कैसे हो गया?
सच यह है कि अमेरिका को भारत-EU डील से यूक्रेन नहीं, अपनी घटती आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ की चिंता है। एशिया में भारत के साथ यूरोप की बढ़ती नज़दीकी अमेरिका की एकाधिकारवादी वैश्विक भूमिका को चुनौती देती है। इसलिए यूक्रेनी जनता की दुहाई देना महज़ एक सुविधाजनक कवर स्टोरी है।
युद्ध से तबाह यूक्रेन के आम नागरिकों की दुर्दशा पर अमेरिका और यूरोप दोनों की संवेदनशीलता तभी जागती है जब उससे उन्हें कूटनीतिक या आर्थिक लाभ दिखे। वरना वही देश आज भी दुनिया भर में हथियार बेचकर, युद्ध को लंबा खींचकर और संसाधनों पर नियंत्रण जमाकर ‘शांति’ का उपदेश दे रहे हैं।
भारत और यूरोपीय संघ का समझौता यह साफ़ संकेत देता है कि अब दुनिया नैतिक भाषणों से नहीं, वास्तविक हितों से चल रही है। यह समझौता एक नए बहुध्रुवीय विश्व का दस्तावेज़ है, जहां फैसले वाशिंगटन के इशारों पर नहीं, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर लिए जाएंगे।
यूक्रेन युद्ध एक त्रासदी है, लेकिन उससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि उसे वैश्विक शक्ति संतुलन के खेल में मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। और जब तक यह खेल चलता रहेगा, तब तक ‘मदर ऑफ़ ऑल डील्स’ जैसे समझौते बार-बार पश्चिमी पाखंड को उजागर करते रहेंगे।
