हिमालयी राज्यों के समूह आपस में मिलकर जो भी चिंतन करते हैं इसके सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। हिमालयी राज्यों को केंद्र सरकार की ओर से जैविक खेती के लिए एक अच्छा बजट प्राप्त हो रहा है। हम कार्यशालाओं के माध्यम से जो भी अनुभव लेते हैं उसे अपने क्षेत्र में जाकर विकास कार्यों में लगाएं।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यह बात परमार्थ निकेतन में पंचायती राज विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट की ओर से आयोजित ‘हिमालयी राज्यों के सामाजिक और आर्थिक रूपांतरण’ विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान कही।
कार्यशाला का प्रदेश के मुख्यमंत्री और स्वामी चिदानंद सरस्वती ने संयुक्त रूप से शुभारंभ किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालयी राज्यों की भौगोलिक संरचना लगभग समान है। उन्होंने पांच हिमालयी राज्यों से आए प्रतिभागियों का उत्तराखंड की धरती पर अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि हिमालय भारत की ढाल बनकर सदियों से रक्षा कर रहा है। हिमालय पानी, पेड़ और प्राणवायु का सबसे अच्छा स्रोत है।
ये रहे शामिल
कार्यशाला में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणांचल प्रदेश से पांच राज्यों के सरपंच और प्रधानों ने अपने अनुभव साझा किए। इस अवसर पर डॉ. बाला प्रसाद, विशेष सचिव से.नि. पंचायत राज मंत्रालय भारत सरकार, आलोक प्रेम नागर, संयुक्त सचिव पंचायत राज मंत्रालय, डॉ. राजीव बंसल, एसआईआरडी, हिमाचल प्रदेश, जीबी पंत इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के वैज्ञानिक डॉ. आरसी सुंदरियाल, सीआईटीएच, मुक्तेश्वर के डॉ. राज नारायण, डीआरडीओ डॉ. आनंद कुमार कटियार, भेल के पूर्व एजीएम डॉ. नरेश श्रीवास्तव, ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार में संयुक्त सचिव लीना जौहरी, नेशनल मेडिसीनल प्लांट्स बोर्ड के सीईओ डॉ. तनुजा मनोज, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉयल एंड वाटर कंजर्वेशन के निदेशक डॉ. चरण सिंह, वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. कलाचंद सैन, हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. एसएस सामंत, कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव राजेश वर्मा आदि शामिल थे।
