15 अगस्त 2026।
देश अपनी आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है।
लाल किले की प्राचीर से भाषण होंगे। तिरंगा शान से लहराएगा। देश की उपलब्धियां गिनाई जाएंगी। विकास, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, विश्वगुरु बनने की यात्रा और लोकतंत्र की मजबूती की बातें होंगी।
लेकिन इसी आजादी के 80वें साल में एक दिन मुख्यमंत्री आवास का देखा हुआ एक छोटा-सा दृश्य मन में बड़ा सवाल खड़ा कर गया—
हम अंग्रेजों से तो आजाद हो गए, लेकिन क्या हमारी व्यवस्था अब भी ‘दरबार’ से पूरी तरह आजाद हुई है?
एक दिन मुख्यमंत्री आवास से फोन आया—11 तारीख को मिलने के लिए बुलाया गया।
हम उस समय वृंदावन होते हुए दिल्ली पहुंच चुके थे। सोचा था कि दिल्ली से कोटद्वार निकलेंगे या देहरादून में अपना काम निपटाकर घर लौटेंगे। लेकिन फोन आया तो कार्यक्रम बदल गया।
सोचा, मुख्यमंत्री से मिलना है तो दो-चार मांग पत्र भी साथ ले चलते हैं।
रात में फिर फोन आया—
“आप सिर्फ अकेले आइए।”
एक साथी दूसरे मुद्दे को लेकर दो दिन से तैयारी कर रहे थे। उनकी तैयारी अधूरी रह गई। फिर भी सुबह-सुबह वे गेट के आसपास किसी तरह अंदर जाने का रास्ता तलाशते रहे।
जब हम पहुंचे तो उनकी शिकायत थी—
“हमारा तो दिन ही खराब हो गया।”
हमने कहा—अंदर जाकर कुछ व्यवस्था करने की कोशिश करते हैं।
लेकिन मुख्यमंत्री आवास के भीतर का दृश्य देखकर लगा कि कहानी केवल हमारी नहीं है।
वहां कई लोग ऐसे थे जिनके साथी बाहर खड़े थे और वे अंदर घूम-घूमकर कार्यक्रम समन्वयक से कह रहे थे—
“एक बार उनको भी अंदर आने दीजिए।”
हरिद्वार से आए एक प्रतिनिधि के साथी का तर्क था—
“मुख्यमंत्री जी हमें जानते हैं।”
बाहर खड़े लोग भी यही कह रहे थे—
“सीएम साहब हमें जानते हैं।”
यानी आजादी के 80 साल बाद भी सत्ता तक पहुंच का एक अनकहा पासवर्ड शायद वही है—
पहचान।
अंदर एक दूरस्थ जिले का बड़ा पदाधिकारी अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा था। वर्षों इंतजार के बाद मुख्यमंत्री से मिलने का अवसर मिला था, लेकिन शिकायत यह थी कि इतने लंबे इंतजार का परिणाम क्या मिला?
कुछ कुर्सियों पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार।
एक प्रतिनिधिमंडल गढ़वाल से आया था, लेकिन हाथ में कुमाऊं की समिति से जुड़ा मामला था।
तराई-भाबर से आए एक साथी मुख्यमंत्री से अपने पत्र पर नोटिंग कराने का आग्रह कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि पत्र पर संज्ञान लिया जाएगा।
लेकिन जब बार-बार नोटिंग की बात होने लगी तो मुख्यमंत्री ने कहा—
“मैं झूठ थोड़ी बोल रहा हूं।”
यह एक सामान्य बातचीत लग सकती है।
लेकिन 80 साल की आजादी के संदर्भ में देखें तो यह वाक्य लोकतंत्र की एक गहरी तस्वीर सामने रखता है।
क्योंकि सवाल मुख्यमंत्री के झूठ बोलने का नहीं था।
सवाल था—
क्या अब भी किसी नागरिक को अपने पत्र की विश्वसनीयता के लिए मुख्यमंत्री के हाथ की नोटिंग चाहिए?
क्या हमारी संस्थाएं इतनी सक्षम नहीं होनी चाहिए कि कोई आवेदन अपने निर्धारित नियम और प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ सके?
निजी मुलाकात से जनता दरबार तक
उस दिन मुख्यमंत्री आवास में लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या का समाधान लेकर आया था।
किसी को जमीन चाहिए थी।
किसी को भवन।
किसी को पत्र पर कार्रवाई चाहिए थी।
किसी को संगठन की मांग रखनी थी।
किसी को अपने क्षेत्र का मुद्दा उठाना था।
किसी को वर्षों पुराना काम करवाना था।
और धीरे-धीरे जो निजी मुलाकात होनी थी, वह जनता दरबार में बदल चुकी थी।
हम भी आखिर में खड़े थे—कोटद्वार प्रेस क्लब के सचिव और वॉयस ऑफ मीडिया के नॉर्थ जोन अध्यक्ष के रूप में।
हमारे हाथ में भी मांग पत्र थे।
कोटद्वार प्रेस क्लब के लिए भूमि और भवन की मांग।
और वॉयस ऑफ मीडिया का 15 सूत्रीय कार्यक्रम।
हम भी उसी कतार का हिस्सा थे।
लेकिन उस दिन असली सवाल मांग पत्रों का नहीं था।
असली सवाल था—
आजादी के 80 साल बाद भी नागरिक को अपनी समस्या लेकर सत्ता के दरबार तक क्यों पहुंचना पड़ता है?
अंग्रेज चले गए, ‘दरबार’ कितना गया?
हमने 1947 में अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाई।
संविधान ने नागरिक को अधिकार दिए।
मताधिकार दिया।
समानता का अधिकार दिया।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी।
कानून के सामने बराबरी का सिद्धांत दिया।
लोकतंत्र दिया।
लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती।
उसकी परीक्षा उस दिन होती है जब एक सामान्य नागरिक किसी सरकारी दफ्तर में अपना काम लेकर जाता है।
क्या उसे किसी नेता की सिफारिश चाहिए?
क्या उसे किसी अधिकारी या मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से जानना जरूरी है?
क्या उसे किसी संगठन का पदाधिकारी बनकर अपनी बात रखनी पड़ती है?
क्या उसे अपने आवेदन पर किसी बड़े व्यक्ति की ‘नोटिंग’ चाहिए?
यदि जवाब हां है तो हमें 80 साल बाद भी अपने लोकतंत्र के भीतर झांकने की जरूरत है।
मुख्यमंत्री भी इस व्यवस्था के कैदी हैं?
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दृश्य महत्वपूर्ण था।
मुख्यमंत्री स्वयं भी एक दुविधा में दिखाई दे रहे थे।
सामने हर व्यक्ति अपनी समस्या लेकर खड़ा था।
हर किसी को लगता था कि उसकी समस्या सबसे जरूरी है।
हर किसी के पास अपनी मजबूरी थी।
हर किसी को तत्काल समाधान चाहिए था।
और मुख्यमंत्री के सामने सवाल था—
सबकी सुनूं तो किसकी सुनूं?
यहीं पर बात व्यक्ति से निकलकर व्यवस्था तक पहुंच जाती है।
समस्या केवल यह नहीं कि मुख्यमंत्री के पास बहुत लोग पहुंचना चाहते हैं।
समस्या यह है कि यदि नागरिक को अपनी समस्या के समाधान के लिए मुख्यमंत्री तक पहुंचना पड़ रहा है तो बीच की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है।
लोकतंत्र मजबूत तब नहीं होता जब मुख्यमंत्री हर शिकायत सुन लें।
लोकतंत्र मजबूत तब होता है जब ऐसी व्यवस्था बने कि मुख्यमंत्री तक हर छोटी शिकायत पहुंचाने की जरूरत ही न पड़े।
कैमरे के सामने सकारात्मकता, कैमरे के पीछे सवाल
अंत में मुख्यमंत्री की सोशल मीडिया टीम ने कैमरे के सामने कुछ बोलने को कहा।
हमने भी सकारात्मक बातें कहीं।
आखिर सार्वजनिक मंच था।
कैमरा था।
मुख्यमंत्री थे।
लेकिन कैमरे के पीछे जो दृश्य देखा था, वह मन में रह गया।
एक तरफ विकास की तस्वीर।
दूसरी तरफ अपने काम के लिए सत्ता के दरवाजे पर खड़े लोग।
एक तरफ आजादी के 80 साल का उत्सव।
दूसरी तरफ यह एहसास कि व्यवस्था तक पहुंचने के लिए अभी भी पहचान, सिफारिश और व्यक्तिगत संपर्क की जरूरत पड़ सकती है।
असली आजादी की अगली लड़ाई
इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि हमने 80 वर्षों में क्या हासिल किया।
सवाल यह भी होना चाहिए—
हमने नागरिक को कितना सक्षम बनाया?
क्या नागरिक बिना किसी सिफारिश के सरकारी कार्यालय में अपना काम करा सकता है?
क्या उसकी शिकायत का समयबद्ध समाधान होता है?
क्या प्रशासन जवाबदेह है?
क्या सत्ता तक पहुंच व्यक्ति की पहचान से तय होती है या संविधान में मिले अधिकार से?
क्या पत्रकार को अपने अधिकार के लिए सत्ता के दरवाजे पर खड़ा होना पड़ेगा?
क्या किसी प्रेस क्लब को भवन के लिए मुख्यमंत्री से गुहार करनी होगी?
क्या किसी संगठन के 15 सूत्रीय कार्यक्रम को सुनाने के लिए व्यक्तिगत मुलाकात जरूरी होगी?
यदि इन सवालों के जवाब अभी भी असहज करते हैं तो शायद हमारी आजादी अधूरी नहीं, लेकिन लोकतंत्र की यात्रा जरूर अधूरी है।
दिल्ली का दरबार बनाम लोकतंत्र का गणराज्य
हम अक्सर कहते हैं—
“दिल्ली का दरबार।”
यह शब्द केवल दिल्ली की राजनीति के लिए नहीं है।
यह उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें सत्ता ऊपर बैठती है और नागरिक नीचे खड़ा होकर अपनी फरियाद सुनाता है।
आजादी का अर्थ केवल शासक बदलना नहीं था।
आजादी का अर्थ था—
शासन की मानसिकता बदलना।
राजा और प्रजा का संबंध खत्म करके नागरिक और राज्य का संबंध बनाना।
फरियाद को अधिकार में बदलना।
सिफारिश को प्रक्रिया में बदलना।
दरबार को संस्थान में बदलना।
और व्यक्ति की कृपा को कानून के शासन में बदलना।
15 अगस्त का असली सवाल
इस 15 अगस्त को जब तिरंगा फहराया जाए तो हमें एक सवाल खुद से जरूर पूछना चाहिए—
क्या हम उस भारत के नागरिक हैं जहां काम अधिकार से होता है, या उस भारत के जहां काम करवाने के लिए किसी को जानना पड़ता है?
80 साल की आजादी के बाद भी अगर मुख्यमंत्री आवास में लोग यह साबित करने में लगे हैं कि—
“मुख्यमंत्री हमें जानते हैं।”
तो यह केवल उनका सवाल नहीं है।
यह हमारे लोकतंत्र का आईना है।
और शायद इस आईने में सबसे बड़ा चेहरा मुख्यमंत्री का नहीं,
हमारी व्यवस्था का दिखाई देता है।
आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर हमें सिर्फ यह नहीं कहना चाहिए—
“हम आजाद हैं।”
हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अगली पीढ़ी को यह कहने के लिए किसी दरबार में न जाना पड़े—
“साहब, मेरा काम कर दीजिए… मैं आपको जानता हूं।”
क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक को सत्ता को जानने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
सत्ता को नागरिक के अधिकार को जानना चाहिए।
यही शायद आजादी के 80वें वर्ष की सबसे बड़ी कसौटी है।
जय हिंद।
