स्वतंत्रता का अर्थ मिठाई के एक डिब्बे से आगे है
स्वतंत्रता दिवस पर कोटद्वार के पिक्चर हॉल तिराहे पर मजदूरों का जमा होना केवल एक सामान्य दृश्य नहीं था।
यह हमारे विकास और स्वतंत्रता की यात्रा पर सवाल खड़ा करने वाली तस्वीर थी
आज जब पूरा देश आजादी के 80 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा था, तब ये मजदूर इस चिंता में थे कि आज मजदूरी मिलेगी या नहीं।
ऐसे में यदि नगर निगम या कोटद्वार प्रशासन इन मजदूरों के बीच पहुंचता, उनसे संवाद करता, उन्हें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देता और मिठाई का वितरण करता, तो यह केवल मिठाई बांटना नहीं होता।
यह राज्य और समाज की संवेदनशीलता का संदेश होता।
और इससे भी महत्वपूर्ण बात—अगर प्रशासन उनके लिए भविष्य में मजदूरी की तलाश के लिए एक वैकल्पिक और व्यवस्थित स्थान निर्धारित कर देता, जहां मजदूर सुरक्षित रूप से खड़े हो सकें और जरूरतमंद लोग वहीं से श्रमिकों को काम के लिए ले जा सकें, तो यह एक स्थायी समाधान की शुरुआत होती।
आजादी के 80 वर्ष बाद किसी मजदूर को शहर के चौराहे पर खड़े होकर काम का इंतजार न करना पड़े—इससे बड़ा स्वतंत्रता दिवस का संदेश और क्या हो सकता है?
मिष्ठान का एक डिब्बा कुछ घंटों की खुशी दे सकता है, लेकिन सम्मानजनक रोजगार और सुरक्षित श्रमिक स्थल उसकी जिंदगी में स्वतंत्रता के मायने बदल सकते हैं।
यही अंतर है उत्सव मनाने और स्वतंत्रता को महसूस कराने में।
हमारे नगर निकायों और प्रशासन के सामने यह अवसर है कि वे मजदूरों को केवल ‘चौराहे पर खड़ी भीड़’ न समझें, बल्कि उन्हें शहर के निर्माण में योगदान देने वाली श्रमशक्ति के रूप में देखें।
आखिर शहर की सड़कें, मकान, दुकानें, पुल और इमारतें किसने बनाई हैं?
वही हाथ, जो आज काम की तलाश में चौराहे पर खड़े हैं।
इसलिए स्वतंत्रता दिवस का अगला संदेश यह होना चाहिए—
तिरंगा हर जगह फहरे, लेकिन उसके नीचे खड़ा मजदूर भी सम्मान से कह सके—
हां, मैं भी आजाद भारत का बराबरी का नागरिक हूं।
यही स्वतंत्रता के 80 वर्षों की सबसे सुंदर तस्वीर होगी।
