संपादकीय: आखिर खनिज किसके हैं?—उत्तराखंड में पहाड़, खनिज और अधिकार की नई लड़ाई
उत्तराखंड को हम देवभूमि कहते हैं। लेकिन इस देवभूमि के पहाड़ों के भीतर केवल आस्था नहीं, अपार प्राकृतिक संपदा भी छिपी है। पत्थर, बजरी, रेत, चूना-पत्थर, मैग्नेसाइट, बॉक्साइट और अनेक दूसरे खनिज राज्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। नदियों के तल से निकलने वाले उपखनिजों से लेकर पहाड़ों की खदानों तक, खनिज उत्तराखंड के लिए राजस्व का स्रोत भी हैं और पर्यावरणीय चुनौती भी।
अब केंद्र सरकार के प्रस्तावित Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 ने इस पूरे सवाल को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। विधेयक राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिज-संपन्न जमीन पर लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और अन्य लेवी पर केंद्रीय शर्तें और प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था प्रस्तावित करता है। साथ ही पहली बार ‘mineral-bearing land’ को भी केंद्रीय नियामक ढांचे के दायरे में लाने का प्रस्ताव है।
यहीं से उत्तराखंड को अपना सबसे बुनियादी सवाल पूछना चाहिए—
आखिर खनिज किसके हैं?
क्या वे केवल राष्ट्र की संपत्ति हैं?
क्या वे राज्य के राजस्व का साधन हैं?
क्या वे उस जमीन के मालिक के हैं जिसके नीचे खनिज है?
या उस गांव और समुदाय के भी हैं, जिसकी जमीन, नदी, जंगल और पर्यावरण खनन से प्रभावित होता है?
असल उत्तर शायद इन सभी के बीच कहीं है। लेकिन नीति बनाते समय इन सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उत्तराखंड के लिए यह सामान्य कानून नहीं है
खनिज नीति का असर झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ या राजस्थान में अलग रूप में दिखाई दे सकता है। उत्तराखंड की परिस्थितियां अलग हैं।
यह हिमालयी राज्य है। यहां पहाड़ केवल भूगर्भीय संरचना नहीं हैं। यही पहाड़ नदियों को जन्म देते हैं, जंगलों को संभालते हैं, जलस्रोतों को पोषित करते हैं और लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं।
इसलिए यहां खनन का अर्थ केवल यह नहीं कि सरकार को कितनी रॉयल्टी मिली और कंपनी ने कितना उत्पादन किया।
यह सवाल भी है कि—
एक टन खनिज निकालने के बदले पहाड़ ने क्या खोया?
यदि किसी नदी से लगातार उपखनिज निकाला जाता है तो उसका असर नदी के प्रवाह, तट, भूजल और आसपास की बस्तियों पर पड़ सकता है। यदि पहाड़ काटे जाते हैं तो उसके प्रभाव को केवल खनन राजस्व के आंकड़े से नहीं मापा जा सकता।
इसलिए उत्तराखंड में खनिज नीति का केंद्र राजस्व से आगे बढ़कर पर्यावरणीय न्याय होना चाहिए।
राज्य के अधिकार का प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने 2024 में खनिज अधिकारों पर राज्यों की कराधान शक्ति और रॉयल्टी के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया था। फैसले में कहा गया कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति राज्यों की विधायिकाओं के पास है, हालांकि संसद खनिज विकास से संबंधित कानून के माध्यम से सीमाएं निर्धारित कर सकती है।
अब प्रस्तावित संशोधन के जरिए केंद्र राज्यों की इस शक्ति पर शर्तें और प्रतिबंध निर्धारित करने का ढांचा बना रहा है। विपक्ष और कुछ विशेषज्ञ इसे राज्यों की वित्तीय शक्तियों तथा संघीय ढांचे के लिए चिंता का विषय मान रहे हैं।
यहां केंद्र के तर्क को भी समझना चाहिए।
यदि अलग-अलग राज्य मनमाने ढंग से कर और सेस लगाते हैं, तो खनन की लागत बढ़ सकती है। निवेश प्रभावित हो सकता है। सरकार का कहना है कि खनिज क्षेत्र में समान और पूर्वानुमेय व्यवस्था आवश्यक है। यह आर्थिक दृष्टि से एक वैध बहस है।
लेकिन समान व्यवस्था का अर्थ राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता समाप्त करना नहीं हो सकता।
उत्तराखंड की अपनी खनिज नीति क्यों जरूरी है?
उत्तराखंड सरकार स्वयं खनिज क्षेत्र के लिए अलग-अलग नियम और नीतियां बनाती रही है। राज्य के भूगर्भ एवं खनन निदेशालय की वेबसाइट पर 2026 में भी उत्तराखंड माइनर मिनरल कन्सेशन रूल्स में संशोधन दर्ज है।
इसका अर्थ साफ है—राज्य स्तर पर खनिज प्रशासन की अपनी वास्तविक आवश्यकता है।
क्योंकि उत्तराखंड में खनिज नीति केवल खनिज निकालने की अनुमति देने का विषय नहीं है। इसमें शामिल हैं—
- अवैध खनन पर नियंत्रण,
- नदी तंत्र की सुरक्षा,
- पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन का जोखिम,
- स्थानीय रोजगार,
- परिवहन और सड़क पर पड़ने वाला दबाव,
- खनन क्षेत्रों का पुनर्वास,
- पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति,
- स्थानीय निकायों को मिलने वाला राजस्व,
- और खनिज प्रभावित समुदायों का अधिकार।
इन सबको दिल्ली में बैठकर एक समान फार्मूले से नियंत्रित करना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है।
खनिज निकले उत्तराखंड से, लाभ किसे मिले?
यही सबसे बड़ा सवाल है।
मान लीजिए उत्तराखंड की किसी नदी से बड़ी मात्रा में खनिज निकाला गया। सरकार को राजस्व मिला। कंपनी को कारोबार मिला। निर्माण उद्योग को कच्चा माल मिला।
लेकिन जिस गांव के पास से खनन हुआ वहां सड़क खराब रही, पेयजल की समस्या रही, नदी का स्वरूप बदल गया और स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिला—तो क्या इसे विकास कहा जा सकता है?
खनिज नीति का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि खनिज संपदा से पैदा हुई आर्थिक गतिविधि का कितना हिस्सा खनिज प्रभावित क्षेत्र में वापस पहुंचता है।
यहां जिला खनिज फाउंडेशन जैसी व्यवस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन केवल फंड बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि खनिज प्रभावित क्षेत्रों में उसका उपयोग पारदर्शी, सामाजिक निगरानी के साथ और स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर हो।
जमीन के नीचे का खनिज और जमीन के ऊपर रहने वाला इंसान
प्रस्तावित विधेयक में ‘mineral-bearing land’ को भी केंद्रीय नियामक ढांचे में शामिल करने का प्रस्ताव विशेष ध्यान देने योग्य है।
यहीं जमीन के मालिक और खनिज अधिकार के बीच की बहस और गंभीर हो जाती है।
यदि किसी किसान की जमीन के नीचे खनिज है तो क्या केवल इसलिए उस जमीन की आर्थिक प्रकृति बदल जाएगी कि उसमें सरकार द्वारा निर्धारित मात्रा में खनिज मौजूद है?
क्या जमीन का मालिक केवल सतह का मालिक है?
क्या उसके नीचे की संपदा पर उसका कोई आर्थिक अधिकार नहीं?
और यदि खनिज निकालने से उसकी जमीन, पानी, खेती या जीवन प्रभावित होता है तो उसके अधिकारों की सुरक्षा कौन करेगा?
इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर के बिना ‘खनिज-संपन्न जमीन’ को व्यापक केंद्रीय नियमन में लाना विवाद को जन्म दे सकता है।
उत्तराखंड में सबसे पहले स्थानीय समुदाय की आवाज सुनी जाए
उत्तराखंड ने लंबे समय से पलायन, बेरोजगारी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट का सामना किया है। यदि राज्य की प्राकृतिक संपदा का उपयोग होता है तो उसका लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचना चाहिए।
खनन क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को रोजगार, स्थानीय परिवहन कारोबार, छोटे उद्यम, प्रसंस्करण और संबंधित सेवाओं में अवसर मिल सकते हैं।
लेकिन इसके लिए ऐसी नीति चाहिए जिसमें खनिज संसाधन को केवल राजस्व की वस्तु नहीं, बल्कि स्थानीय आर्थिक विकास के साधन के रूप में देखा जाए।
वरना पहाड़ से पत्थर जाएगा, नदी से रेत जाएगी, ट्रक बाहर जाएंगे और पैसा भी बाहर चला जाएगा—पीछे रह जाएगा केवल कटता हुआ पहाड़।
केंद्र को भी उत्तराखंड की भौगोलिक वास्तविकता समझनी होगी
देश को खनिज चाहिए। सड़कें, पुल, रेलवे, घर, उद्योग और ऊर्जा परियोजनाएं खनिजों के बिना नहीं चल सकतीं।
इसलिए खनन को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है।
समाधान है—जिम्मेदार खनन।
और जिम्मेदार खनन के लिए केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका जरूरी है।
केंद्र राष्ट्रीय मानक तय करे। रणनीतिक खनिजों और राष्ट्रीय हित से जुड़े विषयों पर समन्वय करे। लेकिन राज्य को अपने भौगोलिक, पर्यावरणीय और सामाजिक संदर्भ के अनुसार नियमन करने का पर्याप्त अधिकार मिले।
और सबसे महत्वपूर्ण—स्थानीय समुदाय को केवल प्रभावित पक्ष नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया का सहभागी बनाया जाए।
राजस्व का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण
यदि केंद्र राज्यों की कराधान शक्ति पर प्रतिबंध लगाता है तो उसके बदले राज्यों के राजस्व हितों की भरपाई का स्पष्ट ढांचा भी होना चाहिए।
उत्तराखंड जैसे राज्य के सामने पहले ही सीमित आर्थिक आधार और बड़े भौगोलिक दायित्व हैं। पहाड़ी क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल उपलब्ध कराने की लागत मैदानी राज्यों से अलग है।
यदि खनिज से मिलने वाले राज्य के राजस्व स्रोत सीमित होते हैं तो उसका सीधा प्रभाव राज्य की विकास क्षमता पर पड़ सकता है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि खनन कंपनियों को कितना राहत मिलेगी।
सवाल यह भी होना चाहिए—
उत्तराखंड को कितना मिलेगा?
और उससे भी बड़ा सवाल—
उत्तराखंड के खनिज प्रभावित गांवों को कितना मिलेगा?
खनिज राष्ट्रीय संपदा हैं, लेकिन उत्तराखंड की कीमत पर नहीं
केंद्र का यह कहना उचित है कि खनिज राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन राष्ट्रीय हित का अर्थ यह नहीं हो सकता कि संसाधन पैदा करने वाले राज्य को केवल पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत चुकानी पड़े।
यदि हिमालय देश के लिए जल, जंगल, खनिज और पारिस्थितिक सुरक्षा उपलब्ध कराता है तो हिमालयी राज्यों के लिए एक विशेष इकोलॉजिकल-फिस्कल मॉडल पर भी विचार होना चाहिए।
उत्तराखंड से निकले खनिज का एक हिस्सा राज्य को मिले, राज्य से आगे खनिज प्रभावित जिले और स्थानीय समुदाय को निर्धारित हिस्सा मिले और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए अलग संसाधन सुनिश्चित हों।
यही वास्तविक सहकारी संघवाद होगा।
आखिर खनिज किसके हैं?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक मंत्रालय, कंपनी या सरकार के पास नहीं होना चाहिए।
खनिज राष्ट्र के हैं, लेकिन उनके उपयोग में राज्यों का संवैधानिक अधिकार है; उनकी कीमत स्थानीय समाज और पर्यावरण चुकाते हैं; इसलिए लाभ में उनका हिस्सा भी होना चाहिए।
उत्तराखंड के संदर्भ में यही मूल सिद्धांत होना चाहिए।
केंद्र यदि खनिज क्षेत्र में एक समान व्यवस्था चाहता है तो उसे राज्यों के साथ बैठकर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें राष्ट्रीय हित और राज्य की वित्तीय स्वायत्तता दोनों सुरक्षित रहें।
विधेयक को जल्दबाजी में पारित करने के बजाय राज्यों, विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों, खनन प्रभावित समुदायों और स्थानीय निकायों से व्यापक परामर्श होना चाहिए।
क्योंकि खनिज एक बार जमीन से निकल गया तो वापस नहीं आएगा।
राजस्व की गणना बजट में हो सकती है, लेकिन कटे हुए पहाड़, बदली हुई नदी और उजड़ी हुई आजीविका की कीमत किसी सरकारी खाते में पूरी तरह दर्ज नहीं होती।
इसलिए उत्तराखंड की आवाज साफ होनी चाहिए—
खनिज राष्ट्र के विकास के लिए हैं, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों, नदियों और लोगों की कीमत पर नहीं।
और यदि खनिज की चाबी केंद्र के हाथ में जाती है, तो **उस चाबी से खुलने वाले खजाने में उत्तराखंड और उसके खनिज प्रभावित समाज का हिस्सा भी संवैधानिक रूप से सुरक्षित होना चाहिए।**
