कोटद्वार के विकास की कहानी केवल सड़कों, बाजारों और इमारतों की कहानी नहीं है। इसके पीछे जमीन का एक ऐसा इतिहास भी है, जिसे समझे बिना शहर की सामाजिक और आर्थिक संरचना को पूरी तरह समझना संभव नहीं।
इसी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है—नज़ूल भूमि।
नज़ूल भूमि को अक्सर सरकारी जमीन, पट्टे या स्वामित्व के कानूनी विवाद के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस विषय का एक दूसरा पक्ष भी है, जो कहीं अधिक मानवीय और सामाजिक है।
उस जमीन पर रहने वाले परिवारों का क्या होगा?
उनकी आजीविका कहां से आती है?
उनके बच्चों की शिक्षा किस व्यवस्था से चलती है?
उनका छोटा व्यवसाय, दुकान, मकान या कार्यस्थल किस सुरक्षा पर टिका है?
और यदि दशकों से किसी भूमि पर रह रहे परिवार के सामने अचानक भूमि-अधिकार का प्रश्न खड़ा हो जाए, तो क्या केवल कागज देखकर उसका समाधान किया जा सकता है?
यही वह बिंदु है जहां नज़ूल भूमि का प्रश्न केवल राजस्व विभाग की फाइल नहीं रह जाता।
यह रोटी, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।
कोटद्वार में नज़ूल भूमि को केवल जमीन की तरह देखना भूल होगी
कोटद्वार और भाबर क्षेत्र का शहरी विस्तार कई दशकों की प्रक्रिया का परिणाम है।
कृषि भूमि के आसपास बस्तियां बढ़ीं।
बस्तियों के साथ सड़कें आईं।
सड़कों के साथ बाजार विकसित हुए।
और बाजार के साथ छोटे-बड़े व्यवसाय खड़े हुए।
इस पूरे विकास में ऐसी भूमि भी रही होगी जिसकी कानूनी और राजस्व स्थिति समय के साथ बदलती रही।
यहीं नज़ूल भूमि का प्रश्न सामने आता है।
लेकिन किसी भूमि का रिकॉर्ड क्या कहता है, यह जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उस भूमि का सामाजिक उपयोग क्या रहा है।
किसी भूखंड पर यदि वर्षों से परिवार रह रहा है, वहीं उसकी दुकान है, वहीं उसका छोटा कारोबार है या उसी स्थान से उसका रोजगार चलता है, तो उस भूमि का मूल्य केवल बाजार दर से नहीं आंका जा सकता।
उसमें एक परिवार का पूरा जीवन जुड़ा होता है।
नज़ूल भूमि पर बसे परिवार केवल “कब्जेदार” नहीं हैं
भूमि विवादों की भाषा अक्सर लोगों को केवल एक कानूनी श्रेणी में बदल देती है।
किसी को “अतिक्रमणकारी” कहा जाता है।
किसी को “पट्टेदार”।
किसी को “अधिकृत”।
किसी को “अनधिकृत”।
लेकिन प्रशासनिक शब्दावली के पीछे मनुष्य भी होते हैं।
वह व्यक्ति जिसने उसी जमीन पर अपनी दुकान खड़ी की।
वह परिवार जिसने वहीं अपने बच्चों को बड़ा किया।
वह महिला जिसने घर के साथ छोटी दुकान चलाकर परिवार की आय में योगदान दिया।
वह कारीगर जिसकी पूरी ग्राहक-श्रृंखला उसी मोहल्ले से जुड़ी है।
वह छोटा व्यापारी जिसने वर्षों में अपनी दुकान को खड़ा किया।
ऐसे परिवारों के लिए जमीन केवल रहने की जगह नहीं होती।
वह उनकी पूंजी भी है और उनकी आजीविका का आधार भी।
इसलिए नज़ूल भूमि की किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल भूमि के स्वामित्व के सवाल से नहीं, बल्कि उससे जुड़े परिवारों की आजीविका के प्रभाव से भी होना चाहिए।
नहरों से बस्तियों तक और बस्तियों से व्यवसाय तक
कोटद्वार की पुरानी नहरों का इतिहास इस बहस को एक और आयाम देता है।
कभी जिन क्षेत्रों में खेत थे, वहां पानी पहुंचाने के लिए नहरें थीं।
सिंचाई से कृषि बढ़ी।
कृषि के आसपास बस्तियां विकसित हुईं।
बस्तियों के साथ रास्ते बने।
रास्तों के साथ बाजार आए।
और बाजारों ने स्थानीय व्यवसाय को जन्म दिया।
समय के साथ वही ग्रामीण भू-दृश्य शहरी भू-दृश्य में बदल गया।
इस परिवर्तन में रहने वाले परिवारों ने केवल जमीन का उपयोग नहीं किया—उन्होंने शहर की अर्थव्यवस्था का निर्माण भी किया।
आज किसी पुराने मोहल्ले में किराना दुकान, चाय की दुकान, मरम्मत की दुकान, छोटा गोदाम, वर्कशॉप या अन्य व्यवसाय दिखाई देता है तो उसके पीछे कई दशकों की सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया हो सकती है।
इसलिए नज़ूल भूमि पर खड़े व्यवसायों को केवल संपत्ति के रूप में देखना भी अधूरा दृष्टिकोण होगा।
वे स्थानीय रोजगार के छोटे-छोटे केंद्र हैं।
एक दुकान बंद होती है तो केवल शटर नहीं गिरता
मान लीजिए किसी परिवार की एक छोटी दुकान ऐसी भूमि पर चल रही है जिसकी कानूनी स्थिति विवादित है।
यदि दुकान हटती है तो नुकसान केवल दुकान के मालिक का नहीं होगा।
उसका कर्मचारी प्रभावित होगा।
उसके परिवार की आय प्रभावित होगी।
उसके नियमित ग्राहक प्रभावित होंगे।
स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी।
और कई मामलों में उस परिवार को नया व्यवसाय शुरू करने के लिए फिर से पूंजी जुटानी पड़ेगी।
इसलिए भूमि नीति का मूल्यांकन करते समय livelihood impact assessment की व्यवस्था होनी चाहिए।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जमीन खाली कराई जाएगी या नहीं।
सवाल यह भी होना चाहिए—
उस जमीन से कितने परिवारों की आय जुड़ी है और वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी?
कानून जरूरी है, लेकिन मानवीय संक्रमण भी जरूरी है
इसका अर्थ यह नहीं कि सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का कब्जा वैध मान लिया जाए।
सरकारी भूमि की रक्षा और सार्वजनिक संपत्ति का संरक्षण राज्य की जिम्मेदारी है।
लेकिन कानून लागू करने और लोगों को अचानक विस्थापित कर देने के बीच एक बड़ा अंतर है।
विशेषकर उन परिवारों के मामले में जिन्होंने लंबे समय से किसी भूमि पर निवास या व्यवसाय किया है, नीति को यह देखना चाहिए कि उनकी स्थिति क्या है।
क्या उनके पास पुराने पट्टे या आवंटन दस्तावेज हैं?
क्या उनके पास कर या शुल्क भुगतान के रिकॉर्ड हैं?
क्या उनका व्यवसाय दशकों से वहां संचालित है?
क्या वहां बिजली-पानी जैसे सार्वजनिक कनेक्शन हैं?
क्या उस स्थान पर किसी सार्वजनिक योजना के लिए भूमि की तत्काल आवश्यकता है?
क्या उन्हें वैकल्पिक भूमि या पुनर्वास की व्यवस्था दी जा सकती है?
इन प्रश्नों के बिना केवल बुलडोजर किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकता।
नज़ूल नीति का केंद्र “जमीन” से “जीविका” होना चाहिए
यदि सरकार नज़ूल भूमि के संबंध में नई नीति बनाती है या पुराने पट्टों के संबंध में निर्णय लेती है, तो उसमें अलग-अलग श्रेणियां बनाई जा सकती हैं।
पहली श्रेणी: वास्तविक सार्वजनिक आवश्यकता वाली भूमि
जहां सड़क, अस्पताल, विद्यालय, जलस्रोत, सार्वजनिक सुरक्षा या अन्य आवश्यक सार्वजनिक परियोजना के लिए भूमि जरूरी हो, वहां स्पष्ट नीति के साथ भूमि का उपयोग किया जा सकता है।
लेकिन प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आजीविका का प्रावधान भी होना चाहिए।
दूसरी श्रेणी: लंबे समय से आवासीय उपयोग
ऐसे परिवार जिनका लंबे समय से उसी स्थान पर निवास है, उनके लिए स्वामित्व नियमितीकरण, दीर्घकालीन पट्टा या अन्य वैधानिक समाधान पर विचार किया जा सकता है—जहां कानून इसकी अनुमति देता हो।
तीसरी श्रेणी: छोटे व्यवसाय
छोटे दुकानदारों और स्वरोजगार करने वालों के लिए अलग नीति आवश्यक है।
क्योंकि दुकान हटने का अर्थ सीधे आय समाप्त होना हो सकता है।
चौथी श्रेणी: बड़े व्यावसायिक उपयोग
जहां बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान या संस्थागत उपयोग हैं, वहां भूमि के आर्थिक उपयोग और सरकारी हित के बीच अलग तरीके से संतुलन बनाया जा सकता है।
नज़ूल भूमि पर नीति में “मानवीय ऑडिट” होना चाहिए
जैसे वित्तीय ऑडिट होता है, वैसे ही नज़ूल भूमि के मामलों में सामाजिक और आजीविका ऑडिट की जरूरत है।
किस भूमि पर कितने परिवार हैं?
कितने वर्षों से रह रहे हैं?
कितने परिवारों की आय उसी स्थान से आती है?
कितने छोटे व्यवसाय वहां चल रहे हैं?
कितने बच्चे वहां से स्कूल जाते हैं?
कितने परिवारों के पास वैकल्पिक आवास नहीं है?
और यदि भूमि खाली कराई जाती है तो उनका पुनर्वास कहां होगा?
इन सवालों के जवाब नीति को अधिक न्यायपूर्ण और व्यावहारिक बना सकते हैं।
कोटद्वार को अपनी भूमि का सामाजिक इतिहास लिखना होगा
आज कोटद्वार जिस तेजी से फैल रहा है, उसमें भूमि की कीमत तेजी से बदल रही है।
लेकिन जमीन की कीमत और जमीन का सामाजिक मूल्य हमेशा एक समान नहीं होता।
एक छोटे दुकानदार के लिए उसकी दुकान करोड़ों रुपये की संपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन वही उसकी पूरी आजीविका हो सकती है।
एक परिवार के लिए दशकों पुराना घर केवल एक भवन नहीं, उसकी सामाजिक पहचान और सुरक्षा है।
इसीलिए नज़ूल भूमि पर निर्णय लेते समय बाजार मूल्य से पहले सामाजिक मूल्य को समझना जरूरी है।
सवाल यह भी होना चाहिए कि शहर ने इन परिवारों से क्या लिया?
शहर का विस्तार केवल जमीन के ऊपर नहीं हुआ।
इन परिवारों ने भी शहर को श्रम दिया।
उन्होंने दुकानें चलायीं।
स्थानीय सेवाएं दीं।
बाजार बनाए।
ग्राहकों को सुविधा दी।
सड़क किनारे छोटे कारोबारों से लेकर वर्कशॉप, रेहड़ी, ठेला और किराना दुकानों तक—यही छोटे आर्थिक केंद्र किसी शहर की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था को जीवित रखते हैं।
इसलिए यदि आज भूमि का मूल्य बढ़ गया है तो यह भी पूछा जाना चाहिए—
क्या उस विकास में उन परिवारों का कोई हिस्सा नहीं है जिन्होंने दशकों तक उस जगह की अर्थव्यवस्था को जीवित रखा?
नज़ूल भूमि का समाधान संघर्ष नहीं, संतुलन होना चाहिए
सरकार का अधिकार है कि वह सरकारी भूमि की रक्षा करे।
लेकिन सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि उसकी नीति से प्रभावित नागरिकों के जीवन और आजीविका की रक्षा के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए।
इसलिए समाधान के कुछ मूल सिद्धांत हो सकते हैं—
कानून भी रहे।
सरकारी भूमि भी सुरक्षित रहे।
वास्तविक अतिक्रमण और दीर्घकालिक निवास में अंतर किया जाए।
छोटे व्यवसायों की आजीविका को ध्यान में रखा जाए।
योग्य परिवारों के लिए नियमितीकरण या दीर्घकालीन पट्टे जैसे वैधानिक विकल्पों पर विचार हो।
जहां विस्थापन अपरिहार्य हो, वहां पहले पुनर्वास और आजीविका की वैकल्पिक व्यवस्था हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
हर निर्णय पारदर्शी रिकॉर्ड और स्पष्ट मानदंडों पर आधारित हो।
आखिर नज़ूल भूमि किसकी कहानी है?
यह केवल सरकार और नागरिक के बीच जमीन का विवाद नहीं है।
यह उस शहर की कहानी है जो खेतों से बस्तियों में बदला।
बस्तियों से बाजार बना।
और बाजार से शहर।
इस परिवर्तन में नहरें थीं।
कृषि थी।
सरकारी भूमि थी।
नज़ूल भूमि थी।
छोटे व्यापारी थे।
मजदूर थे।
परिवार थे।
और उनकी पीढ़ियों की आजीविका थी।
इसलिए नज़ूल भूमि पर बहस करते समय हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए—
“यह जमीन किसके नाम है?”
हमें यह भी पूछना चाहिए—
“इस जमीन से कितने जीवन जुड़े हैं?”
क्योंकि जमीन का स्वामित्व एक कानूनी प्रश्न हो सकता है, लेकिन जमीन से जुड़ी आजीविका एक सामाजिक प्रश्न है।
और किसी भी लोकतांत्रिक भूमि नीति की असली परीक्षा यही है कि वह कानून की रक्षा करते हुए इंसान की आजीविका की कितनी रक्षा करती है।
