सवाल सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी का नहीं, उस व्यवस्था की जवाबदेही का है जिसने कथित फर्जी दस्तावेजों को मंजिल तक पहुंचने दिया।
फर्जीवाड़े की छत्रछाया में खोता सिस्टम और कानून का इकबाल
फर्जी प्रमाण पत्र से मेडिकल सीट हथियाने वाला सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरी व्यवस्था को चुनौती देता है
उत्तराखंड में नीट-यूजी के जरिए एमबीबीएस में दाखिले से जुड़े कथित फर्जी प्रमाण पत्र मामले में एसआईटी द्वारा दो आरोपियों की गिरफ्तारी ने एक बार फिर उस सवाल को सामने ला दिया है, जिसे व्यवस्था बार-बार टालती रही है—आखिर सरकारी प्रमाण पत्रों की विश्वसनीयता की जिम्मेदारी किसकी है?
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के कथित दुरुपयोग और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में दाखिले का मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि यहां केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि किसी दूसरे योग्य अभ्यर्थी के अधिकार को प्रभावित करने का आरोप सामने आता है।
तीन अभ्यर्थियों के कथित फर्जी प्रमाण पत्रों का मामला सामने आना इस बात की जांच की मांग करता है कि ये दस्तावेज तैयार कैसे हुए, उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें वैध मानने की प्रक्रिया में कौन-कौन लोग शामिल थे।
असली सवाल गिरफ्तारी से आगे का है
किसी आरोपी की गिरफ्तारी जांच की शुरुआत हो सकती है, अंत नहीं।
असल सवाल यह है कि अगर प्रमाण पत्र फर्जी थे तो वे सरकारी व्यवस्था के सत्यापन चरण तक पहुंचे कैसे?
आज सरकार डिजिटल उत्तराखंड, ऑनलाइन सेवाओं और तकनीक आधारित प्रशासन की बात करती है। आधार, डिजिटल अभिलेख, ऑनलाइन आवेदन और विभिन्न सरकारी पोर्टलों के दौर में भी यदि कोई व्यक्ति फर्जी निवास, जाति या आश्रित प्रमाण पत्र बनवाकर संवेदनशील सरकारी लाभ हासिल कर लेता है, तो यह केवल अपराधी की चालाकी नहीं बल्कि सत्यापन व्यवस्था की कमजोरी भी है।
फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा शिकार कौन?
इसका सबसे सीधा जवाब है—वह युवा जो ईमानदारी से प्रतियोगिता में शामिल हुआ।
जिस विद्यार्थी ने वर्षों मेहनत करके नीट की परीक्षा दी, जिसके परिवार ने शिक्षा पर अपनी जमा-पूंजी लगा दी, उसकी सीट यदि किसी फर्जी प्रमाण पत्र के जरिए कोई दूसरा हासिल कर लेता है तो यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं है।
यह उस युवा के सपने, परिवार की उम्मीद और पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चोट है।
यही बात सरकारी नौकरियों, छात्रवृत्ति, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और भूमि संबंधी दस्तावेजों पर भी लागू होती है।
सिस्टम घटना के बाद ही क्यों जागता है?
यह सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल है।
फर्जीवाड़ा होने के बाद एसआईटी बनती है। शिकायत के बाद जांच होती है। दस्तावेज सामने आने के बाद कार्रवाई होती है।
लेकिन सवाल यह होना चाहिए कि फर्जी दस्तावेज जारी होने के समय निगरानी तंत्र कहां था?
यदि किसी प्रमाण पत्र का सत्यापन संबंधित मूल सरकारी अभिलेख से ऑनलाइन किया जा सकता है तो मैनुअल सत्यापन पर निर्भरता क्यों बनी हुई है?
हर संवेदनशील प्रमाण पत्र को एक विशिष्ट डिजिटल पहचान क्यों नहीं दी जा सकती?
क्यों न ऐसा तंत्र बनाया जाए जिसमें मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय, भर्ती संस्था या कोई सरकारी विभाग किसी प्रमाण पत्र को स्वीकार करने से पहले उसके मूल सरकारी रिकॉर्ड से उसका स्वतः मिलान कर सके?
जांच का दायरा नीचे से ऊपर तक जाना चाहिए
यदि किसी मामले में फर्जी दस्तावेज सामने आते हैं तो जांच केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए जिसने दस्तावेज का इस्तेमाल किया।
यह पता लगाना भी जरूरी है कि—
- प्रमाण पत्र किसने तैयार किया?
- आवेदन किस माध्यम से हुआ?
- दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया?
- सरकारी रिकॉर्ड में उसका मिलान हुआ या नहीं?
- यदि हुआ तो किस आधार पर?
- किसी जनसेवा केंद्र, कर्मचारी, अधिकारी या बिचौलिए की भूमिका थी या नहीं?
- क्या इससे पहले भी ऐसे प्रमाण पत्र जारी हुए हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—यदि सरकारी व्यवस्था के किसी व्यक्ति की मिलीभगत सामने आती है तो क्या उस पर भी उसी गंभीरता से कार्रवाई होगी?
कानून का इकबाल तभी कायम होगा जब कार्रवाई अपराध करने वाले तक ही नहीं, बल्कि अपराध को संभव बनाने वाली व्यवस्था तक पहुंचे।
तकनीक समाधान है, लेकिन जवाबदेही उससे भी जरूरी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के दौर में फर्जी दस्तावेजों का स्वरूप भी बदल रहा है। तस्वीरों और प्रमाण पत्रों में डिजिटल छेड़छाड़ पहले की तुलना में आसान हो गई है।
ऐसे समय में केवल कागज देखकर प्रमाण पत्र को असली मान लेना पर्याप्त नहीं है।
सरकार को संवेदनशील श्रेणी के प्रमाण पत्रों के लिए डिजिटल मूल अभिलेख, सुरक्षित सत्यापन प्रणाली और जांच योग्य रिकॉर्ड तैयार करने होंगे।
साथ ही अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही भी स्पष्ट करनी होगी।
कानून आम आदमी के लिए डर और फर्जीवाड़ेबाजों के लिए भरोसा न बन जाए
कानून का उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद दंड देना नहीं है। कानून का सबसे बड़ा उद्देश्य समाज में यह विश्वास पैदा करना है कि गलत करने वाला बच नहीं सकता और सही व्यक्ति का अधिकार सुरक्षित रहेगा।
जब किसी गरीब या सामान्य परिवार का युवा छोटी-सी प्रशासनिक गलती पर दफ्तरों के चक्कर लगाता है, लेकिन बड़े फर्जीवाड़े वर्षों तक व्यवस्था की नजरों से बच जाते हैं, तो लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होते हैं।
इसीलिए सरकार को अब केवल गिरफ्तारी और जांच की खबरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
फर्जी प्रमाण पत्रों की पूरी श्रृंखला की जांच होनी चाहिए।
कितने प्रमाण पत्र जारी हुए?
कितने संदिग्ध पाए गए?
कितने मामलों में लाभ मिला?
किस स्तर पर सत्यापन हुआ?
और जहां सरकारी लापरवाही या मिलीभगत सामने आए, वहां जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
इन सवालों के सार्वजनिक जवाब जरूरी हैं।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक मेडिकल सीट का नहीं है
उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रतियोगिता पहले ही कठिन है। सीमित अवसरों के बीच यदि फर्जी प्रमाण पत्र, सिफारिश या बिचौलियों का नेटवर्क रास्ता रोकने लगे तो यह आने वाली पीढ़ी के भरोसे को कमजोर करेगा।
देवभूमि की पहचान केवल पहाड़, नदियों और जंगलों से नहीं है। इसकी पहचान उस भरोसे से भी है कि यहां मेहनत का सम्मान होगा और व्यवस्था किसी के अधिकार को फर्जी कागज के सामने गिरवी नहीं रखेगी।
अब समय है कि सरकार फर्जीवाड़े के बाद कार्रवाई करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर फर्जीवाड़ा रोकने वाली व्यवस्था बनाए।
एसआईटी की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है वह व्यवस्था जिसमें अगली बार किसी योग्य युवा को यह शिकायत लेकर दरवाजा न खटखटाना पड़े कि उसकी मेहनत को किसी फर्जी प्रमाण पत्र ने हरा दिया।
कानून का इकबाल गिरफ्तारी से नहीं, निष्पक्ष व्यवस्था, निश्चित जवाबदेही और समय पर न्याय से कायम होता है।
