400 HIV मामले: आंकड़ा डराने के लिए नहीं, व्यवस्था जगाने के लिए है
पिथौरागढ़ में वर्ष 2002 से 2026 के बीच करीब 400 लोगों के HIV संक्रमित अथवा चिह्नित होने की जानकारी सामने आना चिंताजनक है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि करीब ढाई दशक में इतने मामले सामने आने के बावजूद रोकथाम की हमारी स्थानीय व्यवस्था कितनी प्रभावी रही?
यदि इन मामलों में इंजेक्शन के जरिए नशा करने, संक्रमित सुई साझा करने या अन्य जोखिमपूर्ण व्यवहार की भूमिका है, तो इसे केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवार और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
सवाल यह नहीं कि युवा नशा क्यों कर रहा है, सवाल यह भी है कि नशा उसके पास पहुंच कैसे रहा है?
पुलिस नशे के छोटे उपभोक्ताओं को पकड़कर आंकड़े बढ़ा सकती है, लेकिन असली चुनौती उस नेटवर्क तक पहुंचने की है जो नशीले पदार्थों को जिले तक पहुंचाता और युवाओं तक बेचता है।
इसलिए पिथौरागढ़ में नशे के खिलाफ कार्रवाई का मूल्यांकन केवल गिरफ्तारियों और बरामदगी से नहीं, बल्कि सप्लाई चेन पर कार्रवाई और नशे की उपलब्धता में वास्तविक कमी से होना चाहिए।
प्रशासन से दस सीधे सवाल
1. करीब 400 HIV संक्रमित/चिह्नित लोगों का आंकड़ा किस आधिकारिक रिकॉर्ड पर आधारित है? इसमें ‘संक्रमित’ और ‘चिह्नित’ की श्रेणियां अलग-अलग कितनी हैं?
2. इनमें कितने मामलों में इंजेक्शन के माध्यम से नशे अथवा सुई साझा करने का जोखिम पाया गया?
3. पिथौरागढ़ जिले में इंजेक्शन से नशा करने वाले लोगों की अनुमानित संख्या कितनी है और उनकी पहचान व स्वास्थ्य जांच के लिए क्या व्यवस्था है?
4. जिले में HIV, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी की गोपनीय जांच कितनी आसानी से उपलब्ध है? दूरस्थ क्षेत्रों के युवाओं तक यह सुविधा कैसे पहुंच रही है?
5. पिछले पांच वर्षों में नशीले पदार्थों की तस्करी के कितने मामलों में कार्रवाई हुई और क्या जांच केवल स्थानीय विक्रेताओं तक सीमित रही या आपूर्ति के बड़े नेटवर्क तक भी पहुंची?
6. जिले के विद्यालयों और महाविद्यालयों में नशे तथा HIV से बचाव के लिए नियमित कार्यक्रम चल रहे हैं या जागरूकता केवल विशेष दिवसों तक सीमित है?
7. नशे की गिरफ्त में आए युवाओं के लिए उपचार के बाद पुनर्वास और रोजगार से जोड़ने की क्या व्यवस्था है?
8. क्या जिले में नशा रोकथाम के लिए पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा और समाज कल्याण विभाग की संयुक्त मासिक समीक्षा होती है?
9. दूरस्थ गांवों और सीमांत क्षेत्रों में मोबाइल स्वास्थ्य एवं परामर्श सेवाएं नियमित रूप से पहुंच रही हैं या नहीं?
10. जिला प्रशासन अगले एक वर्ष में HIV और इंजेक्शन आधारित नशे के जोखिम को कम करने के लिए कौन-से मापने योग्य लक्ष्य निर्धारित कर रहा है?
पिथौरागढ़ को चाहिए अपना स्थानीय मॉडल
हर समस्या का समाधान देहरादून से जारी होने वाले सामान्य सरकारी आदेश से नहीं निकलता। पिथौरागढ़ की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए जिले को अपना ‘नशा एवं HIV रोकथाम स्थानीय कार्ययोजना’ बनानी चाहिए।
इसमें पांच स्तरों पर एक साथ काम होना चाहिए।
पहला—रोकथाम।
विद्यालयों, महाविद्यालयों और गांवों में वैज्ञानिक स्वास्थ्य शिक्षा तथा जीवन-कौशल कार्यक्रम चलें।
दूसरा—पहचान और जांच।
गोपनीय HIV तथा अन्य रक्तजनित संक्रमणों की जांच और परामर्श सेवाएं सुलभ हों।
तीसरा—उपचार।
नशे की गिरफ्त में आए व्यक्ति को केवल अपराधी के रूप में नहीं, बल्कि उपचार और पुनर्वास की जरूरत वाले व्यक्ति के रूप में भी देखा जाए।
चौथा—कानूनी कार्रवाई।
नशीले पदार्थों की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क और तस्करी पर केंद्रित कार्रवाई हो।
पांचवां—पुनर्वास और रोजगार।
नशामुक्ति के बाद युवा फिर उसी वातावरण में लौटकर दोबारा नशे की ओर न जाए, इसके लिए परिवार, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार को पुनर्वास योजना का हिस्सा बनाया जाए।
एक जिला, एक निगरानी तंत्र
जिलाधिकारी की अध्यक्षता में ‘पिथौरागढ़ नशा एवं HIV रोकथाम कार्यबल’ बनाया जा सकता है। इसमें पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, समाज कल्याण, युवा कल्याण, चिकित्सा विशेषज्ञ, स्थानीय निकाय और विश्वसनीय सामाजिक संगठनों को शामिल किया जाए।
हर महीने केवल बैठक न हो, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह बताया जाए कि—
- कितने युवाओं तक पहुंच बनाई गई;
- कितनी स्वास्थ्य जांच हुई;
- कितने लोगों को उपचार मिला;
- कितने लोगों को नशामुक्ति से जोड़ा गया;
- कितने लोगों का पुनर्वास हुआ;
- और नशीले पदार्थों की आपूर्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई।
जिस समस्या का आंकड़ा नहीं होगा, उसकी योजना कमजोर होगी। और जिसकी योजना का परिणाम नहीं मापा जाएगा, उसकी जवाबदेही भी तय नहीं होगी।
HIV से बड़ा खतरा सामाजिक कलंक भी है
HIV संक्रमित व्यक्ति को समाज से अलग करना समाधान नहीं है। संक्रमण के बारे में गलत धारणाएं व्यक्ति को जांच और उपचार से दूर कर सकती हैं। इसलिए जागरूकता अभियान में यह स्पष्ट होना चाहिए कि HIV कैसे फैलता है और कैसे नहीं फैलता।
युवाओं को डराने के बजाय सही जानकारी देनी होगी।
उन्हें यह बताना होगा कि सुरक्षित व्यवहार कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है।
और नशे की गिरफ्त में आ चुके युवा को यह भरोसा भी देना होगा कि वापसी का रास्ता बंद नहीं हुआ है।
अब पोस्टर नहीं, परिणाम चाहिए
हर साल नशामुक्ति के नारे लगाए जाते हैं। विश्व एड्स दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम होते हैं। स्कूलों में शपथ दिलाई जाती है। लेकिन असली सवाल यह है कि इन अभियानों के बाद जमीन पर क्या बदला?
पिथौरागढ़ को अब केवल अभियान नहीं, परिणाम चाहिए।
सरकार यदि वास्तव में युवाओं को नशे से बचाना चाहती है तो उसे तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा—नशे की आपूर्ति रोकना, जोखिमपूर्ण व्यवहार से होने वाले संक्रमण रोकना और नशे में फंसे युवाओं को सम्मानजनक जीवन में वापस लाना।
क्योंकि नशामुक्त समाज केवल पुलिस की कार्रवाई से नहीं बनता।
एक युवा को नशे से बचाना, एक परिवार को बचाना है।
एक संक्रमित व्यक्ति को समय पर उपचार से जोड़ना, एक जीवन को संभालना है।
और एक युवा को रोजगार देना, नशे के खिलाफ सबसे मजबूत सामाजिक विकल्प तैयार करना है।
पिथौरागढ़ को अब सवालों से भागने की नहीं, सवालों के जवाब देने और स्थानीय समाधान लागू करने की जरूरत है।
नशे के खिलाफ लड़ाई में नारा नहीं—स्थानीय रणनीति, निरंतर निगरानी और जवाबदेही चाहिए।
