सचिवालय में कमरे बहुत हैं, लेकिन क्या जनता के सवालों के जवाब भी उतने ही स्पष्ट हैं?
देहरादून का उत्तराखंड सचिवालय केवल इमारत नहीं है। यह वह स्थान है जहां प्रदेश की नीतियां बनती हैं, बजट की प्राथमिकताएं तय होती हैं, शासनादेश निकलते हैं और लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले फैसले लिए जाते हैं। इसलिए सचिवालय को केवल अधिकारियों के बैठने की जगह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन का कमांड सेंटर होना चाहिए।
लेकिन सवाल उठाना जरूरी है—क्या हमारा सचिवालय वास्तव में ऐसा है?
या फिर वह कमरों, अनुभागों, फाइलों और पदानुक्रम का ऐसा जाल बन गया है जिसमें आम आदमी की समस्या एक कमरे से दूसरे कमरे तक उसी तरह भटकती रहती है जैसे कबूतर अपने बाड़े में एक खाने से दूसरे खाने तक उड़ता रहता है?
यह व्यंग्य भवन की बनावट पर नहीं, व्यवस्था की मानसिकता पर है।
कमरे बढ़ते गए, जवाबदेही कहां गई?
सचिवालय में विभाग हैं, विभागों में अनुभाग हैं, अनुभागों में अधिकारी और अधिकारियों के नीचे अनेक स्तर। व्यवस्था का उद्देश्य काम को व्यवस्थित करना था, लेकिन जब यही व्यवस्था नागरिक के लिए बाधा बन जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
एक नागरिक अपनी समस्या लेकर आता है।
उसे कहा जाता है—
“यह मामला उस विभाग का है।”
वह वहां जाता है।
फिर जवाब मिलता है—
“यह तो दूसरे अनुभाग से संबंधित है।”
वह वहां जाता है।
फिर कहा जाता है—
“फाइल ऊपर भेजी गई है।”
और अंत में सवाल वही रहता है—
“मेरी समस्या का समाधान कौन करेगा?”
यहीं से सुशासन और नौकरशाही के बीच अंतर दिखाई देता है।
सचिवालय जनता से दूर क्यों महसूस होता है?
लोकतंत्र में सत्ता जनता के लिए है। लेकिन यदि शासन की सबसे महत्वपूर्ण इमारत आम नागरिक को अपने से दूर, जटिल और भय पैदा करने वाली लगे तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छी स्थिति नहीं है।
आज जरूरत इस बात की है कि सचिवालय का मूल्यांकन इस आधार पर हो कि—
- कितनी फाइलें समय पर निपटीं?
- कितने निर्णय जमीन पर लागू हुए?
- कितनी शिकायतों का समाधान हुआ?
- कितने विभाग आपस में समन्वय कर पाए?
- कितनी बार नागरिक को एक ही काम के लिए बार-बार सचिवालय आना पड़ा?
- और सबसे महत्वपूर्ण—किस अधिकारी ने किस निर्णय की जिम्मेदारी ली?
फाइल चलती रहे या सरकार?
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में शासन की सबसे बड़ी ताकत उसकी तेजी और संवेदनशीलता होनी चाहिए।
पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क बंद होती है, गांव में पानी की समस्या होती है, स्कूल में शिक्षक नहीं होता, अस्पताल में डॉक्टर नहीं होता, वन्यजीव संघर्ष में परिवार प्रभावित होता है, बेरोजगार युवा रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जाता है।
इन समस्याओं का समाधान फाइलों की गति से नहीं, निर्णय की गति से होगा।
अगर फाइल दस टेबल घूमकर भी निर्णय तक नहीं पहुंचती तो सवाल फाइल का नहीं, प्रशासनिक संस्कृति का है।
सचिवालय को ‘फाइलालय’ नहीं बनना चाहिए
उत्तराखंड को ऐसा सचिवालय चाहिए जो फाइलालय नहीं, समाधानालय बने।
जहां अधिकारी यह न पूछें कि—
“यह मामला मेरे विभाग का है या नहीं?”
बल्कि यह पूछें—
“इस नागरिक की समस्या का समाधान कैसे होगा?”
यही अंतर एक संवेदनशील प्रशासन और पारंपरिक नौकरशाही में होता है।
डिजिटल सचिवालय का मतलब केवल ई-ऑफिस नहीं
ई-ऑफिस, ऑनलाइन फाइल और डिजिटल हस्ताक्षर महत्वपूर्ण हैं। लेकिन डिजिटल व्यवस्था तभी सफल है जब नागरिक को उसका परिणाम दिखाई दे।
यदि कागज की फाइल की जगह डिजिटल फाइल ने ले ली, लेकिन निर्णय लेने में वही महीनों लग रहे हैं, तो तकनीक ने केवल फाइल का रूप बदला है, शासन का चरित्र नहीं।
सचिवालय को एक ऐसा real-time governance dashboard बनाना चाहिए जिसमें प्रत्येक महत्वपूर्ण सरकारी निर्णय की स्थिति दिखाई दे—
फाइल किस अधिकारी के पास है?
कब पहुंची?
कितने दिन से लंबित है?
जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
निर्णय की अंतिम समय-सीमा क्या है?
यह व्यवस्था नौकरशाही को कमजोर नहीं करेगी; बल्कि ईमानदार और काम करने वाले अधिकारियों को मजबूत करेगी।
उत्तराखंड को ‘कमरे’ नहीं, ‘कनेक्शन’ चाहिए
पहाड़ में सरकार की सबसे बड़ी चुनौती दूरी है।
गांव सचिवालय से दूर है।
गरीब अधिकारी से दूर है।
दिव्यांग व्यक्ति सरकारी प्रक्रिया से दूर है।
छोटा उद्यमी अनुमति की प्रक्रिया से दूर है।
युवा रोजगार के अवसरों से दूर है।
ऐसे में सचिवालय को खुद जनता के और करीब जाना होगा।
सरकार का मतलब यह नहीं कि नागरिक सरकार के दरवाजे तक पहुंचे।
सुशासन का मतलब है कि सरकार नागरिक की समस्या तक पहुंचे।
कबूतर के बाड़े वाला सवाल क्यों जरूरी है?
किसी भी लोकतंत्र में व्यंग्य व्यवस्था का दुश्मन नहीं होता। वह व्यवस्था को आईना दिखाता है।
इसलिए सवाल पूछना जरूरी है—
क्या उत्तराखंड सचिवालय में अधिकारी केवल अपने-अपने ‘खानों’ में बैठे हैं, या वे पूरे राज्य की तस्वीर को एक साथ देखकर निर्णय ले रहे हैं?
क्या विभाग अपनी-अपनी सीमाओं में बंद हैं?
क्या फाइलों के बीच नागरिक कहीं खो गया है?
क्या सचिवालय का मुख्य उद्देश्य नियंत्रण है या समाधान?
और क्या मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर अंतिम अनुभाग तक यह स्पष्ट है कि किसी निर्णय के लिए कौन जिम्मेदार है?
अब समय है सचिवालय को जनता का बनाना
उत्तराखंड छोटा राज्य है। यहां प्रशासनिक प्रयोग करना आसान है।
एक ऐसा सचिवालय बनाया जा सकता है जहां—
एक नागरिक—एक समस्या—एक डिजिटल ट्रैकिंग नंबर—एक जिम्मेदार अधिकारी—एक समय-सीमा।
बस इतना परिवर्तन भी शासन की पूरी तस्वीर बदल सकता है।
सचिवालय में हजारों फाइलें हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली सफलता फाइलों की संख्या में नहीं, नागरिकों की समस्याओं के समाधान में मापी जानी चाहिए।
इसलिए सवाल यह नहीं कि उत्तराखंड सचिवालय कबूतर के बाड़े जैसा दिखता है या नहीं।
सवाल यह है कि कहीं हमारी प्रशासनिक व्यवस्था भी तो कबूतर के बाड़े जैसी नहीं हो गई—जहां हर कोई अपने-अपने खाने में बैठा है, लेकिन बाहर खड़ी जनता को रास्ता नहीं मिल रहा।
उत्तराखंड को ऐसा सचिवालय चाहिए जहां कमरे कम महत्वपूर्ण हों और परिणाम अधिक।
जहां पद बड़ा नहीं, जवाबदेही बड़ी हो।
जहां फाइल नहीं, नागरिक केंद्र में हो।
और जहां हर अधिकारी को यह याद रहे—
सचिवालय जनता से ऊपर नहीं है; सचिवालय जनता की सेवा के लिए है।
