संपादकीय
देश सरकारों से नहीं, संविधान से चलता है। सरकारें संविधान के अधीन होती हैं और प्रशासन कानून के अनुसार काम करता है। यही लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था है। इसलिए किसी भी सरकार, अधिकारी, विभाग या स्थानीय निकाय के कामकाज को परखने का पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आदेश किसने दिया, बल्कि यह होना चाहिए कि आदेश किस कानून के तहत दिया गया, प्रक्रिया क्या अपनाई गई और उसका प्रभाव नागरिक के अधिकारों पर क्या पड़ा?
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां नागरिक सुरक्षा का अर्थ केवल अपराध से सुरक्षा नहीं है। सुरक्षित सड़क, यातायात व्यवस्था, भूस्खलन से बचाव, बाढ़ और आपदा प्रबंधन, बिजली-पानी की निरंतरता, स्वास्थ्य सेवाएं, अग्निशमन, सार्वजनिक परिवहन, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक की संपत्ति व जीवन की सुरक्षा—ये सभी सुशासन के हिस्से हैं।
राज्य सरकार ने भी आपदा प्रबंधन के संदर्भ में अधिकारियों को “जनता की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता” रखने तथा जिलों को अलर्ट मोड पर रखने के निर्देश दिए हैं। सवाल यह है कि ऐसी प्राथमिकताएं प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़कर हर शहर और हर नागरिक के दैनिक जीवन में कितनी दिखाई देती हैं।
कोटद्वार की तस्वीर में दिखाई देते सवाल
कोटद्वार आज एक महत्वपूर्ण मैदानी प्रवेशद्वार और तेजी से फैलता शहरी क्षेत्र है। लेकिन शहर की समस्याओं को केवल अलग-अलग विभागों की समस्याओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इन्हें नागरिक सुरक्षा और संवैधानिक जवाबदेही के व्यापक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
24 सितंबर को नागरिक मंच ने पुलिस और नगर निगम सहित संबंधित अधिकारियों के सामने कई समस्याएं उठाईं। इनमें बिना नंबर के वाहनों का संचालन, यातायात नियमों की अनदेखी, तेज गति और तेज आवाज वाले साइलेंसर जैसे मुद्दे शामिल थे। नगर निगम से जुड़े अग्रिम गृहकर और विलंब पर अतिरिक्त शुल्क के विषय पर भी आपत्ति जताई गई।
ये छोटी-छोटी शिकायतें नहीं हैं। इनके पीछे एक बड़ा प्रश्न छिपा है—
क्या शहर में नागरिक को सुरक्षित, व्यवस्थित और कानूनसम्मत सार्वजनिक व्यवस्था मिल रही है?
यदि सड़क पर बिना नंबर वाहन चल रहा है, यातायात नियमों का उल्लंघन हो रहा है और तेज गति से दुर्घटनाएं हो रही हैं, तो यह केवल यातायात विभाग की समस्या नहीं है। यह नागरिक के जीवन और सुरक्षा के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।
इसी तरह यदि किसी नागरिक से कर लिया जाता है, शुल्क लिया जाता है या उसके विरुद्ध कोई प्रशासनिक कार्रवाई की जाती है तो नागरिक का यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि उसकी कानूनी आधारशिला क्या है, प्रक्रिया क्या है और शिकायत का प्रभावी रास्ता क्या है।
अनुच्छेद 21 केवल किताब में नहीं, सड़क पर भी दिखना चाहिए
संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। न्यायपालिका ने समय के साथ इसकी व्याख्या को व्यापक बनाया है। उच्च न्यायालय के उपलब्ध न्यायिक दस्तावेजों में भी यह सिद्धांत स्पष्ट है कि जीवन और स्वतंत्रता से वंचित करने की प्रक्रिया केवल औपचारिक नहीं, बल्कि न्यायसंगत, उचित और निष्पक्ष होनी चाहिए।
इसका व्यापक लोकतांत्रिक अर्थ यह है कि नागरिक सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है।
अगर सड़क ऐसी है कि दुर्घटना का खतरा लगातार बना रहे,
अगर जलनिकासी ऐसी है कि बारिश में बस्तियां डूब जाएं,
अगर बिजली व्यवस्था नागरिकों को लगातार असुरक्षित स्थिति में डालती है,
अगर सार्वजनिक परिवहन पर्याप्त नहीं है,
अगर आपदा की स्थिति में समय पर राहत नहीं पहुंचती,
तो शासन की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
नागरिक सुरक्षा शासन की पहली परीक्षा है।
विकास और अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं
अक्सर विकास कार्यों के नाम पर यह मान लिया जाता है कि नागरिकों की असुविधा या अधिकारों का प्रश्न बाद में देखा जाएगा। यह दृष्टिकोण लोकतांत्रिक शासन के लिए उचित नहीं हो सकता।
सड़क चौड़ी करनी है—कीजिए।
शहर का नियोजन करना है—कीजिए।
अतिक्रमण हटाना है—कानून के अनुसार कीजिए।
नगर का विस्तार करना है—कीजिए।
पर्यावरण की रक्षा करनी है—पूरी मजबूती से कीजिए।
लेकिन प्रत्येक कार्रवाई में प्रश्न होना चाहिए—
कानूनी अधिकार क्या है? प्रक्रिया क्या है? प्रभावित व्यक्ति को क्या अवसर मिला? पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था आवश्यक है या नहीं? और क्या कार्रवाई समान रूप से लागू हो रही है?
यही विधि का शासन है।
किसी गरीब की झोपड़ी हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की संपत्ति—कानून का पैमाना अलग-अलग नहीं होना चाहिए।
प्रशासन का अर्थ केवल आदेश जारी करना नहीं
उत्तराखंड सरकार ने “जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शिकायतों के समाधान और प्रशासन को जनता तक पहुंचाने की बात कही है। सरकार के अनुसार 216 शिविरों में 1.44 लाख से अधिक लोगों को लाभ मिला और 18,360 शिकायतों में 13,068 का निस्तारण किया गया।
यह प्रशासनिक पहुंच का एक पहलू है। लेकिन लोकतांत्रिक शासन की अगली परीक्षा इससे भी महत्वपूर्ण है—
क्या नागरिक को शिकायत करने की आवश्यकता ही कम हो रही है?
अच्छा प्रशासन वह नहीं जिसमें नागरिक हर समस्या के लिए ज्ञापन लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाता रहे। अच्छा प्रशासन वह है जिसमें व्यवस्था पहले से ऐसी हो कि नागरिक को उसके अधिकार और आवश्यक सेवाएं समय पर, पारदर्शी तरीके से और बिना अनावश्यक संघर्ष के मिलें।
कोटद्वार को केवल नगर नहीं, नागरिक व्यवस्था के रूप में देखना होगा
कोटद्वार में आज यातायात, सार्वजनिक परिवहन, सड़क, नगर नियोजन, कर व्यवस्था, जलनिकासी, पर्यावरण, वन मार्ग और नागरिक सुविधाओं से जुड़े अनेक प्रश्न सामने आ रहे हैं।
हाल के दिनों में हाईवे चौड़ीकरण के कारण गुमखाल-सतपुली मार्ग पर जाम, धूल और गड्ढों से यात्रियों की परेशानी की रिपोर्ट सामने आई है। सिटी बस संचालन की मांग भी मुख्यमंत्री तक पहुंचाई गई है।
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखने पर स्पष्ट होता है कि शहरी विकास केवल निर्माण कार्यों का नाम नहीं है।
शहर तभी विकसित माना जाएगा जब—
- नागरिक सुरक्षित यात्रा कर सके,
- पैदल चलने वाले के लिए रास्ता हो,
- बुजुर्ग और दिव्यांग व्यक्ति सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच सके,
- आपातकाल में एंबुलेंस और दमकल पहुंच सके,
- बारिश में जलभराव से जीवन और संपत्ति की सुरक्षा हो,
- सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हो,
- कानून सभी पर समान रूप से लागू हो,
- और नागरिक को प्रशासन के सामने अपनी बात रखने के लिए सम्मानजनक व्यवस्था मिले।
सरकार की शक्ति की सीमा संविधान तय करता है
लोकतंत्र में सरकार शक्तिशाली होती है, लेकिन उसकी शक्ति असीमित नहीं होती।
विधायिका कानून बनाती है।
कार्यपालिका कानून लागू करती है।
न्यायपालिका कानून और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करती है।
मीडिया और नागरिक समाज शासन को प्रश्नों के घेरे में रखते हैं।
और अंततः नागरिक लोकतंत्र का केंद्र है।
इसलिए किसी अधिकारी का आदेश अंतिम सत्य नहीं है। किसी सरकारी कार्यालय की फाइल कानून से ऊपर नहीं है। कोई स्थानीय निकाय संविधान से बाहर नहीं है।
सरकारी शक्ति भी कानून से बंधी हुई शक्ति है।
यही लोकतंत्र और मनमाने शासन के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।
जवाबदेही का मतलब सरकार का विरोध नहीं
सरकार से सवाल पूछना सरकार का विरोध करना नहीं है।
पुलिस से पूछना कि सड़क पर बिना नंबर वाहन क्यों चल रहे हैं—कानून-व्यवस्था के पक्ष में सवाल है।
नगर निगम से पूछना कि कर किस आधार पर लिया जा रहा है—करदाता के अधिकार का सवाल है।
प्रशासन से पूछना कि किसी कार्रवाई की वैधानिक प्रक्रिया क्या है—संविधान के पक्ष में सवाल है।
सड़क निर्माण में सुरक्षा मानकों पर सवाल उठाना विकास विरोध नहीं है।
और आपदा प्रबंधन की तैयारी पर सवाल करना सरकार विरोध नहीं, बल्कि नागरिक सुरक्षा के पक्ष में लोकतांत्रिक निगरानी है।
अब जरूरत “शासन” से आगे “संवैधानिक शासन” की है
उत्तराखंड के सामने आज विकास और पर्यावरण, शहर और गांव, सड़क और सुरक्षा, रोजगार और पलायन, पर्यटन और वहन क्षमता जैसे अनेक प्रश्न हैं।
इनका समाधान केवल अधिक सरकारी योजनाओं में नहीं है।
समाधान है—
कानून आधारित निर्णय।
पारदर्शी प्रशासन।
समान कानून।
समयबद्ध शिकायत निवारण।
नागरिक सहभागिता।
उत्तरदायी स्थानीय निकाय।
और प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायसंगत प्रक्रिया।
कोटद्वार जैसे शहरों में हर बड़े विकास कार्य के साथ Citizen Safety Audit और Public Accountability Report जैसी व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। इससे यह देखा जा सकता है कि किसी परियोजना से पहले और बाद में नागरिक सुरक्षा, यातायात, पर्यावरण और सार्वजनिक सुविधाओं पर क्या प्रभाव पड़ा।
अंतिम सवाल
आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि सरकार क्या कर रही है?
सवाल यह है—
सरकार जो कर रही है, वह संविधान और कानून के अनुरूप कितनी है?
और उससे भी आगे—
उस सरकारी गतिविधि का अंतिम लाभ नागरिक की जिंदगी में कितना दिखाई दे रहा है?
क्योंकि लोकतंत्र में सड़क, पुल, भवन, कार्यालय और योजनाएं साधन हैं; नागरिक उनका केंद्र है।
उत्तराखंड का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब विकास की गति के साथ कानून का शासन, प्रशासन की जवाबदेही और नागरिक की सुरक्षा भी उतनी ही मजबूत होगी।
देश संविधान से चलता है।
सरकार संविधान के अधीन चलती है।
प्रशासन कानून के अनुसार चलता है।
और लोकतंत्र नागरिक के अधिकारों की रक्षा से मजबूत होता है।
कोटद्वार से उठने वाला यह सवाल केवल कोटद्वार का सवाल नहीं है।
यह सवाल है—क्या हमारे शहरों में संविधान केवल किताब में है, या नागरिक के जीवन में भी दिखाई देता है?
