रामनाथ गोयनका से आज तक—माध्यम बदले, पत्रकारिता का सवाल नहीं
पत्रकारिता का पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सत्ता नाराज होगी या खुश। पहला सवाल होना चाहिए—सच क्या है?
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम केवल पत्रकार या मीडिया मालिक के रूप में दर्ज नहीं होते। वे एक विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं। रामनाथ गोयनका ऐसा ही एक नाम हैं।
उन्होंने जिस पत्रकारिता की परंपरा को मजबूत किया, उसमें अखबार सत्ता का प्रवक्ता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी था। आज इंडियन एक्सप्रेस समूह नई पीढ़ी और डिजिटल माध्यमों के दौर में आगे बढ़ रहा है। अनंत गोयनका के नेतृत्व में समूह ने डिजिटल और नए मीडिया के विस्तार पर भी ध्यान दिया है। माध्यम बदल गया है, पाठक बदल गया है, खबर पढ़ने और देखने का तरीका बदल गया है—लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता का मूल प्रश्न आज भी वही है।
क्या पत्रकार सत्ता से असुविधाजनक सवाल पूछ सकता है?
जब सत्ता मजबूत हो, तब पत्रकारिता की परीक्षा होती है
सत्ता के साथ खड़े होकर खबर लिखना आसान हो सकता है। मुश्किल तब शुरू होती है जब किसी सरकारी निर्णय, नीति या व्यवस्था पर दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाना हो।
यही वह जगह है जहां पत्रकारिता की असली परीक्षा होती है।
लोकतंत्र में सरकार को जनता ने अधिकार दिया है। पत्रकार को जनता ने कोई संवैधानिक सत्ता नहीं दी, लेकिन उसे जनता के जानने के अधिकार की रक्षा करने की सामाजिक जिम्मेदारी मिली है।
इसलिए पत्रकार का काम सरकार गिराना नहीं है।
पत्रकार का काम सरकार बनाना भी नहीं है।
उसका काम है—सरकार क्या कर रही है, क्यों कर रही है, किस कानून के तहत कर रही है, उसका प्रभाव किस पर पड़ेगा और क्या जनता को इसकी पूरी जानकारी है—इन सवालों को सामने रखना।
रामनाथ गोयनका की विरासत
रामनाथ गोयनका और इंडियन एक्सप्रेस का इतिहास भारतीय प्रेस की स्वतंत्रता की बहस से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
विशेषकर आपातकाल का दौर पत्रकारिता के लिए एक बड़ी परीक्षा था। सेंसरशिप के बीच इंडियन एक्सप्रेस द्वारा संपादकीय पृष्ठ पर खाली स्थान प्रकाशित करना प्रेस की स्वतंत्रता के इतिहास में एक प्रतीकात्मक घटना बन गया।
वह खाली स्थान पाठकों के लिए एक संदेश था।
जब शब्दों को रोक दिया जाए तो पत्रकारिता कभी-कभी मौन के माध्यम से भी सवाल पूछ सकती है।
लेकिन उस दौर को केवल इतिहास की किताब में बंद कर देना पर्याप्त नहीं है।
आज पत्रकारिता के सामने दबाव के स्वरूप बदल चुके हैं।
आज सेंसरशिप हमेशा आदेश के रूप में नहीं आती
आज कोई पत्रकार केवल इसलिए चुप नहीं होता कि उसके सामने सेंसर का आदेश पड़ा है।
कई बार दबाव दूसरे रूप में आता है।
विज्ञापन का दबाव।
व्यावसायिक हित।
राजनीतिक संबंध।
सोशल मीडिया की भीड़।
ट्रोलिंग।
कानूनी नोटिस।
‘एक्सक्लूसिव’ खबर की जल्दबाजी।
और सबसे बड़ा दबाव—दर्शक और पाठक की पसंद के अनुसार खबर को मोड़ने का दबाव।
डिजिटल युग में क्लिक और व्यू महत्वपूर्ण हो गए हैं। लेकिन पत्रकारिता का मूल्य केवल क्लिक से तय नहीं हो सकता।
अगर खबर वायरल है लेकिन तथ्यहीन है, तो वह पत्रकारिता नहीं है।
अगर खबर सरकार के पक्ष में है लेकिन उसके तथ्य सही हैं, तो वह पत्रकारिता हो सकती है।
अगर खबर सरकार के खिलाफ है लेकिन उसके तथ्य गलत हैं, तो वह भी पत्रकारिता नहीं है।
पत्रकारिता का पैमाना पक्ष नहीं, तथ्य होना चाहिए।
सत्ता किसी भी दल की हो
स्वतंत्र पत्रकारिता की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि उसका सिद्धांत सत्ता बदलने के साथ न बदले।
आज जो दल सत्ता में है, कल वह विपक्ष में हो सकता है।
आज जो नेता आलोचना कर रहा है, कल वह सरकार में हो सकता है।
इसलिए पत्रकारिता का रिश्ता किसी पार्टी से नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही से होना चाहिए।
सरकार की अच्छी योजना है तो उसका उल्लेख होना चाहिए।
सरकार की नीति में गंभीर कमी है तो उसका विश्लेषण होना चाहिए।
विपक्ष का आरोप है तो उसे आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, तथ्य के रूप में नहीं—जब तक उसका स्वतंत्र प्रमाण न मिल जाए।
और यदि किसी खबर में गलती हो जाए तो उसे सुधारना भी पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।
आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी
आज सोशल मीडिया ने एक गंभीर समस्या पैदा की है।
किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना कुछ सेकंड का काम है।
लेकिन उस आरोप को प्रमाणित करना पत्रकारिता है।
एक दस्तावेज खोजने में समय लगता है।
सरकारी रिकॉर्ड पढ़ने में समय लगता है।
आरटीआई के जवाबों को समझने में समय लगता है।
दूसरे पक्ष से प्रतिक्रिया लेने में समय लगता है।
कानूनी स्थिति समझने में समय लगता है।
यही मेहनत पत्रकारिता को सोशल मीडिया पोस्ट से अलग करती है।
आरोप खबर नहीं है।
आरोप की जांच खबर हो सकती है।
पत्रकार को भी सवालों के सामने खड़ा होना चाहिए
स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार स्वयं जवाबदेही से मुक्त हो जाए।
जिस तरह पत्रकार सरकार से सवाल पूछता है, उसी तरह पाठक को पत्रकार से भी सवाल पूछने का अधिकार है।
स्रोत क्या है?
दस्तावेज कहां है?
दूसरा पक्ष क्या कहता है?
क्या खबर और टिप्पणी अलग-अलग रखी गई हैं?
क्या शीर्षक खबर से बड़ा तो नहीं बना दिया गया?
क्या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली बात के पर्याप्त प्रमाण हैं?
ये सवाल पत्रकारिता को कमजोर नहीं करते।
ये पत्रकारिता को मजबूत करते हैं।
अनंत गोयनका और बदलती मीडिया दुनिया
रामनाथ गोयनका की पीढ़ी में अखबार मुख्य माध्यम था।
आज मोबाइल फोन ही अखबार, टीवी, रेडियो और कैमरा बन गया है।
एक पत्रकार कुछ मिनट में वीडियो प्रकाशित कर सकता है। पाठक सीधे प्रतिक्रिया दे सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म वैश्विक पहुंच दे सकते हैं।
अनंत गोयनका के नेतृत्व में इंडियन एक्सप्रेस समूह भी इस बदलती मीडिया व्यवस्था में डिजिटल विस्तार और नए प्रारूपों के साथ आगे बढ़ रहा है।
लेकिन डिजिटल परिवर्तन के बीच सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी नहीं है।
विश्वसनीयता बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
क्योंकि डिजिटल युग में सूचना बहुत है, लेकिन विश्वसनीय सूचना की आवश्यकता उससे भी ज्यादा है।
छोटे शहरों की पत्रकारिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है
दिल्ली और मुंबई से निकलने वाली बड़ी खबरें राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करती हैं।
लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा जिलों, कस्बों और गांवों में होती है।
नगरपालिका का निर्णय किसके घर को प्रभावित करेगा?
सड़क बनने से किसकी जमीन जाएगी?
सरकारी अस्पताल में दवा है या नहीं?
स्कूल में शिक्षक हैं या नहीं?
दिव्यांग व्यक्ति को उसका अधिकार मिल रहा है या नहीं?
किसान को भुगतान मिला या नहीं?
युवा को रोजगार मिला या केवल घोषणा?
नदी, जंगल और जमीन पर लिए गए फैसलों का स्थानीय लोगों पर क्या असर होगा?
इन सवालों को रिकॉर्ड पर लाने वाली स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की पहली पंक्ति है।
पत्रकारिता का भविष्य
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता को बदल रहा है।
अब खबर का मसौदा तैयार करना, वीडियो बनाना, अनुवाद करना और सामग्री का वितरण पहले से तेज हो सकता है।
लेकिन एआई यह तय नहीं कर सकता कि किसी गांव की समस्या वास्तव में क्या है।
वह किसी अधिकारी से कठिन सवाल पूछने की नैतिक जिम्मेदारी अपने आप नहीं उठा सकता।
वह दस्तावेज की प्रामाणिकता के लिए पत्रकार की जवाबदेही को समाप्त नहीं कर सकता।
तकनीक पत्रकार की मदद कर सकती है।
लेकिन पत्रकारिता की रीढ़ आज भी मनुष्य की सत्य के प्रति जिम्मेदारी है।
आखिर पत्रकारिता किसके लिए?
यह प्रश्न हर पत्रकार को अपने आप से पूछना चाहिए।
सरकार के लिए?
विज्ञापनदाता के लिए?
राजनीतिक दल के लिए?
सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के लिए?
या जनता के लिए?
उत्तर स्पष्ट होना चाहिए—जनता के लिए।
इसका अर्थ किसी पक्ष का समर्थन करना नहीं है।
इसका अर्थ है जनता को पर्याप्त तथ्य देना ताकि नागरिक स्वयं अपना मत बना सके।
यही लोकतंत्र का मूल है।
रामनाथ गोयनका से आगे
रामनाथ गोयनका से अनंत गोयनका तक की यात्रा को केवल एक परिवार या मीडिया संस्थान की कहानी के रूप में देखना इस विरासत को छोटा कर देना होगा।
यह उस विचार की यात्रा है जिसमें पत्रकारिता को लोकतंत्र में एक स्वतंत्र संस्था के रूप में देखा गया।
पीढ़ियां बदलेंगी।
तकनीक बदलेगी।
अखबार की जगह मोबाइल स्क्रीन ले सकती है।
वीडियो और पॉडकास्ट खबर के नए माध्यम बन सकते हैं।
एआई न्यूज़रूम का हिस्सा बन सकता है।
लेकिन पत्रकारिता का मूल प्रश्न नहीं बदलना चाहिए—
सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?
अगर पत्रकारिता यह सवाल पूछना बंद कर देगी, तो लोकतंत्र में सूचना तो बहुत होगी, लेकिन जवाबदेही कम हो सकती है।
इसलिए रामनाथ गोयनका की विरासत का सबसे बड़ा अर्थ किसी एक अखबार की प्रशंसा नहीं, बल्कि उस मूल सिद्धांत को समझना है—
पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए केवल अखबार बचाना पर्याप्त नहीं है।
सवाल पूछने की स्वतंत्रता, तथ्य की विश्वसनीयता और जनता के जानने के अधिकार को बचाना होगा।
माध्यम बदलेंगे। पत्रकार बदलेंगे। संपादक बदलेंगे। तकनीक बदलेगी।
लेकिन जब तक कोई पत्रकार यह कहने का साहस रखता है
“इसका प्रमाण क्या है?”
तब तक पत्रकारिता जिंदा है।
