संपादकीय
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं है। राजनीतिक दलों की तैयारियां तेज होंगी, नए समीकरण बनेंगे, पुराने वादे दोहराए जाएंगे और जनता के सामने फिर विकास, राष्ट्रवाद, धर्म, क्षेत्र और राजनीतिक नेतृत्व के अनेक सवाल रखे जाएंगे।
लेकिन इस बार उत्तराखंड के मतदाता को एक सवाल राजनीतिक दलों से जरूर पूछना चाहिए—पिछले वर्षों में पहाड़ की जिंदगी वास्तव में कितनी बदली?
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह असहमति को जगह देता है। सरकार के काम की प्रशंसा करना भी नागरिक का अधिकार है और उसकी कमियों पर सवाल उठाना भी। लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक बहस केवल दलों और नेताओं के पक्ष-विपक्ष तक सीमित न रहे, बल्कि उत्तराखंड के वास्तविक सवालों पर केंद्रित हो।
उत्तराखंड का सबसे बड़ा सवाल आज भी रोजगार है। अगर पहाड़ का युवा रोजगार के लिए देहरादून, ऋषिकेश, हल्द्वानी, दिल्ली और दूसरे राज्यों की ओर जाने को मजबूर है, तो विकास के दावों का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए कि उसके गांव में रोजगार और स्वरोजगार के कितने अवसर पैदा हुए।
पलायन केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है। यह बंद होते घरों, खाली होते गांवों, घटते स्कूलों और कमजोर होती स्थानीय अर्थव्यवस्था की कहानी है।
2027 के चुनाव में यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था को सरकारी नौकरियों के अलावा स्थानीय उद्यम, कृषि, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन, आयुष, वन उत्पाद और छोटे उद्योगों से कितना मजबूत किया गया।
स्वास्थ्य और शिक्षा भी चुनावी घोषणापत्रों की औपचारिक घोषणाएं नहीं, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व के प्रश्न हैं। कितने गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध है? कितने अस्पतालों में डॉक्टर और विशेषज्ञ मौजूद हैं? कितनी गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को इलाज के लिए मैदानों की ओर भागना पड़ता है? कितने सरकारी स्कूल इसलिए कमजोर हो रहे हैं क्योंकि वहां विद्यार्थी कम हैं और कितने इसलिए क्योंकि व्यवस्था ने उन्हें मजबूत करने की कोशिश ही नहीं की?
इसी तरह सड़क और भवन को ही विकास मान लेने की प्रवृत्ति पर भी सवाल होना चाहिए। सड़क जरूरी है, लेकिन सड़क के दोनों ओर आर्थिक गतिविधि पैदा करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
उत्तराखंड का जंगल, पानी और जमीन केवल संसाधन नहीं हैं। यही इस राज्य की जीवनरेखा हैं। विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई, पहाड़ों की कटिंग, नदियों और जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव तथा आपदा के बढ़ते खतरे के बीच यह सवाल जरूरी है कि विकास का मॉडल पहाड़ की भौगोलिक संवेदनशीलता के अनुरूप है या नहीं।
शहरी उत्तराखंड भी अलग चुनौती के सामने है। नगरों का विस्तार, अतिक्रमण, सड़कें, यातायात, स्थानीय व्यापारियों और छोटे कारोबारियों के अधिकार तथा नियोजन की कमी—इन सभी मुद्दों का समाधान केवल बुलडोजर या नोटिस नहीं हो सकता। नगर नियोजन का उद्देश्य मनुष्य को हटाना नहीं, शहर को व्यवस्थित करना होना चाहिए।
2027 में जनता को यह भी देखना होगा कि राजनीतिक दल स्थानीय नागरिक को केवल वोटर मानते हैं या राज्य की अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार भी।
राष्ट्रवाद, धर्म और राजनीतिक पहचान लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इनके बीच उत्तराखंड के मूल सवाल खो नहीं जाने चाहिए।
देशहित में उत्तराखंड को मजबूत बनाना है तो पहाड़ में रोजगार पैदा करना होगा।
राज्यहित में गांव बचाने हैं तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा।
समाजहित में शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी।
लोकतंत्र में असहमति को दुश्मनी समझना सबसे बड़ी भूल है। जो नागरिक सरकार से सवाल पूछता है, वह सरकार का विरोधी नहीं; वह लोकतंत्र का सक्रिय नागरिक है।
इसलिए 2027 का चुनाव केवल यह तय करने का चुनाव नहीं होना चाहिए कि कौन-सी पार्टी सत्ता में आएगी।
यह चुनाव इस बात का भी होना चाहिए कि अगले पांच वर्षों में उत्तराखंड किस दिशा में जाएगा।
क्या पहाड़ में रोजगार आएगा या पलायन जारी रहेगा?
क्या गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी या गांव केवल चुनावी भाषणों में बचेंगे?
क्या सरकारी स्कूल और अस्पताल मजबूत होंगे?
क्या स्थानीय कारोबारियों और उद्यमियों को अवसर मिलेगा?
क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उत्तराखंड का युवा अपने भविष्य की कल्पना उत्तराखंड में ही कर सकेगा?
2027 के मतदाता के सामने असली चुनौती यही है।
चेहरा कोई भी हो, पार्टी कोई भी हो—सवाल उत्तराखंड के होने चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता बदलना ही परिवर्तन नहीं है।
जनता के सवालों का सत्ता की प्राथमिकताओं में बदल जाना ही वास्तविक लोकतांत्रिक परिवर्तन है।
