केरल के कासरगोड में माइक्रोचिप से होगी पहचान, टीकाकरण और नसबंदी का पूरा रिकॉर्ड
कासरगोड। आवारा कुत्तों की पहचान और उनके प्रबंधन को डिजिटल बनाने की दिशा में केरल ने एक नई पहल शुरू की है। कासरगोड जिला राज्य का पहला जिला बन गया है, जहां आवारा कुत्तों की माइक्रोचिपिंग शुरू की गई है। इसका उद्देश्य प्रत्येक कुत्ते का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना और उसके टीकाकरण, नसबंदी तथा उपचार की जानकारी को व्यवस्थित तरीके से दर्ज करना है।
माइक्रोचिप में दर्ज होगी कुत्ते की जानकारी
कासरगोड नगरपालिका और पशुपालन विभाग ने जनरल अस्पताल परिसर से इस अभियान की शुरुआत की। अभियान के दौरान आवारा कुत्तों को पकड़ा गया, उन्हें रेबीज रोधी टीका लगाया गया और उनकी गर्दन की त्वचा के नीचे माइक्रोचिप लगाकर फिर उसी क्षेत्र में छोड़ दिया गया।
माइक्रोचिप के जरिए संबंधित कुत्ते का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा सकेगा। इसमें कुत्ते को कहां पकड़ा गया, टीकाकरण की स्थिति, नसबंदी, उपचार, दवाओं, दोबारा टीकाकरण और कुत्ते के काटने से जुड़ी घटनाओं जैसी जानकारियां दर्ज की जा सकती हैं। रिकॉर्ड में स्थान संबंधी जानकारी और मृत्यु की सूचना भी जोड़ी जा सकती है।
‘Shwan Suraksha Digital Platform’ से निगरानी
इस व्यवस्था के लिए ‘Shwan Suraksha Digital Platform’ का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह मंच बेंगलुरु स्थित Data Power Technologies ने विकसित किया है। कंपनी के अनुसार ऐसी व्यवस्था कर्नाटक के मैसूर और मणिपाल में भी शुरू की जा चुकी है। केरल के अन्य नगर निकायों तक इसे विस्तार देने पर भी चर्चा चल रही है।
‘कुत्तों का आधार’ कहना कितना सही?
माइक्रोचिप को आम बोलचाल में ‘कुत्तों का आधार कार्ड’ कहा जा रहा है, लेकिन तकनीकी रूप से यह आधार कार्ड नहीं है। यह एक डिजिटल पहचान और स्वास्थ्य रिकॉर्ड प्रणाली है, जिसके जरिए किसी कुत्ते को दोबारा पहचानना और उसके पिछले टीकाकरण या नसबंदी की जानकारी हासिल करना आसान हो सकता है।
इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि आवारा कुत्तों के प्रबंधन में अक्सर यह चुनौती रहती है कि किस कुत्ते को पहले टीका लगाया गया, किसकी नसबंदी हो चुकी है और किसे दोबारा उपचार या टीकाकरण की जरूरत है।
रेबीज नियंत्रण में भी मदद की उम्मीद
केरल में यह पहल एंटी-रेबीज टीकाकरण और Animal Birth Control कार्यक्रम के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने की योजना का हिस्सा है। राज्य में स्थानीय निकाय पहले से ही आवारा कुत्तों के टीकाकरण और नसबंदी का रिकॉर्ड रखने के लिए डिजिटल प्रणालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। तिरुवनंतपुरम में नगर निगम का स्ट्रे डॉग मॉनिटरिंग सिस्टम वार्ड स्तर पर टीकाकरण, नसबंदी और शिकायतों की निगरानी करता है।
उत्तराखंड के लिए भी बन सकता है मॉडल
केरल की यह पहल उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी, नैनीताल और कोटद्वार जैसे शहरों में यदि नगर निकाय आवारा कुत्तों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करें तो पहचान, टीकाकरण, नसबंदी, उपचार और शिकायतों को एक ही व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है।
इससे नगर निकायों को यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि किसी क्षेत्र में कितने कुत्तों का टीकाकरण और नसबंदी हो चुकी है और किन इलाकों में अभियान की जरूरत बाकी है।
सवाल सिर्फ माइक्रोचिप लगाने का नहीं है। असली चुनौती इस रिकॉर्ड को लगातार अद्यतन रखने, टीकाकरण और नसबंदी को नियमित करने तथा सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखने की है।
उदाहरण के तौर पर, केरल की यह पहल दिखाती है कि आवारा कुत्तों की समस्या को केवल पकड़ने या हटाने के बजाय उनकी पहचान और स्वास्थ्य रिकॉर्ड को भी वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है।
