“The Courage to Be Disliked” का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह नहीं है कि हमें दूसरों की परवाह करना छोड़ देना चाहिए। इसका असली अर्थ है—दूसरों की स्वीकृति पर अपना जीवन निर्भर मत कीजिए।
यह विचार पत्रकारिता के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
एक पत्रकार का काम हर किसी को खुश करना नहीं है। उसका पहला दायित्व सत्य, तथ्य और जनहित के प्रति है। यदि कोई खबर सत्ता को असुविधाजनक लगती है, किसी प्रभावशाली व्यक्ति को पसंद नहीं आती या किसी संस्था के कामकाज पर सवाल उठाती है, तो केवल इस डर से खबर रोक देना कि लोग नाराज़ हो जाएंगे—पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
हर प्रतिक्रिया आपकी जिम्मेदारी नहीं
किताब का एक महत्वपूर्ण विचार है—“Separation of Tasks”, यानी अपने काम और दूसरे व्यक्ति के काम को अलग करना।
पत्रकार का काम है:
- तथ्य जुटाना
- दस्तावेजों की जाँच करना
- संबंधित पक्ष का पक्ष लेना
- गलती हो तो सुधारना
- और जनहित में सवाल उठाना
लेकिन खबर पढ़कर कोई नाराज़ होगा या खुश, इसकी पूरी जिम्मेदारी पत्रकार की नहीं है।
यही अंतर पत्रकार को स्वतंत्र बनाता है।
आलोचना से डरना नहीं, उससे सीखना
“नापसंद किए जाने का साहस” का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार अपनी गलती स्वीकार न करे।
एक स्वतंत्र पत्रकार को आलोचना सुननी चाहिए। यदि तथ्य गलत हैं तो उन्हें सुधारना चाहिए। यदि दूसरा पक्ष मजबूत तथ्य प्रस्तुत करता है तो उसे प्रकाशित करना चाहिए।
लेकिन आलोचना और दबाव में अंतर है।
आलोचना कहती है—
“आपका तथ्य गलत है।”
दबाव कहता है—
“यह खबर मत छापिए, वरना परिणाम भुगतेंगे।”
पहली स्थिति पत्रकारिता का हिस्सा है। दूसरी स्थिति पत्रकारिता की स्वतंत्रता की परीक्षा है।
सत्ता से सवाल और समाज से संवाद
लोकतंत्र में पत्रकार का स्थान सत्ता के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने वाले स्वतंत्र सार्वजनिक प्रहरी के रूप में होना चाहिए।
सरकार अच्छा काम करे तो उसकी जानकारी जनता तक पहुंचाना भी पत्रकारिता है।
सरकार से गलती हो तो सवाल उठाना भी पत्रकारिता है।
विपक्ष गलत करे तो उस पर सवाल करना भी पत्रकारिता है।
व्यवसायी, अधिकारी, राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या स्वयं मीडिया संस्थान—किसी को भी तथ्यात्मक जांच से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
लोकप्रिय होना और विश्वसनीय होना अलग बातें हैं
सोशल मीडिया के दौर में पत्रकार के सामने एक नया दबाव है—लाइक, शेयर और वायरल होने का दबाव।
लेकिन पत्रकारिता का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि कितने लोगों ने खबर पसंद की।
कभी-कभी सबसे महत्वपूर्ण खबर वही होती है जिसे पढ़कर लोग असहज हों।
कभी एक छोटा-सा दस्तावेज हजारों नारों से अधिक महत्वपूर्ण होता है।
कभी एक RTI का जवाब पूरी व्यवस्था से बड़ा सवाल खड़ा कर देता है।
इसलिए पत्रकार को यह तय करना पड़ता है कि उसे लोकप्रिय बनना है या विश्वसनीय।
दोनों हमेशा एक साथ नहीं मिलते।
“मैं क्या नियंत्रित कर सकता हूँ?”
किताब का एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है:
आपके नियंत्रण में क्या है?
पत्रकार के नियंत्रण में है—
उसकी ईमानदारी, उसकी मेहनत, उसकी तथ्य-जाँच और उसकी भाषा।
उसके नियंत्रण में नहीं है—
सत्ता की प्रतिक्रिया, पाठक की प्रतिक्रिया, सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया या किसी व्यक्ति की नाराज़गी।
यही समझ पत्रकार को मानसिक और पेशेवर स्वतंत्रता देती है।
पत्रकारिता में साहस का अर्थ
साहस का अर्थ हर बात में सरकार का विरोध करना नहीं है।
साहस का अर्थ हर बात में सरकार का समर्थन करना भी नहीं है।
साहस का अर्थ है—
जिसके पक्ष में तथ्य हों, उसके पक्ष में तथ्य लिखना;
जिसके खिलाफ तथ्य हों, उसके खिलाफ तथ्य लिखना;
और जहाँ तथ्य उपलब्ध न हों, वहाँ अनुमान को तथ्य बनाकर न लिखना।
यही पत्रकारिता की रीढ़ है।
अंत में
“The Courage to Be Disliked” हमें यह समझाता है कि मनुष्य अपनी जिंदगी दूसरों की स्वीकृति के लिए नहीं जी सकता।
पत्रकारिता भी इसी सिद्धांत की परीक्षा है।
अगर पत्रकार हर शक्तिशाली व्यक्ति को खुश करना चाहता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता खो देता है।
लेकिन यदि वह तथ्य के प्रति ईमानदार रहता है, आलोचना स्वीकार करता है, गलती सुधारता है और दबाव के बावजूद जनहित के सवाल पूछता है, तो वह केवल खबर नहीं लिखता—लोकतंत्र की सार्वजनिक स्मृति तैयार करता है।
नापसंद किए जाने का साहस, गलत होने का अहंकार नहीं है।
यह सही होने के लिए तथ्य की कसौटी पर खड़े रहने का साहस है।
और शायद स्वतंत्र पत्रकारिता की सबसे बड़ी पहचान भी यही है।
