संपादकीय: ‘सतलुज’—जब सिनेमा इतिहास के मौन को चुनौती देता है
इतिहास केवल विजेताओं की गाथा नहीं होता; वह उन लोगों की कहानी भी होता है जिन्होंने कठिन समय में असुविधाजनक प्रश्न पूछने का साहस किया। जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ इसी साहस का सिनेमाई दस्तावेज़ है। यह फिल्म ऐसे दौर की याद दिलाती है जब पंजाब आतंकवाद, भय, राजनीतिक अस्थिरता और कठोर सुरक्षा अभियानों के बीच झूल रहा था।
इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब ने भीषण आतंकवाद का सामना किया। सैकड़ों पुलिसकर्मी, जनप्रतिनिधि, पत्रकार और आम नागरिक हिंसा में मारे गए। राज्य के सामने कानून-व्यवस्था बहाल करने की कठिन चुनौती थी। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल संकट से निपटने में नहीं, बल्कि संकट के दौरान भी संविधान और कानून की मर्यादा बनाए रखने में होती है।
जसवंत सिंह खालड़ा ने कथित रूप से उन मामलों की पड़ताल की, जिनमें हिरासत के बाद लापता हुए लोगों के अंतिम संस्कार “लावारिस” के रूप में दर्ज किए गए थे। उनके उठाए प्रश्नों ने भारत ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मानवाधिकारों पर बहस छेड़ी। बाद में उनके अपहरण और हत्या के मामले में न्यायिक प्रक्रिया के तहत कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। यह केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं था, बल्कि इस सिद्धांत की पुष्टि भी थी कि लोकतंत्र में कानून से ऊपर कोई नहीं।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इतिहास को केवल एक कोण से न देखा जाए। आतंकवाद ने पंजाब को गहरे घाव दिए थे। निर्दोष नागरिकों और सुरक्षा बलों ने भी भारी कीमत चुकाई। इसलिए उस दौर की समीक्षा करते समय न तो आतंकवाद का महिमामंडन होना चाहिए और न ही मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर आरोपों को नज़रअंदाज़ किया जाना चाहिए। लोकतंत्र का दायित्व दोनों सच्चाइयों का ईमानदारी से सामना करना है।
‘सतलुज’ को लेकर उठे विवाद, सेंसरशिप पर बहस और इसकी रिलीज़ में आई बाधाएँ एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती हैं—क्या समाज अपने इतिहास के कठिन अध्यायों पर खुलकर चर्चा करने के लिए तैयार है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, आलोचना और ऐतिहासिक समीक्षा को स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि इन्हीं से संस्थाएँ अधिक जवाबदेह और मजबूत बनती हैं।
सिनेमा अदालत नहीं होता, और न ही वह अंतिम ऐतिहासिक सत्य प्रस्तुत करता है। लेकिन सिनेमा समाज से प्रश्न पूछ सकता है, बहस शुरू कर सकता है और उन आवाज़ों को सामने ला सकता है जिन्हें समय ने दबा दिया हो। इसलिए ऐसी फिल्मों का मूल्यांकन भावनाओं या राजनीतिक पूर्वाग्रहों से नहीं, बल्कि तथ्यों, न्यायिक अभिलेखों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर होना चाहिए।
एक लोकतंत्र की पहचान केवल उसकी चुनावी प्रक्रिया से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह अपने सबसे कठिन इतिहास को कितनी ईमानदारी से स्वीकार करता है। यदि हम अपने अतीत से सीखने का साहस रखते हैं, तभी भविष्य अधिक न्यायपूर्ण, सुरक्षित और संवैधानिक बन सकता है।
