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सैटेलाइट न्यूज़ चैनलों, 24 हजार पत्रकारों और बदलते मीडिया कारोबार का भविष्य

भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता पिछले तीन दशकों में जिस व्यवस्था पर सबसे अधिक निर्भर रही है, उसका सबसे महत्वपूर्ण शब्द रहा है—TRP यानी Television Rating Point

किस चैनल को कितने लोग देख रहे हैं, कौन-सा कार्यक्रम लोकप्रिय है, किस एंकर की पहुंच अधिक है और किस चैनल को विज्ञापनदाता कितना महत्व देंगे—इन तमाम सवालों का सबसे आसान जवाब TRP के आंकड़ों में खोजा जाता रहा है।

लेकिन अब सवाल यह है कि अगर TRP व्यवस्था समाप्त हो जाए, लंबे समय तक स्थगित रहे या उसका महत्व लगातार कम होता जाए तो भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता का क्या होगा?

क्या इससे पत्रकारिता को सनसनी, चीखती बहसों और ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की दौड़ से मुक्ति मिलेगी?

या फिर इसके विपरीत, विज्ञापन आधारित राजस्व मॉडल कमजोर होने से छोटे और मध्यम समाचार चैनल संकट में आ जाएंगे और हजारों पत्रकारों की नौकरियां अस्थिर हो जाएंगी?

यह सवाल केवल मीडिया संस्थानों का नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र, सूचना के अधिकार और पत्रकारिता के भविष्य का सवाल है।

TRP ने पत्रकारिता को बदला या बाजार ने पत्रकारिता को बदल दिया?

TRP अपने आप में बुरी व्यवस्था नहीं है।

दर्शक क्या देखना चाहते हैं, इसका वैज्ञानिक अनुमान किसी भी प्रसारण उद्योग के लिए आवश्यक है। समस्या तब पैदा होती है जब दर्शक संख्या ही पत्रकारिता की गुणवत्ता का एकमात्र पैमाना बन जाती है।

पिछले वर्षों में टीवी न्यूज के एक बड़े हिस्से में इसका असर दिखाई दिया।

किसी खबर की सामाजिक उपयोगिता से अधिक महत्वपूर्ण हो गया कि वह कितनी देर तक स्क्रीन पर टिक सकती है।

किसी मुद्दे की गंभीरता से अधिक महत्वपूर्ण हो गया कि उस पर कितनी तेज आवाज में बहस हो सकती है।

किसी रिपोर्ट की तथ्यात्मकता से अधिक महत्वपूर्ण हो गया कि वह कितनी ‘वायरल’ हो सकती है।

यहीं से पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा कमजोर होने लगी।

2026 में केंद्र सरकार द्वारा समाचार चैनलों की TRP रिपोर्टिंग रोकने का निर्णय भी इसी चिंता की पृष्ठभूमि में आया। सरकार ने कुछ चैनलों की कथित ‘अनावश्यक सनसनीखेज और अटकल आधारित’ रिपोर्टिंग को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि इससे सार्वजनिक स्तर पर घबराहट पैदा हो सकती है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—

TRP बंद करने से पत्रकारिता अपने आप जिम्मेदार नहीं हो जाएगी।

पत्रकारिता की गुणवत्ता बदलने के लिए संपादकीय संस्कृति, स्वामित्व संरचना, विज्ञापन व्यवस्था और पत्रकारों की कार्य परिस्थितियों में भी बदलाव आवश्यक होगा।

TRP हटेगी तो क्या ‘चीखती पत्रकारिता’ खत्म हो जाएगी?

संभव है कि कुछ हद तक।

अगर किसी चैनल के संपादकीय निर्णय पर हर सप्ताह TRP का दबाव नहीं होगा, तो संपादक के पास ऐसे विषय चुनने की अधिक गुंजाइश हो सकती है जिनकी तत्काल दर्शक संख्या कम लेकिन सार्वजनिक महत्व अधिक है।

उदाहरण के लिए—

  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • बेरोजगारी
  • पलायन
  • स्थानीय प्रशासन
  • न्यायपालिका
  • आदिवासी और पर्वतीय समाज
  • छोटे शहरों की समस्याएं
  • कृषि
  • जल संकट

इन मुद्दों की टीआरपी किसी चीखती राजनीतिक बहस से कम हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र के लिए उनका महत्व कहीं अधिक हो सकता है।

इस अर्थ में TRP का कमजोर होना पत्रकारिता को बाजार से पूरी तरह मुक्त नहीं करेगा, लेकिन बाजार के एक महत्वपूर्ण दबाव को जरूर कम कर सकता है।

लेकिन दूसरी तस्वीर ज्यादा गंभीर है

यहां मीडिया उद्योग की वास्तविक अर्थव्यवस्था सामने आती है।

एक सैटेलाइट चैनल केवल एंकर और स्टूडियो से नहीं चलता।

उसके पीछे होते हैं—

रिपोर्टर, कैमरापर्सन, वीडियो एडिटर, ग्राफिक्स टीम, PCR कर्मचारी, MCR कर्मचारी, तकनीकी कर्मचारी, ब्यूरो प्रमुख, स्ट्रिंगर, असाइनमेंट डेस्क, प्रोड्यूसर, ड्राइवर, प्रशासनिक कर्मचारी और विज्ञापन एवं वितरण से जुड़े लोग।

देश के सैटेलाइट न्यूज उद्योग में हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े हुए हैं। लगभग 24 हजार पत्रकारों के प्रभावित होने का आंकड़ा यदि उद्योग के आकलन के रूप में लिया जाए, तो TRP व्यवस्था में बदलाव का प्रश्न केवल पत्रकारिता की गुणवत्ता का नहीं बल्कि रोजगार की सुरक्षा का भी प्रश्न बन जाता है।

यदि TRP पूरी तरह खत्म होती है और उसके स्थान पर विश्वसनीय वैकल्पिक audience measurement नहीं आता, तो विज्ञापनदाता पूछेंगे—

“हम अपने पैसे किस आधार पर खर्च करें?”

और यही वह जगह है जहां संकट पैदा हो सकता है।

विज्ञापनदाता TRP के बिना क्या करेगा?

विज्ञापनदाता को दर्शक चाहिए।

उसे यह जानना है कि उसके विज्ञापन को कितने लोग देख रहे हैं और किस वर्ग के लोग देख रहे हैं।

यदि TRP नहीं होगी तो विज्ञापनदाता दूसरे आंकड़ों की ओर जाएगा।

यहां डिजिटल प्लेटफॉर्म पहले से तैयार हैं।

YouTube के पास views और watch time हैं।

Facebook और Instagram के पास engagement data है।

OTT प्लेटफॉर्म के पास viewing behaviour है।

Digital news portals के पास page views, unique users, watch time और engagement के आंकड़े हैं।

अर्थात यदि टीवी अपने दर्शकों को मापने की विश्वसनीय व्यवस्था विकसित नहीं करता तो विज्ञापन टीवी से डिजिटल की ओर और तेजी से जा सकता है।

यह छोटे टीवी चैनलों के लिए बड़ी चुनौती होगी।

क्या TRP का अंत छोटे चैनलों को खत्म कर देगा?

जरूरी नहीं।

लेकिन अगर वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनी तो खतरा जरूर है।

बड़े चैनल अपनी पूंजी, ब्रांड और डिजिटल नेटवर्क के कारण संक्रमण झेल सकते हैं।

छोटे और क्षेत्रीय चैनल ज्यादा प्रभावित होंगे।

उत्तराखंड, हिमाचल, पूर्वोत्तर, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों के क्षेत्रीय चैनलों के सामने सवाल होगा—

क्या विज्ञापनदाता अब भी उन्हें पर्याप्त महत्व देगा?

अगर जवाब नहीं है तो सबसे पहला असर newsroom budgets पर पड़ेगा।

फिर फ्रीलांस पत्रकारों और स्ट्रिंगरों की आय घटेगी।

फिर ब्यूरो बंद होंगे।

फिर कर्मचारियों की संख्या कम होगी।

और अंततः स्थानीय पत्रकारिता कमजोर होगी।

इसलिए TRP की समाप्ति को केवल “पत्रकारिता की मुक्ति” कहना अधूरा निष्कर्ष होगा।

असली रास्ता TRP बंद करना नहीं, TRP को बदलना है

2026 में BARC ने TRP व्यवस्था में बदलाव करते हुए landing pages और barker channels से मिलने वाले दर्शक आंकड़ों को हटाने का निर्णय लिया और जून से न्यूज TRP की रिपोर्टिंग फिर शुरू की।

यह बदलाव महत्वपूर्ण संकेत देता है।

भविष्य शायद TRP के पूरी तरह खत्म होने का नहीं, बल्कि TRP 2.0 का है।

नई audience measurement व्यवस्था में केवल यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि कितने लोग देख रहे हैं।

यह भी देखा जाना चाहिए—

  • कितनी देर देखा?
  • किस आयु वर्ग ने देखा?
  • किस क्षेत्र के दर्शक थे?
  • टीवी पर कितना देखा गया?
  • मोबाइल पर कितना देखा गया?
  • OTT पर कितना देखा गया?
  • डिजिटल वीडियो पर कितना देखा गया?
  • दर्शकों ने सामग्री के साथ कितना engagement किया?

यानी भविष्य की मीडिया measurement व्यवस्था एक स्क्रीन नहीं, पूरे media ecosystem को मापने वाली होनी चाहिए।

पत्रकारिता का भविष्य ‘TRP बनाम No-TRP’ नहीं है

असल बहस इससे आगे की है।

भविष्य का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि TRP रहे या न रहे।

सवाल होना चाहिए—

क्या हम पत्रकारिता की सफलता को केवल दर्शक संख्या से मापेंगे या लोकतांत्रिक उपयोगिता से भी?

मान लीजिए किसी चैनल की एक रिपोर्ट ने किसी पहाड़ी गांव में पेयजल की समस्या हल कराई।

उस रिपोर्ट को 50 हजार लोगों ने देखा।

दूसरी तरफ किसी बहस को 50 लाख लोगों ने देखा, लेकिन उससे समाज को कोई वास्तविक सूचना या समाधान नहीं मिला।

तो पत्रकारिता की दृष्टि से कौन अधिक सफल है?

आज की TRP व्यवस्था इस प्रश्न का पर्याप्त उत्तर नहीं देती।

पत्रकारों की नौकरी की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल

अगर TRP प्रणाली में बड़ा परिवर्तन होता है तो सरकार और मीडिया उद्योग को एक और महत्वपूर्ण पहल करनी होगी—

पत्रकारों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा।

क्योंकि पत्रकार केवल चैनल की लागत नहीं हैं।

वे लोकतंत्र की सूचना-व्यवस्था का हिस्सा हैं।

इसलिए भविष्य की मीडिया नीति में निम्न व्यवस्था पर विचार होना चाहिए—

1. पत्रकार सुरक्षा कोष

मीडिया संस्थान, सरकार और उद्योग के योगदान से एक स्वतंत्र Journalist Welfare Fund बनाया जा सकता है।

2. संक्रमणकालीन रोजगार सुरक्षा

TRP या audience measurement प्रणाली में बड़े बदलाव के दौरान अचानक छंटनी से बचाने के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था हो।

3. छोटे क्षेत्रीय चैनलों के लिए विशेष नीति

स्थानीय और क्षेत्रीय पत्रकारिता को केवल बाजार की ताकतों के हवाले नहीं किया जा सकता।

4. डिजिटल संक्रमण प्रशिक्षण

टीवी पत्रकारों को मोबाइल journalism, OTT production, podcast, digital video, data journalism और AI-assisted journalism में प्रशिक्षित किया जाए।

5. मल्टी-प्लेटफॉर्म न्यूजरूम

एक पत्रकार केवल टीवी के लिए काम न करे।

वही रिपोर्ट—

TV bulletin, YouTube, website, short video, podcast, social media

पर अलग-अलग रूप में प्रस्तुत की जा सके।

इससे पत्रकार की productivity और रोजगार दोनों बढ़ सकते हैं।

क्या सैटेलाइट चैनलों का भविष्य खत्म हो रहा है?

नहीं।

लेकिन उनका स्वरूप बदल रहा है।

टीवी अब अकेला माध्यम नहीं रहेगा।

भविष्य में एक newsroom को एक साथ कई प्लेटफॉर्म के लिए सामग्री बनानी होगी।

एक रिपोर्टर सुबह किसी गांव में रिपोर्ट करेगा।

उसी रिपोर्ट से—

एक टीवी पैकेज बनेगा।

एक YouTube वीडियो बनेगा।

एक short reel बनेगी।

एक web story बनेगी।

एक podcast बनेगा।

और संभव है कि उसी विषय पर data visualization भी तैयार हो।

इस मॉडल में पत्रकार की भूमिका खत्म नहीं होगी।

पत्रकार की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी।

लेकिन पत्रकार को केवल कैमरे के सामने बोलने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि multi-platform content professional बनना पड़ेगा।

क्या TRP ने पत्रकारिता को सनसनीखेज बनाया?

कुछ हद तक, हां।

लेकिन केवल TRP को दोष देना भी गलत होगा।

इसके पीछे कई कारण हैं—

मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण,

विज्ञापन आधारित राजस्व मॉडल,

राजनीतिक ध्रुवीकरण,

24 घंटे का प्रसारण,

सोशल मीडिया का दबाव,

कम समय में अधिक content की आवश्यकता,

और newsroom में लगातार घटते संसाधन।

TRP इन सभी दबावों को मापने का माध्यम भर थी।

इसलिए अगर TRP हटा भी दी जाए लेकिन बाकी व्यवस्था वही रहती है, तो चैनल सनसनी के लिए दूसरे metrics खोज लेंगे।

आज TRP की जगह शायद YouTube views आ जाएंगे।

कल engagement rate आ जाएगा।

फिर social media trends संपादकीय निर्णय लेने लगेंगे।

अर्थात समस्या केवल metric की नहीं है।

समस्या यह है कि पत्रकारिता का उद्देश्य क्या है।

भारत को किस तरह की नई मीडिया व्यवस्था चाहिए?

भारत को न तो पुरानी TRP व्यवस्था की आंख बंद करके रक्षा करनी चाहिए और न ही बिना विकल्प के उसे खत्म करना चाहिए।

जरूरत है एक स्वतंत्र, पारदर्शी और बहु-प्लेटफॉर्म audience measurement system की।

जिसमें—

TRP हो,

digital reach हो,

watch time हो,

regional reach हो,

audience demographics हों,

और सबसे महत्वपूर्ण—

विश्वसनीयता और सार्वजनिक हित का स्वतंत्र मूल्यांकन भी हो।

विज्ञापनदाता को दर्शक का आंकड़ा मिले।

चैनल को अपनी स्थिति समझने का अवसर मिले।

लेकिन पत्रकार को हर सप्ताह यह डर न रहे कि कम TRP का अर्थ उसकी नौकरी खत्म होना है।

और यहीं से पत्रकारिता की नई दिशा शुरू हो सकती है

यदि TRP का दबाव कम होता है और उसके स्थान पर पत्रकारिता की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और सार्वजनिक उपयोगिता को महत्व दिया जाता है, तो यह भारतीय पत्रकारिता के लिए ऐतिहासिक अवसर हो सकता है।

लेकिन अगर TRP खत्म हुई और उसके स्थान पर केवल डिजिटल क्लिक, views और engagement की नई दौड़ शुरू हो गई, तो समस्या खत्म नहीं होगी।

सिर्फ उसका नाम बदल जाएगा।

आज सवाल है—

“कितनी TRP आई?”

कल सवाल हो सकता है—

“कितने million views आए?”

अगर पत्रकारिता इसी गणित में फंसी रही तो माध्यम बदल जाएगा, बीमारी नहीं।

इसलिए भारत को केवल TRP-free journalism नहीं चाहिए।

भारत को चाहिए—

Public Interest Journalism.

ऐसी पत्रकारिता जिसमें खबर की कीमत उसके शोर से नहीं, उसके सामाजिक प्रभाव से तय हो।

जिसमें किसी गरीब की समस्या prime-time debate से छोटी न हो।

जिसमें किसी पहाड़ी गांव की खबर इसलिए महत्वपूर्ण हो क्योंकि वहां के लोगों का जीवन उससे जुड़ा है—न कि इसलिए कि वह viral हो सकती है।

और जिसमें पत्रकार की नौकरी किसी एक सप्ताह की rating पर निर्भर न हो।

निष्कर्ष

TRP का बंद होना भारतीय पत्रकारिता के लिए अंत नहीं, एक संक्रमण बिंदु हो सकता है।

यह पत्रकारिता को एक नई दिशा दे सकता है।

लेकिन तभी जब सरकार, मीडिया उद्योग, विज्ञापनदाता और पत्रकार संगठन मिलकर एक नई audience measurement तथा journalist welfare व्यवस्था तैयार करें।

सैटेलाइट चैनलों के भविष्य को बचाने का रास्ता TRP को हमेशा के लिए बनाए रखना नहीं है।

और TRP को अचानक खत्म कर देना भी समाधान नहीं है।

समाधान है—

विश्वसनीय measurement + विविध revenue model + मजबूत regional journalism + पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा + multi-platform newsroom + editorial independence.

अगर यह परिवर्तन सही तरीके से हुआ तो आने वाले वर्षों में भारतीय पत्रकारिता का केंद्र केवल सैटेलाइट स्क्रीन नहीं रहेगा।

वह टीवी, मोबाइल, OTT, YouTube, podcast और स्थानीय डिजिटल नेटवर्क—सभी को जोड़कर एक नए मीडिया ecosystem में बदल जाएगी।

और शायद तब पत्रकारिता की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि—

“कितने लोगों ने देखा?”

बल्कि यह होगा—

“कितने लोगों के जीवन में इस पत्रकारिता ने कोई फर्क पैदा किया?”

यही TRP के बाद भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।


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By udaen

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