सिर्फ़ दवा नहीं, ज़िम्मेदारी भी: अल्कोहल युक्त दवाओं पर नियंत्रण का सही समय
भारत में दवाओं का दुरुपयोग लंबे समय से एक गंभीर लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित समस्या रहा है। विशेष रूप से कुछ कफ सिरप और अन्य अल्कोहल युक्त मौखिक दवाओं का नशे के उद्देश्य से इस्तेमाल कई राज्यों में चिंता का विषय बन चुका है। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा 12 प्रतिशत से अधिक एथाइल अल्कोहल वाली कुछ दवाओं को बिना डॉक्टर की पर्ची के बेचने पर रोक लगाने का निर्णय स्वागत योग्य है।
यह निर्णय किसी दवा पर प्रतिबंध नहीं है, बल्कि उसके उपयोग को जिम्मेदार और नियंत्रित बनाने का प्रयास है। जब कोई औषधि चिकित्सकीय उपचार के बजाय नशे का माध्यम बनने लगे, तब सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन की अनिवार्यता और बिक्री का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था ऐसे दुरुपयोग पर प्रभावी अंकुश लगा सकती है।
हालांकि, केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि मेडिकल स्टोरों पर निगरानी कमजोर रही, नकली प्रिस्क्रिप्शन चलते रहे या ऑनलाइन माध्यमों से नियमों की अनदेखी हुई, तो इस निर्णय का प्रभाव सीमित रह जाएगा। राज्यों के औषधि नियंत्रण विभागों, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा समुदाय के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक मरीजों को आवश्यक दवाएं समय पर मिलती रहें। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में, जहां डॉक्टरों की उपलब्धता पहले से सीमित है, प्रिस्क्रिप्शन आधारित व्यवस्था मरीजों के लिए अतिरिक्त कठिनाई न बन जाए। इसलिए सरकार को टेलीमेडिसिन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता और चिकित्सकीय पहुंच को भी मजबूत करना होगा।
यह निर्णय एक बड़े प्रश्न की ओर भी संकेत करता है—क्या भारत में दवाओं की ओवर-द-काउंटर बिक्री के लिए व्यापक और आधुनिक नीति की आवश्यकता नहीं है? अनेक ऐसी दवाएं आज भी बिना चिकित्सकीय सलाह के आसानी से उपलब्ध हैं, जिनका गलत उपयोग गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। दवाओं की उपलब्धता और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना समय की मांग है।
अंततः, किसी भी कानून की सफलता उसके क्रियान्वयन और जन-जागरूकता पर निर्भर करती है। यदि इस निर्णय के साथ लोगों को दवाओं के सुरक्षित उपयोग, नशे के दुष्प्रभाव और चिकित्सकीय सलाह के महत्व के बारे में भी जागरूक किया जाए, तो यह कदम केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार सिद्ध हो सकता है।
दवा का उद्देश्य जीवन बचाना है, न कि नशे की लत को बढ़ावा देना। इसलिए ऐसी दवाओं पर विवेकपूर्ण नियंत्रण समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था—दोनों के हित में है।
