देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तीकरण संस्थान (NIEPVD) में दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं का करीब एक सप्ताह से जारी विरोध-प्रदर्शन केवल कुछ सुविधाओं की मांग का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है, जिसका मूल उद्देश्य ही दृष्टिबाधित और दृष्टि दिव्यांगजनों को शिक्षा, कौशल, आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराना है।
इन विद्यार्थियों की मांगें सुनने में बहुत सामान्य लग सकती हैं—अच्छा भोजन, समय पर ब्रेल और अंग्रेजी की किताबें, छात्रवृत्ति, लैपटॉप, पर्याप्त शिक्षक, बेहतर हॉस्टल, चिकित्सा सहायता और मोबिलिटी प्रशिक्षण। लेकिन जिस विद्यार्थी को सामान्य विद्यालय की तुलना में पहले ही अनेक अतिरिक्त संस्थागत बाधाओं से गुजरना पड़ता है, उसके लिए यही सुविधाएं शिक्षा की बुनियादी शर्त बन जाती हैं।
इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘छात्रों का प्रदर्शन’ कहकर समाप्त कर देना समस्या को छोटा कर देना होगा।
सवाल सुविधाओं का नहीं, समान अवसर का है
दृष्टिबाधित विद्यार्थी के लिए किताब केवल किताब नहीं है। वह उसके लिए ज्ञान तक पहुंचने का माध्यम है। सामान्य विद्यार्थी पुस्तक खरीदकर पढ़ सकता है, लेकिन दृष्टिबाधित विद्यार्थी को ब्रेल, डिजिटल टेक्स्ट, ऑडियो या किसी अन्य सुलभ प्रारूप की आवश्यकता होती है।
यदि ब्रेल पुस्तक समय पर उपलब्ध नहीं है, तो इसका अर्थ केवल पुस्तक में देरी नहीं है। इसका अर्थ है कि विद्यार्थी की पढ़ाई में देरी।
यदि छात्रवृत्ति समय पर नहीं मिलती, तो इसका अर्थ केवल भुगतान में देरी नहीं है। इसका अर्थ है कि आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी के सामने शिक्षा जारी रखने का संकट पैदा हो सकता है।
यदि लैपटॉप उपलब्ध नहीं है, तो यह केवल एक उपकरण का न मिलना नहीं है। आज के डिजिटल शिक्षा के दौर में इसका अर्थ है—ज्ञान, ऑनलाइन पाठ्य सामग्री, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और डिजिटल दुनिया तक सीमित पहुंच।
और यदि मोबिलिटी प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है, तो इसका सीधा संबंध विद्यार्थी की स्वतंत्रता और आत्मविश्वास से है।
इसलिए इन मांगों को ‘अतिरिक्त सुविधाओं’ की श्रेणी में रखना ही गलत दृष्टिकोण है।
कानून ने अधिकार दिया, व्यवस्था कब देगी?
भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्राप्त है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 समानता, गैर-भेदभाव, शिक्षा और सुलभता जैसे अधिकारों को मान्यता देता है।
लेकिन कानून और जमीन के बीच की दूरी तब दिखाई देती है, जब किसी विद्यार्थी को अपने अधिकार के लिए प्रदर्शन करना पड़ता है।
किसी भी कल्याणकारी संस्था की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसके पास कितने नियम हैं। सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि उन नियमों का लाभ सबसे कमजोर व्यक्ति तक कितनी सहजता से पहुंच रहा है।
NIEPVD जैसी राष्ट्रीय संस्था से अपेक्षा और भी अधिक है। यह केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं है। यह देश में दृष्टि दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत केंद्र है।
इसलिए यहां उठने वाली हर शिकायत को सामान्य प्रशासनिक शिकायत की तरह नहीं देखा जा सकता।
₹48 लाख की स्वीकृति अच्छी खबर है, लेकिन सवाल वहीं खत्म नहीं होता
लैपटॉप के लिए ₹48 लाख की स्वीकृति और छात्रवृत्ति की बहाली जैसे कदम निश्चित रूप से सकारात्मक हैं। हॉस्टल और खेल सुविधाओं में सुधार की बात भी स्वागत योग्य है।
लेकिन किसी मांग के लिए राशि स्वीकृत होना और उसका वास्तविक लाभ विद्यार्थियों तक पहुंचना दो अलग-अलग बातें हैं।
जरूरत इस बात की है कि संस्थान प्रत्येक मांग के संबंध में समयबद्ध और सार्वजनिक रूप से स्पष्ट स्थिति बताए—
किस मांग पर क्या निर्णय हुआ?
कितनी राशि स्वीकृत हुई?
लाभार्थी कौन हैं?
लैपटॉप कब वितरित होंगे?
छात्रवृत्ति कब से प्रभावी होगी?
ब्रेल और अंग्रेजी की पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यवस्था क्या होगी?
शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
चिकित्सा और मोबिलिटी प्रशिक्षण की स्थायी व्यवस्था क्या होगी?
जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं आते, तब तक ‘मांगों पर विचार किया जा रहा है’ जैसे वाक्य विद्यार्थियों के भरोसे को पूरी तरह बहाल नहीं कर सकते।
सबसे महत्वपूर्ण है संवाद
किसी भी संस्थान में विरोध प्रदर्शन को केवल अनुशासन की समस्या के रूप में देखना आसान है। लेकिन लोकतांत्रिक संस्थानों में विरोध को एक संकेत की तरह पढ़ना चाहिए।
जब विद्यार्थी बार-बार अपनी समस्याएं बताते हैं और समाधान न मिलने पर सामूहिक रूप से आवाज उठाते हैं, तो प्रशासन को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि शिकायत निवारण की व्यवस्था में कहां कमी रह गई।
क्या छात्रों की शिकायतों के लिए नियमित संवाद तंत्र है?
क्या उनके प्रतिनिधियों के साथ हर महीने बैठक होती है?
क्या शिकायतों का लिखित रिकॉर्ड रखा जाता है?
क्या शिकायत के समाधान की समयसीमा निर्धारित है?
क्या विद्यार्थी यह देख सकते हैं कि उनकी शिकायत किस स्तर पर लंबित है?
यदि इन सवालों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो समस्या केवल किसी एक सुविधा की नहीं बल्कि संस्थागत जवाबदेही की है।
दिव्यांगता की सबसे बड़ी बाधा कई बार समाज बन जाता है
दृष्टिबाधित व्यक्ति को अक्सर उसकी अक्षमता के आधार पर देखा जाता है, उसकी क्षमता के आधार पर नहीं।
यह सोच बदलनी होगी।
दृष्टिबाधित विद्यार्थी शिक्षक बन सकते हैं, प्रशासनिक अधिकारी बन सकते हैं, वकील बन सकते हैं, पत्रकार बन सकते हैं, शोधकर्ता बन सकते हैं, उद्यमी बन सकते हैं और समाज के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन प्रतिभा को अवसर चाहिए।
और अवसर केवल प्रवेश देने से नहीं मिलता।
अवसर तब मिलता है जब शिक्षा सामग्री सुलभ हो, तकनीक उपलब्ध हो, शिक्षक पर्याप्त हों, छात्रवृत्ति समय पर मिले, हॉस्टल सुरक्षित हो, स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो और विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से चल-फिर सके।
यही वास्तविक inclusive education है।
सवाल सिर्फ NIEPVD का नहीं है
इस पूरे प्रकरण को केवल देहरादून या एक संस्थान की समस्या मानना भी उचित नहीं होगा।
देश में हजारों दिव्यांग विद्यार्थी ऐसे हैं जिनके सामने शिक्षा तक पहुंच की अलग-अलग बाधाएं हैं। डिजिटल सामग्री कितनी सुलभ है? प्रतियोगी परीक्षाओं में स्क्रीन रीडर और सहायक तकनीक की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? उच्च शिक्षा में ब्रेल सामग्री कितनी उपलब्ध है? रोजगार बाजार में दिव्यांग युवाओं के लिए वास्तविक अवसर कितने हैं?
इन सवालों पर भी गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
दिव्यांगता समावेशन को केवल सरकारी योजनाओं और प्रमाणपत्रों तक सीमित रखने से समस्या हल नहीं होगी। हमें accessibility को हर संस्थान की कार्यप्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
सरकार और संस्थान को क्या करना चाहिए?
NIEPVD के वर्तमान विवाद से एक स्थायी मॉडल विकसित किया जा सकता है।
सबसे पहले, छात्रों की सभी मांगों की बिंदुवार समीक्षा और समयसीमा तय हो।
दूसरा, छात्र प्रतिनिधियों, संस्थान प्रशासन और संबंधित मंत्रालय के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था हो।
तीसरा, छात्रवृत्ति, पुस्तकों, लैपटॉप और अन्य सहायता के वितरण की प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए।
चौथा, ब्रेल और डिजिटल अध्ययन सामग्री के लिए एक स्थायी resource centre विकसित किया जाए।
पांचवां, पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षकों और support staff की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
छठा, हॉस्टल, भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं का स्वतंत्र और नियमित मूल्यांकन हो।
सातवां, मोबिलिटी और assistive technology को पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—विद्यार्थियों को लाभार्थी नहीं, अधिकारधारी माना जाए।
आखिर में
इन विद्यार्थियों की आंखें उन्हें दिखाई देने वाली दुनिया से वंचित कर सकती हैं, लेकिन उनकी चेतना उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है।
उन्होंने हमें एक बहुत महत्वपूर्ण बात याद दिलाई है—
Accessibility कोई दया नहीं है।
Inclusive education कोई कृपा नहीं है।
सम्मान कोई सुविधा नहीं है।
ये अधिकार हैं।
किसी लोकतांत्रिक समाज की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह अपने सबसे सक्षम नागरिकों के लिए कितने अवसर पैदा करता है। असली परीक्षा यह है कि वह उन लोगों के लिए कितनी बाधाएं हटाता है, जिन्हें व्यवस्था ने लंबे समय तक हाशिये पर रखा है।
NIEPVD के छात्र आज अपनी आवाज उठा रहे हैं। उनकी आवाज को केवल संस्थान की चारदीवारी के भीतर सुनना पर्याप्त नहीं है।
उसे नीति-निर्माताओं, प्रशासन, समाज और शिक्षा व्यवस्था—सभी को सुनना होगा।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि दृष्टिबाधित विद्यार्थी क्या देख सकते हैं।
सवाल यह है कि हमारी व्यवस्था उन्हें कितनी दूर तक देखने—और अपने सपनों को साकार करने—का अवसर देती है।
