भारत और उत्तराखंड में दिव्यांगजन: आँकड़ों से वास्तविकता तक
नई दिल्ली / देहरादून: भारत में दिव्यांग (Persons with Disabilities) नागरिकों की संख्या लाखों में है, लेकिन सरकारी आँकड़े और वास्तविक जीवन के अनुभव अभी भी बड़ी खाई दिखाते हैं। Census 2011 के अनुसार भारत में लगभग 2.68 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में दिव्यांग हैं, जो कुल आबादी का 2.21 प्रतिशत बनता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई लोग पंजीकरण से बाहर हैं।
देश के दिव्यांगजन 69 प्रतिशत ग्रामीण और 31 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। लिंग के आधार पर देखें तो 56 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिलाएँ हैं। प्रमुख प्रकार की दिव्यांगता में चलने-फिरने में कठिनाई, दृष्टिबाधा, श्रवण बाधा, मानसिक और बौद्धिक दिव्यांगता शामिल हैं।
उत्तराखंड में स्थिति
देवभूमि उत्तराखंड में सरकारी आँकड़ों के अनुसार लगभग 1,85,272 लोग दिव्यांग हैं। इनमें श्रवण बाधित 37,681, दृष्टिबाधित 29,107, और गतिशीलता में कठिनाई 36,996 लोग हैं। राज्य में ग्रामीण आबादी अधिक होने के कारण स्वास्थ्य और रोजगार सुविधाओं तक पहुँच अभी भी चुनौतीपूर्ण है।
राज्य सरकार ने दिव्यांग कोटे से 565 शिक्षकों की नियुक्ति की है और मनरेगा के तहत 3434 पंजीकृत दिव्यांग श्रमिकों में 1057 को रोजगार उपलब्ध कराया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिव्यांग से विवाह करने पर प्रोत्साहन राशि ₹50,000 करने की घोषणा की है, जबकि दिव्यांग पेंशन योजना में भी सुधार कर 85,403 दिव्यांगजन को प्रतिमाह ₹1,500 की पेंशन जारी की जा रही है।
देहरादून में राज्य का पहला District Disability Rehabilitation Centre (DDRC) स्थापित किया गया है, जहाँ डायग्नोसिस, पुनर्वास, सहायता उपकरण और सरकारी योजनाओं तक एक ही स्थान पर पहुँच सुनिश्चित की जा रही है।
सामाजिक और नीतिगत चुनौतियाँ
भारत और उत्तराखंड दोनों में दिव्यांगजन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में पिछड़े हैं। सरकारी योजनाओं के बावजूद कई लोग जागरूक नहीं हैं और लाभ तक पहुँच नहीं पा रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि समावेशी शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार अवसर बढ़ाना अब प्राथमिकता होनी चाहिए।
देश और राज्य सरकार दोनों का लक्ष्य है कि दिव्यांगजन समान अवसर प्राप्त करें और आत्मनिर्भर बनें। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी जनगणना में बेहतर आँकड़ों और डिजिटल पंजीकरण के माध्यम से नीतियाँ और योजनाएँ अधिक प्रभावशाली बनाई जा सकती हैं।
दिव्यांगजन देश और राज्य की शक्ति हैं — ज़रूरत है उन्हें बराबरी का अवसर देने की।
