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प्रेस से संवाद: लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी
लोकतंत्र केवल मतदान की व्यवस्था नहीं है; यह निरंतर संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था भी है। चुनाव जनता को सरकार चुनने का अधिकार देते हैं, लेकिन शासन के दौरान जनता की ओर से सवाल पूछने का अधिकार स्वतंत्र मीडिया निभाता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस और सरकार के बीच नियमित संवाद लोकतंत्र की सेहत का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
हाल ही में एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने विदेश मंत्रालय की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई, जिसमें प्रधानमंत्री द्वारा मीडिया के खुले प्रश्नों का सामना न करने को उचित ठहराने का प्रयास किया गया था। गिल्ड का कहना है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च निर्वाचित पद पर बैठे व्यक्ति का दायित्व है कि वे समय-समय पर स्वतंत्र पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर दें। यह केवल मीडिया की अपेक्षा नहीं, बल्कि जनता के जानने के अधिकार का हिस्सा है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। यद्यपि “प्रेस की स्वतंत्रता” का अलग से उल्लेख नहीं है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र प्रेस इसी मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है। प्रेस की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं, बल्कि सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता भी है।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नियमित प्रेस वार्ताएँ करते थे। बाद के वर्षों में विभिन्न प्रधानमंत्रियों ने भी अलग-अलग स्तर पर मीडिया से संवाद किया। समय के साथ संचार के साधन बदले हैं। आज सरकारें सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, रेडियो कार्यक्रमों और वीडियो संदेशों के माध्यम से सीधे जनता तक पहुँचती हैं। यह सकारात्मक परिवर्तन है, लेकिन यह संवाद अधिकांशतः एकतरफा होता है। लोकतंत्र की कसौटी तब पूरी होती है जब पत्रकार बिना पूर्व निर्धारित प्रश्नों के सरकार से सवाल पूछ सकें।
वर्तमान समय में भारत अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आर्थिक असमानता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय सीधे भारत को प्रभावित करते हैं। घरेलू स्तर पर रोजगार, कृषि, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर जनता के मन में अनेक प्रश्न होते हैं। इन परिस्थितियों में नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस सरकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने और अफवाहों को रोकने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।
सरकार का पक्ष भी समझना आवश्यक है। सरकार संसद में जवाब देती है, मंत्रालय नियमित प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी करते हैं, मंत्री मीडिया से बातचीत करते हैं और प्रधानमंत्री विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखते हैं। सरकार यह तर्क दे सकती है कि जनता तक सूचना पहुँचाने के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं। फिर भी लोकतांत्रिक विमर्श में यह प्रश्न बना रहता है कि क्या इन माध्यमों से स्वतंत्र और प्रत्यक्ष प्रश्नोत्तर का स्थान लिया जा सकता है? अनेक संवैधानिक विशेषज्ञों का उत्तर ‘नहीं’ है।
विश्व के प्रमुख लोकतंत्रों—जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया—में शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व समय-समय पर प्रेस के प्रश्नों का सामना करता है। इन देशों में भी राजनीतिक विवाद होते हैं, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की एक स्थापित परंपरा मानी जाती है। भारत जैसा परिपक्व लोकतंत्र भी ऐसी परंपराओं को और मजबूत कर सकता है।
यह विषय किसी एक नेता, दल या सरकार तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज जो सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है। इसलिए ऐसी संस्थागत परंपराएँ विकसित होनी चाहिएँ जो हर सरकार पर समान रूप से लागू हों। नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस, सूचना तक आसान पहुँच, स्वतंत्र पत्रकारिता और कठिन प्रश्नों का सम्मान—ये सभी लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
मीडिया की भी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं। तथ्यपरक रिपोर्टिंग, निष्पक्षता, जिम्मेदार भाषा और जनहित सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि मीडिया अपनी विश्वसनीयता बनाए रखे और सरकार अपनी जवाबदेही निभाए, तभी लोकतंत्र का संतुलन मजबूत रहेगा।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति केवल इसकी जनसंख्या या चुनावी व्यवस्था नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता है। सरकार और मीडिया के बीच स्वस्थ, सम्मानजनक और नियमित संवाद इस विश्वसनीयता को और मजबूत करेगा। लोकतंत्र में सवाल विरोध नहीं होते; वे उत्तरदायित्व का आधार होते हैं। जितना खुला संवाद होगा, उतना ही मजबूत लोकतंत्र होगा।
