उत्तराखंड का Gen Z वोटर: क्या बदल रही है चुनावी राजनीति की दिशा?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता होती है, लेकिन हर दौर में एक ऐसा मतदाता वर्ग उभरता है जो चुनावी राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। आज भारत में यह भूमिका Gen Z यानी लगभग 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की है। उत्तराखंड भी इससे अलग नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव में यह युवा वर्ग बड़ी संख्या में मतदान करेगा और संभव है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर भी यही तय करे।
पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा मजबूत हुई है कि युवा मतदाता पहले की पीढ़ियों की तुलना में अलग सोच रखता है। यह इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल सूचना के युग में बड़ा हुआ है। इसलिए इसके सामने सूचना के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं। यह केवल राजनीतिक नारों या भावनात्मक अपील के आधार पर निर्णय लेने के बजाय अपने जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी तलाशता है।
उत्तराखंड के युवाओं की चुनौतियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। पलायन, सीमित रोजगार के अवसर, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर उठते सवाल, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता, स्वरोजगार के लिए संसाधनों की कमी तथा पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव—ये ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे युवा पीढ़ी के भविष्य से जुड़े हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि उनकी प्राथमिकताएँ रोजगार, उद्यमिता, पारदर्शी शासन, डिजिटल सेवाएँ, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे विषय हों।
हालाँकि यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी मतदाता वर्ग के बारे में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि वह किन मुद्दों पर मतदान करेगा। Gen Z भी एक समान समूह नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों, सामाजिक पृष्ठभूमियों और व्यक्तिगत अनुभवों के कारण उनके मतदान के कारण अलग हो सकते हैं। कुछ मतदाता विकास को प्राथमिकता देंगे, कुछ स्थानीय नेतृत्व को, कुछ राष्ट्रीय मुद्दों को और कुछ सामाजिक या सांस्कृतिक प्रश्नों को भी महत्वपूर्ण मान सकते हैं।
राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं होंगी। युवा मतदाता रोजगार के आँकड़े, शिक्षा की गुणवत्ता, निवेश के वास्तविक परिणाम, स्टार्टअप और स्वरोजगार की नीतियाँ तथा सरकारी सेवाओं की पारदर्शिता जैसे विषयों पर भी जवाब चाहता है। वह यह देखना चाहता है कि सरकार और विपक्ष दोनों उसके भविष्य के लिए क्या ठोस योजना रखते हैं।
उत्तराखंड का भविष्य उसके युवाओं से जुड़ा है। यदि राजनीति युवाओं की आकांक्षाओं को समझेगी, उनकी समस्याओं का समाधान करेगी और उन्हें राज्य निर्माण का भागीदार बनाएगी, तो लोकतंत्र और मजबूत होगा। लेकिन यदि युवा केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रह गए और उनके मूल प्रश्न अनुत्तरित रहे, तो राजनीतिक असंतोष भी बढ़ सकता है।
आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की भी परीक्षा होगी कि उत्तराखंड की राजनीति नई पीढ़ी की अपेक्षाओं को कितना समझ पाई है। अब चुनावी विमर्श को अतीत की बहसों से आगे बढ़ाकर भविष्य की संभावनाओं पर केंद्रित करने का समय है। क्योंकि अंततः वही राजनीति टिकाऊ होती है जो आने वाली पीढ़ियों के सपनों को अपना एजेंडा बनाती है।
