संपादकीय: चीन से सबक ले उत्तराखंड—आपदा के बाद नहीं, पहले हो तैयारी
प्राकृतिक आपदाएं किसी देश, राज्य या सीमा की मोहताज नहीं होतीं। वे केवल यह देखती हैं कि समाज और शासन उनकी चुनौती के लिए कितना तैयार है। चीन में टाइफून ‘बावी’ के खतरे को देखते हुए 28 लाख से अधिक लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया। यह घटना केवल चीन की प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है कि आपदा प्रबंधन का सबसे सफल मॉडल वही है, जिसमें राहत से अधिक महत्व पूर्व तैयारी को दिया जाए।
उत्तराखंड भी एक ऐसा राज्य है, जहां प्रकृति जितनी सुंदर है, उतनी ही संवेदनशील भी। यहां हर वर्ष मानसून के दौरान बादल फटना, भूस्खलन, अचानक बाढ़, सड़कें बह जाना, पुल टूटना और पर्वतीय क्षेत्रों का संपर्क कट जाना सामान्य घटनाएं बनती जा रही हैं। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया। इसके बाद चमोली की ऋषिगंगा त्रासदी, जोशीमठ का भू-धंसाव और हर मानसून में होने वाली दुर्घटनाएं यह संकेत देती हैं कि हिमालय अब पहले से अधिक नाजुक हो चुका है।
विडंबना यह है कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की चर्चा अक्सर तब तेज होती है, जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है। राहत सामग्री पहुंचती है, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, जांच समितियां बनती हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। जबकि वास्तविक आवश्यकता ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें खतरे वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान हो, समय पर लोगों को हटाया जाए और जोखिम वाले इलाकों में अनावश्यक आवाजाही रोकी जाए।
चारधाम यात्रा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु सीमित भौगोलिक क्षमता वाले मार्गों से गुजरते हैं। यदि मौसम विभाग की चेतावनियों को पूरी गंभीरता से लागू किया जाए, यात्रा प्रबंधन को मौसम आधारित बनाया जाए और संवेदनशील स्थानों पर तत्काल निकासी की व्यवस्था हो, तो अनेक दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। पर्यटन और तीर्थाटन राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक हैं, लेकिन सुरक्षा से बड़ा कोई आर्थिक हित नहीं हो सकता।
उत्तराखंड में आज भी अनेक गांव ऐसे हैं, जहां आपदा आने पर राहत दल को पहुंचने में कई घंटे, कभी-कभी कई दिन लग जाते हैं। इसका समाधान केवल हेलीकॉप्टर नहीं हैं। प्रत्येक ग्राम पंचायत में प्रशिक्षित आपदा स्वयंसेवक, प्राथमिक राहत उपकरण, सामुदायिक आश्रय स्थल, सैटेलाइट संचार, ड्रोन आधारित निगरानी और नियमित मॉक ड्रिल जैसी व्यवस्थाएं विकसित करनी होंगी। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायतों को भी आपदा प्रबंधन का सक्रिय केंद्र बनाया जाना चाहिए।
एक और गंभीर प्रश्न विकास मॉडल का है। अंधाधुंध सड़क चौड़ीकरण, पर्वतीय ढलानों की असंतुलित कटाई, नदी तटों पर अवैज्ञानिक निर्माण और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी प्राकृतिक जोखिमों को कई गुना बढ़ा देती है। विकास आवश्यक है, लेकिन हिमालय की भौगोलिक सीमाओं को नज़रअंदाज़ करके किया गया विकास भविष्य की आपदाओं को आमंत्रित कर सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। पहले जहां अत्यधिक वर्षा की घटनाएं विरल थीं, अब कुछ घंटों की बारिश पूरे क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति बदल देती है। ऐसे में उत्तराखंड को केवल आपदा प्रतिक्रिया (Disaster Response) से आगे बढ़कर आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) और जलवायु अनुकूल विकास (Climate Resilient Development) की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
चीन का उदाहरण बताता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक पूर्वानुमान, आधुनिक तकनीक और प्रशासनिक समन्वय साथ हों तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है। उत्तराखंड के लिए भी यही सबसे बड़ा संदेश है कि आपदा आने के बाद राहत देना अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमाण नहीं, बल्कि आपदा आने से पहले लोगों को सुरक्षित कर देना ही वास्तविक सुशासन की पहचान है।
हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की आवश्यकता है। यदि उत्तराखंड ने समय रहते आपदा प्रबंधन को विकास नीति का अभिन्न हिस्सा नहीं बनाया, तो भविष्य की चुनौतियां और गंभीर होंगी। लेकिन यदि आज से तैयारी शुरू की जाए, तो प्राकृतिक आपदाओं को त्रासदी बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। यही समय की मांग है और यही उत्तराखंड के सुरक्षित भविष्य का मार्ग भी।
