भटके हुए नागरिक और भटकता नागरिक मंच
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि जागरूक नागरिकों और सशक्त नागरिक समाज से संचालित होता है। सरकारें नीतियाँ बनाती हैं, प्रशासन उन्हें लागू करता है, लेकिन समाज की नब्ज़ पर हाथ रखने का काम नागरिक संगठनों और नागरिक मंचों का होता है। यही मंच जनता और शासन के बीच संवाद का सेतु बनते हैं। किंतु जब नागरिक स्वयं अपने मूल सरोकारों से भटकने लगें, तब उनके मंच भी दिशा खो बैठते हैं। यही आज भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रही है।
पिछले कुछ वर्षों में देशभर में नागरिक मंचों, सामाजिक संगठनों और जन आंदोलनों की संख्या बढ़ी है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना जा सकता था, यदि उनका केंद्र जनहित होता। लेकिन दुर्भाग्य से अनेक मंच आज वास्तविक जनसमस्याओं की अपेक्षा राजनीतिक ध्रुवीकरण, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और प्रचार की राजनीति के शिकार होते दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप वे जनता का विश्वास खोने लगे हैं।
एक समय था जब नागरिक मंच किसी शहर की आत्मा माने जाते थे। वे पेयजल संकट, विद्यालयों की स्थिति, अस्पतालों की बदहाली, पर्यावरण संरक्षण, भ्रष्टाचार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर निरंतर जनमत तैयार करते थे। वे सत्ता से प्रश्न पूछते थे, लेकिन तथ्यों के आधार पर। वे विरोध भी करते थे तो समाधान का रास्ता भी सुझाते थे। आज अनेक स्थानों पर यह परंपरा कमजोर पड़ती दिखाई देती है।
इस बदलाव का कारण केवल मंच नहीं हैं। समाज भी बदल रहा है। नागरिकों की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं। सार्वजनिक हित की जगह निजी हित ने ले ली है। जाति, धर्म, राजनीतिक निष्ठा और सोशल मीडिया की तात्कालिक लोकप्रियता ने विवेकपूर्ण नागरिक संवाद को प्रभावित किया है। अब किसी मुद्दे की गंभीरता का निर्धारण उसके सामाजिक महत्व से अधिक उसकी वायरल होने की क्षमता से होने लगा है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन मुद्दों का सीधा संबंध आम आदमी के जीवन से है—स्वच्छ हवा, सुरक्षित पेयजल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, रोजगार, यातायात, नदियों और जंगलों का संरक्षण—वे अक्सर चर्चा के केंद्र में नहीं होते। इसके विपरीत भावनात्मक और विवादास्पद विषय सार्वजनिक विमर्श पर हावी रहते हैं। नागरिक मंच भी कभी-कभी इसी प्रवृत्ति के साथ बहते दिखाई देते हैं।
नागरिक मंचों की विश्वसनीयता उनकी निष्पक्षता से बनती है। यदि वे सत्ता के गलत निर्णयों पर मौन रहें या विपक्ष की गलतियों को भी अनदेखा करें, तो वे जनविश्वास खो देते हैं। लोकतंत्र में नागरिक मंच का दायित्व किसी दल का विस्तार बनना नहीं, बल्कि जनता का प्रहरी बने रहना है।
यह भी उतना ही सत्य है कि समाज को वही नेतृत्व मिलता है जिसकी वह अपेक्षा करता है। यदि नागरिक स्वयं तथ्य, संवैधानिक मूल्यों और सार्वजनिक हित की अपेक्षा भावनाओं और पूर्वाग्रहों के आधार पर निर्णय लेंगे, तो नागरिक मंच भी उसी दिशा में विकसित होंगे। इसलिए सुधार की शुरुआत मंचों से पहले नागरिकों से होनी चाहिए।
आज आवश्यकता ऐसे नागरिक समाज की है जो प्रश्न पूछने का साहस रखता हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर; जो विरोध करता हो, लेकिन समाधान भी प्रस्तुत करता हो; जो किसी व्यक्ति या दल के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और जनहित के प्रति प्रतिबद्ध हो।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक होता है। और सबसे प्रभावशाली नागरिक मंच वही है जो सत्ता के निकट होने से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से मजबूत बनता है।
यदि नागरिक अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सजग होंगे, तो नागरिक मंच स्वतः सशक्त और प्रभावी बनेंगे। लेकिन यदि नागरिक ही भटक जाएंगे, तो मंचों का भटकना भी तय है। इसलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता किसी नए संगठन की नहीं, बल्कि नई नागरिक चेतना की है। यही चेतना लोकतंत्र को जीवंत रखेगी और समाज को सही दिशा देगी।
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यदि यह संपादकीय कोटद्वार के किसी विशिष्ट “नागरिक मंच” के हालिया आचरण या गतिविधियों की पृष्ठभूमि में प्रकाशित किया जाना है, तो उसमें केवल सत्यापित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विश्लेषण जोड़ा जाना चाहिए, ताकि लेख निष्पक्ष और तथ्याधारित रहे।
