Spread the love

उत्तराखंड में कृषि को लेकर सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां खेती की संभावनाएं बहुत हैं, लेकिन किसान की आय और बाजार के बीच दूरी भी उतनी ही बड़ी है। पहाड़ों में खेत हैं, मेहनत है, विविध फसलें हैं, स्थानीय उत्पादों की विशिष्ट पहचान है, लेकिन इन उत्पादों को उचित बाजार, भंडारण, प्रसंस्करण और बेहतर मूल्य दिलाने की व्यवस्था अब भी कमजोर है। ऐसे समय में राज्य की सभी 23 कृषि उत्पादन मंडी समितियों द्वारा एक-एक गांव को गोद लेकर उसे मॉडल कृषि विपणन ग्राम के रूप में विकसित करने की पहल महत्वपूर्ण है।

“एक मंडी–एक गांव” योजना का मूल विचार यही है कि किसान को अपनी उपज बेचने के लिए केवल मंडी तक न जाना पड़े, बल्कि मंडी व्यवस्था स्वयं गांव के करीब पहुंचे। चयनित गांवों में विपणन, भंडारण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्द्धन की सुविधाएं विकसित करने का लक्ष्य है। यदि यह योजना अपने वास्तविक उद्देश्य के अनुरूप लागू होती है तो यह उत्तराखंड के कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत हो सकती है।

लेकिन किसी भी सरकारी योजना की सफलता उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से तय होती है। इसलिए इस पहल के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या यह वास्तव में किसान को बेहतर बाजार और बेहतर कीमत दिलाएगी या फिर यह भी “गोद लिए गए गांव” तक सीमित एक प्रशासनिक कार्यक्रम बनकर रह जाएगी?

उत्तराखंड की कृषि समस्या उत्पादन से ज्यादा बाजार की है

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि की समस्या को अक्सर कम उत्पादकता, छोटे जोत आकार और खेती से पलायन के संदर्भ में देखा जाता है। ये समस्याएं वास्तविक हैं, लेकिन इनके साथ एक और महत्वपूर्ण समस्या जुड़ी है—बाजार तक पहुंच।

एक छोटे किसान के पास यदि 50 या 100 किलो मंडुआ, राजमा, फल, सब्जी या अन्य उत्पाद है तो उसके सामने प्रश्न होता है कि वह इसे कहां और किस कीमत पर बेचे। दूर की मंडी तक माल ले जाने में परिवहन खर्च लगता है। सड़क और मौसम की परिस्थितियां अलग चुनौती पैदा करती हैं। उत्पाद जल्दी खराब होने वाला हो तो किसान के पास इंतजार करने की क्षमता नहीं होती। ऐसे में स्थानीय व्यापारी या बिचौलिया ही तत्काल खरीददार बन जाता है।

किसान को तत्काल नकद पैसा मिल जाता है, लेकिन अक्सर उसकी सौदेबाजी की क्षमता सीमित रहती है।

यही वह बिंदु है जहां “एक मंडी–एक गांव” योजना महत्वपूर्ण हो सकती है।

यदि मंडी समिति गांव में ही संग्रहण, ग्रेडिंग, तौल, पैकेजिंग और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था विकसित करती है तो किसान की बाजार पर निर्भरता बदल सकती है। उसे अपनी उपज मजबूरी में बेचने के बजाय बाजार की स्थिति देखकर बेचने का विकल्प मिल सकता है।

मंडी का अर्थ केवल खरीद-बिक्री नहीं होना चाहिए

योजना की सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि “मंडी” की परिभाषा कितनी व्यापक रखी जाती है।

यदि मंडी समिति का काम केवल गांव में खरीददार उपलब्ध कराने तक सीमित रहा तो इसका प्रभाव सीमित होगा। आधुनिक कृषि विपणन में मंडी केवल बिक्री की जगह नहीं है। यह पूरी वैल्यू चेन का हिस्सा हो सकती है।

एक आदर्श मॉडल गांव में कम से कम ये सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं—

  • स्थानीय संग्रहण केंद्र
  • वैज्ञानिक भंडारण
  • शीत भंडारण, जहां आवश्यक हो
  • ग्रेडिंग और छंटाई
  • पैकेजिंग
  • प्राथमिक प्रसंस्करण
  • ब्रांडिंग
  • डिजिटल बाजार से जुड़ाव
  • थोक खरीदारों से सीधा संपर्क
  • FPO और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से सामूहिक बिक्री

उत्तराखंड जैसे राज्य में यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां हर क्षेत्र की कृषि एक जैसी नहीं है। चमोली, रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था को देहरादून, हरिद्वार या ऊधमसिंह नगर के कृषि मॉडल से नहीं चलाया जा सकता।

“एक गांव” का चयन भी महत्वपूर्ण होगा

23 मंडी समितियों द्वारा 23 गांवों का चयन केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं होना चाहिए।

हर गांव की अपनी कृषि पहचान है। किसी गांव की ताकत मंडुआ हो सकती है, किसी की राजमा, किसी की सब्जियां, किसी की बागवानी, किसी की जड़ी-बूटियां तो किसी की पारंपरिक अनाज और स्थानीय खाद्य उत्पाद।

इसलिए प्रत्येक मॉडल गांव का “कृषि उत्पाद प्रोफाइल” तैयार किया जाना चाहिए।

सरकार को यह तय करना चाहिए कि चयनित गांव में प्रमुख उत्पाद कौन-से हैं, कितने किसान उससे जुड़े हैं, कुल उत्पादन कितना है, वर्तमान बाजार कहां है, किसान को वर्तमान में कितना मूल्य मिलता है और प्रसंस्करण के बाद उस उत्पाद का संभावित बाजार मूल्य कितना हो सकता है।

यहीं से योजना का वास्तविक आर्थिक मॉडल तैयार होगा।

उत्तराखंड में “वैल्यू एडिशन” सबसे बड़ा अवसर है

उत्तराखंड के किसान को केवल कच्चा माल बेचने वाला किसान बनाए रखना राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी होगी।

मसलन, मंडुआ केवल मंडुआ के रूप में बिके तो किसान को सीमित मूल्य मिलेगा। लेकिन उसी मंडुआ से आटा, बिस्कुट, स्नैक्स, रेडी-टू-कुक उत्पाद या अन्य पैकेज्ड खाद्य पदार्थ तैयार किए जाएं तो मूल्य कई स्तरों पर बढ़ सकता है।

इसी तरह फल केवल खेत से थोक बाजार तक जाने के बजाय जूस, जैम, पल्प, ड्राई फ्रूट या अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों में बदले जा सकते हैं।

बुरांश, माल्टा, शहद, जड़ी-बूटियां, राजमा, झंगोरा, मंडुआ और स्थानीय मसालों में भी यही संभावना है।

इसलिए “एक मंडी–एक गांव” को यदि “एक गांव–एक उत्पाद–एक ब्रांड–एक बाजार” की दिशा में विकसित किया जाए तो इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।

महिला किसानों और स्वयं सहायता समूहों को केंद्र में रखना होगा

उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। खेत, पशुपालन, वनोपज संग्रह और खाद्य प्रसंस्करण में महिलाओं का योगदान बड़ा है, लेकिन बाजार और मूल्य निर्धारण में उनकी भूमिका अक्सर सीमित रहती है।

मॉडल कृषि विपणन गांवों में महिला स्वयं सहायता समूहों, महिला किसान समूहों और स्थानीय उद्यमियों को प्रसंस्करण तथा पैकेजिंग की जिम्मेदारी देकर एक नया ग्रामीण उद्यम मॉडल बनाया जा सकता है।

इससे योजना का लाभ केवल किसान तक नहीं रहेगा, बल्कि गांव में रोजगार और स्थानीय उद्यमिता भी पैदा होगी।

यह उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहां कृषि संकट और ग्रामीण पलायन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

FPO को केवल कागज पर नहीं, बाजार में उतारना होगा

कृषि विपणन में छोटे किसानों की सबसे बड़ी कमजोरी उनका छोटा उत्पादन और कमजोर सौदेबाजी है। एक किसान के पास 100 किलो उत्पाद है तो वह बड़े खरीदार से कीमत तय नहीं कर सकता। लेकिन 100 किसानों का सामूहिक उत्पादन 10 टन हो जाए तो स्थिति बदल जाती है।

इसलिए मॉडल गांवों को Farmer Producer Organisations यानी FPOs से जोड़ना चाहिए।

FPO किसान की ओर से सामूहिक खरीद, संग्रहण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और बिक्री कर सकता है। इससे बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन किसान की सौदेबाजी की शक्ति जरूर बढ़ सकती है।

योजना में मंडी समिति, FPO, सहकारी संस्था और निजी खरीदार के बीच स्पष्ट भूमिका तय करना आवश्यक होगा।

असली कसौटी: किसान को मिला कितना अधिक मूल्य?

सरकारी योजनाओं में अक्सर सफलता का पैमाना खर्च की गई राशि, बनाए गए केंद्रों या आयोजित कार्यक्रमों की संख्या बन जाता है।

लेकिन कृषि विपणन योजना की सफलता का पैमाना इससे अलग होना चाहिए।

सरकार को हर मॉडल गांव में योजना लागू होने से पहले और बाद के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए—

किसान को पहले कितना मूल्य मिलता था?
अब कितना मिल रहा है?
परिवहन लागत कितनी घटी?
कितना उत्पाद गांव में ही संग्रहित हुआ?
कितना प्रसंस्कृत हुआ?
कितने किसानों की आय बढ़ी?
कितने स्थानीय रोजगार बने?

यदि इन सवालों के जवाब उपलब्ध नहीं होंगे तो योजना की वास्तविक सफलता का आकलन संभव नहीं होगा।

बिचौलिया हमेशा समस्या नहीं, लेकिन किसान की मजबूरी समस्या है

कृषि बाजार की चर्चा में अक्सर बिचौलियों को पूरी समस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।

व्यापारी, आढ़ती और स्थानीय खरीदार कृषि आपूर्ति श्रृंखला में परिवहन, संग्रहण, वित्त और बाजार की भूमिका निभाते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब किसान के पास वैकल्पिक बाजार नहीं होता।

यदि किसान के पास दो या तीन खरीदार हैं तो उसकी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ती है। यदि केवल एक स्थानीय व्यापारी ही खरीददार है तो कीमत तय करने की शक्ति किसान के पास नहीं रहती।

इसलिए “एक मंडी–एक गांव” का लक्ष्य बिचौलियों को समाप्त करना नहीं, बल्कि किसान को विकल्प देना होना चाहिए।

पहाड़ में मंडी की दूरी ही नहीं, भौगोलिक अर्थशास्त्र भी समझना होगा

मैदानी क्षेत्र में मंडी मॉडल अपेक्षाकृत सरल हो सकता है। लेकिन पहाड़ में सड़क, ढलान, मौसम, छोटे खेत और बिखरी हुई आबादी के कारण कृषि विपणन का अर्थशास्त्र अलग है।

कई बार किसान के खेत से मुख्य सड़क तक उत्पाद पहुंचाना ही महंगा पड़ता है।

इसलिए पर्वतीय मॉडल में बड़े मंडी परिसर के बजाय छोटे विकेंद्रीकृत संग्रहण और प्रसंस्करण केंद्र अधिक उपयोगी हो सकते हैं।

गांव—संग्रहण केंद्र—ब्लॉक स्तर का हब—क्षेत्रीय बाजार

का नेटवर्क तैयार किया जा सकता है।

यानी पहाड़ में मंडी को गांव में हूबहू स्थापित करने की बजाय मंडी की सेवाओं को गांव तक पहुंचाना अधिक व्यावहारिक मॉडल हो सकता है।

सरकारी खरीद से आगे जाना होगा

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उत्पाद खरीदेगा कौन?

यदि योजना के तहत केवल सरकारी विभाग या मंडी समिति बुनियादी ढांचा बना दें और उसके बाद बाजार उपलब्ध न हो तो किसान फिर उसी पुराने चक्र में लौट सकता है।

इसलिए प्रत्येक मॉडल गांव के लिए बाजार की पूर्व-व्यवस्था जरूरी है।

स्थानीय होटल, रेस्टोरेंट, स्कूलों की भोजन व्यवस्था, अस्पताल, धार्मिक संस्थान, सुपरमार्केट, ऑनलाइन बाजार, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और बड़े थोक खरीदार संभावित बाजार बन सकते हैं।

उत्तराखंड के पर्यटन क्षेत्र को भी स्थानीय कृषि उत्पादों के बाजार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, नैनीताल, मसूरी और चारधाम यात्रा मार्गों पर स्थानीय कृषि उत्पादों की मांग पैदा की जा सकती है।

सरकारी योजना से ग्रामीण आर्थिक मॉडल तक

“एक मंडी–एक गांव” को केवल कृषि मंडी विभाग की योजना मानना इसकी संभावनाओं को सीमित कर देगा।

इसे कृषि, उद्यान, ग्रामीण विकास, सहकारिता, पर्यटन, महिला सशक्तीकरण, खाद्य प्रसंस्करण और स्वरोजगार योजनाओं से जोड़ना चाहिए।

यदि एक गांव में उत्पादन कृषि विभाग बढ़ाए, प्रसंस्करण कोई दूसरा विभाग करे, बाजार कोई तीसरा विभाग तलाशे और वित्त चौथा विभाग दे—तो योजनाएं अलग-अलग चलती रहेंगी।

इसके बजाय मॉडल गांव के लिए एकीकृत कृषि मूल्य श्रृंखला विकसित करनी होगी।

पारदर्शिता सबसे जरूरी

सरकार को 23 चयनित गांवों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। इसके साथ प्रत्येक गांव के लिए एक सार्वजनिक “मॉडल कृषि विपणन ग्राम प्लान” होना चाहिए।

उसमें यह स्पष्ट हो—

  1. गांव में कितने किसान हैं।
  2. प्रमुख कृषि उत्पाद कौन-से हैं।
  3. अनुमानित उत्पादन कितना है।
  4. वर्तमान बाजार कहां है।
  5. वर्तमान किसान मूल्य क्या है।
  6. कौन-सी आधारभूत सुविधाएं विकसित होंगी।
  7. कुल बजट कितना है।
  8. कौन-सी एजेंसी जिम्मेदार होगी।
  9. बाजार से कौन जोड़ेगा।
  10. योजना की सफलता का मापदंड क्या होगा।

यदि यह जानकारी सार्वजनिक होगी तो किसान और नागरिक दोनों योजना की निगरानी कर सकेंगे।

अब सवाल घोषणा का नहीं, परिणाम का है

उत्तराखंड में कृषि को बचाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन खेती तभी टिकेगी जब किसान को खेती आर्थिक रूप से लाभकारी दिखाई देगी।

सड़क किसान को खेत तक पहुंचाती है। सिंचाई उत्पादन बढ़ाती है। बीज उत्पादकता बढ़ाते हैं। लेकिन बाजार किसान की मेहनत को आर्थिक मूल्य में बदलता है।

इसलिए “एक मंडी–एक गांव” योजना को एक छोटे प्रशासनिक प्रयोग की तरह नहीं, बल्कि उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के अवसर के रूप में देखना चाहिए।

23 मंडी समितियां यदि 23 गांवों को केवल “गोद” लेने के बजाय उन्हें स्वावलंबी कृषि बाजार, स्थानीय प्रसंस्करण केंद्र और ग्रामीण उद्यमिता के मॉडल में बदल देती हैं, तो इसका प्रभाव इन 23 गांवों से कहीं आगे जा सकता है।

लेकिन यदि गांव में एक बोर्ड लगा दिया गया, कुछ बैठकें हुईं, कुछ निर्माण कार्य हुए और किसान फिर वही पुरानी कीमत पर अपनी उपज बेचता रहा, तो योजना अपने मूल उद्देश्य में विफल मानी जाएगी।

उत्तराखंड के किसान को सरकारी संरक्षण से अधिक बाजार में ताकत चाहिए।

“एक मंडी–एक गांव” की वास्तविक सफलता इसी बात से तय होगी कि क्या इस योजना के बाद किसान अपनी उपज का दाम तय करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ता है—या फिर बाजार की शर्तें पहले की तरह उसके ऊपर तय होती रहती हैं।

सरकार के लिए चुनौती स्पष्ट है: मंडी को गांव तक ले जाना पर्याप्त नहीं है; किसान की सौदेबाजी की शक्ति को गांव से बाजार तक पहुंचाना होगा।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *