पनियाली तल्ला की जमीन का विवाद आज का नहीं है। उपलब्ध पुराने राजस्व और प्रशासनिक अभिलेख इस भूमि के कई दशकों पुराने उपयोग, पट्टों और कब्जे की कहानी बताते हैं। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज के भूमि अधिकार के सवाल को महत्वपूर्ण बनाती है।
पुराने रिकॉर्ड में 1948-49 से पहले भी इस क्षेत्र में बगीचों, लकड़ी कारोबार और अन्य गतिविधियों के लिए भूमि उपयोग का उल्लेख मिलता है। लकड़ी कारोबार से जुड़े परिवारों के लंबे समय तक यहां रहने तथा समय के साथ आवास और दुकानों के विकसित होने की जानकारी भी अभिलेखों में मिलती है।
भूमि के एक हिस्से के पुराने पट्टेदार के रूप में ताहिर हुसैन का नाम सामने आता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में इसी क्षेत्र की भूमि का एक हिस्सा सरकारी उपयोग में लिए जाने और करीब 1942 के आसपास वन विभाग के टिंबर सप्लाई डिपो के लिए दिए जाने का उल्लेख भी मिलता है। रिकॉर्ड में इसके लिए 300 रुपये वार्षिक किराये का जिक्र है।
टिंबर डिपो की गतिविधियां समाप्त होने के बाद भूमि का उपयोग फिर बदला। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार लकड़ी ठेकेदारों को कब्जा दिया गया और उनसे किराया वसूले जाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह भूमि सरकारी उपयोग से आगे बढ़कर लंबे समय तक लकड़ी कारोबार और आवासीय गतिविधियों का हिस्सा बनी।
पुराने दस्तावेजों में खाता संख्या 8 में 99बीघा 18 बिस्वा भूमि जिसमे 56 बीघा 6 बिस्वा का उल्लेख वन विभाग और उनसे जुड़े फारेस्ट कांट्रेक्टर के कब्जे मैं रहा जिन्हे और इससे जुड़े पुराने तथा बाद के 90 वर्ष के पट्टे का विवरण भी मिलता है। यह तथ्य बताता है कि यहां की भूमि व्यवस्था किसी एक समय के कब्जे से नहीं, बल्कि लंबे प्रशासनिक और राजस्व इतिहास से जुड़ी रही है।
इसके बाद 3 फरवरी 1966 के प्रशासनिक आदेश का उल्लेख मिलता है, जिसमें खाम भाबर, कोटद्वार की भूमि को खेत एवं टाउन एरिया कमेटी से संबंधित व्यवस्था में हस्तांतरित किए जाने की जानकारी है। आगे चलकर नजूल भूमि पर पुराने कब्जों के विनियमितीकरण, नया पट्टा देने और कब्जाधारकों का सत्यापन करने जैसे विषय भी प्रशासनिक स्तर पर उठते रहे।
यही वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जिसे आज के भूमि विवाद में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार द्वारा वर्ग-3 और वर्ग-4 की भूमि के पट्टेदारों और कब्जाधारकों को भूमिधरी अधिकार देने संबंधी हालिया कैबिनेट निर्णय ने इस पुराने सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि यह फैसला पनियाली तल्ला की पूरी भूमि पर स्वतः मालिकाना हक स्थापित नहीं करता, लेकिन यह जरूर सवाल खड़ा करता है कि जिन जमीनों का दशकों पुराना पट्टा, सरकारी उपयोग और कब्जे का रिकॉर्ड मौजूद है, उनकी वर्तमान स्थिति क्या है?
यहां किसी पक्ष को सही या गलत ठहराने से पहले प्रशासन को पुराने पट्टा अभिलेख, खसरा-खतौनी, भूमि हस्तांतरण संबंधी दस्तावेज, पुराने जिलाधिकारी के आदेश और वर्तमान राजस्व श्रेणी को एक साथ देखना चाहिए।
क्योंकि इतिहास को हटाकर भूमि का वर्तमान तय नहीं किया जा सकता।
दशकों पुराना कब्जा अपने आप मालिकाना हक नहीं बनाता, लेकिन पुराने पट्टे और प्रशासनिक रिकॉर्ड को नजरअंदाज करके भी न्यायपूर्ण निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा जा सकता।
पनियाली तल्ला का समाधान इसी में है कि जमीन के इतिहास और वर्तमान कानून—दोनों को सामने रखकर प्रत्येक भूखंड की स्थिति पारदर्शी तरीके से तय की जाए। यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं, बल्कि पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान प्रशासनिक जवाबदेही के बीच संतुलन का सवाल भी है।
