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आज जब तनाव, चिंता, अनिद्रा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, तब दुनिया एक बार फिर उस पुराने सच की ओर लौट रही है जिसे पहाड़ों के लोग सदियों से जानते हैं—प्रकृति के करीब रहना मनुष्य के लिए उपचार जैसा है।

जापान में इसे ‘शिनरिन-योकू’ यानी Forest Bathing कहा गया। इसका अर्थ जंगल में नहाना नहीं, बल्कि जंगल के वातावरण में कुछ समय इस तरह बिताना है कि मनुष्य पेड़ों, हवा, सुगंध, पक्षियों और प्राकृतिक शांति को महसूस कर सके।

वैज्ञानिक अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि जंगल के वातावरण में समय बिताने से शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया कम हो सकती है। पेड़-पौधों से निकलने वाले फाइटोनसाइड्स (Phytoncides), विशेषकर कई वृक्षों द्वारा छोड़े जाने वाले वाष्पशील प्राकृतिक यौगिक, इस अनुभव का एक हिस्सा हैं। वन वातावरण में समय बिताने के बाद कुछ अध्ययनों में कॉर्टिसोल जैसे तनाव-सूचक हार्मोन में कमी, हृदय गति और रक्तचाप में सुधार तथा कुछ प्रतिरक्षा-संबंधी संकेतकों में सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं।

हालांकि इसे किसी बीमारी की दवा या निश्चित उपचार मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि तनाव कम करने, मानसिक स्वास्थ्य और समग्र स्वास्थ्य के लिए प्रकृति से जुड़ना उपयोगी हो सकता है।

यहीं उत्तराखंड की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक छिपी है।

हमारे पास देवदार, बांज, बुरांश, चीड़, काफल और मिश्रित वनों से लेकर हजारों गांवों तक फैला विशाल प्राकृतिक परिदृश्य है। लेकिन जंगल को देखने का हमारा सरकारी और आर्थिक नजरिया अभी भी अक्सर लकड़ी, वन राजस्व, पर्यटन और वन्यजीव तक सीमित रहता है। हमें जंगल को ‘प्राकृतिक स्वास्थ्य संसाधन’ के रूप में भी देखना होगा।

क्यों न उत्तराखंड में चुनिंदा सुरक्षित वन क्षेत्रों को Forest Bathing और Nature Wellness Trails के रूप में विकसित किया जाए? वहां कंक्रीट के ढांचे खड़े करने के बजाय शांत पैदल पथ, स्थानीय गाइड, ध्यान स्थल, योग, पक्षी अवलोकन और स्थानीय जैव-विविधता की जानकारी उपलब्ध कराई जाए।

इससे गांवों को रोजगार मिल सकता है। स्थानीय युवा Nature Guide, Forest Wellness Guide और Bird Guide बन सकते हैं। होम-स्टे, स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी इससे जोड़ा जा सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे जंगल को काटकर पर्यटन विकसित करने के बजाय जंगल को बचाकर अर्थव्यवस्था विकसित करने का मॉडल सामने आएगा।

उत्तराखंड को यह समझना होगा कि उसके जंगल केवल कार्बन, लकड़ी और पर्यटन की संपत्ति नहीं हैं। वे जल, जलवायु, जैव-विविधता और मानव स्वास्थ्य की प्राकृतिक पूंजी हैं।

शायद भविष्य का पर्यटन वह नहीं होगा जिसमें पर्यटक जंगल में शोर करने जाए, बल्कि वह होगा जिसमें मनुष्य कुछ घंटों के लिए अपने शोर से दूर होकर जंगल की खामोशी में स्वयं को सुनने जाए।

जंगल बचेंगे तो केवल पर्यावरण नहीं बचेगा—हमारे शरीर और मन के लिए प्रकृति की यह अनमोल औषधि भी बची रहेगी।


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By udaen

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