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लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत!

आंकड़ा सुनकर आम आदमी पहले तो सोचता है—सिर्फ 19 प्रतिशत? फिर उसे याद आता है कि यह संसद है, कोई सरकारी दफ्तर नहीं जहां बायोमेट्रिक मशीन से उपस्थिति और काम दोनों नापे जाएं!

हमारी संसद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद है। यहां बहस होनी चाहिए, सवाल होने चाहिए, सरकार से जवाब मांगे जाने चाहिए, नीतियों पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन कई बार दृश्य ऐसा बन जाता है जैसे देश की सबसे बड़ी समस्या यही हो कि माइक किसके पास रहेगा और कौन कितनी देर नारे लगाएगा।

विपक्ष कहता है—हमें बोलने नहीं दिया जा रहा।

सत्ता पक्ष कहता है—विपक्ष सदन चलने नहीं दे रहा।

जनता दोनों को टेलीविजन पर देखती है और सोचती है—तो फिर हमारी बात कौन करेगा?

संसद में हंगामा लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अगर हंगामा ही संसदीय गतिविधि का सबसे उत्पादक हिस्सा बन जाए तो फिर 19 प्रतिशत भी शायद बहुत उदार आंकड़ा लगता है!

विडंबना देखिए—देश में बेरोजगारी पर बहस चाहिए, महंगाई पर बहस चाहिए, किसानों की समस्या पर बहस चाहिए, पहाड़ों से पलायन पर बहस चाहिए, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहस चाहिए। लेकिन संसद में कभी-कभी ऐसा लगता है कि सबसे तत्काल राष्ट्रीय संकट यह है कि किस सांसद को सदन से बाहर किया जाए और किसे अंदर बुलाया जाए।

हमारे सांसद जनता के प्रतिनिधि हैं। जनता उन्हें इसलिए नहीं भेजती कि वे पांच साल तक यह तय करते रहें कि किस दिन सदन चलना चाहिए और किस दिन नहीं।

जनता चाहती है कि उसका सांसद पूछे—

मेरे गांव में सड़क क्यों नहीं है?

अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं है?

युवा नौकरी के लिए शहर क्यों छोड़ रहा है?

किसान की लागत क्यों बढ़ रही है?

नदियां क्यों सूख रही हैं?

शहरों में प्रदूषण क्यों बढ़ रहा है?

और सरकार से जवाब मांगे।

लेकिन जब सदन की उत्पादकता 19 प्रतिशत तक पहुंच जाए तो लगता है कि लोकतंत्र का वर्क फ्रॉम होम चल रहा है—काम कम, राजनीतिक उपस्थिति ज्यादा!

अब सवाल यह भी है कि संसद की उत्पादकता नापने का कोई नया तरीका होना चाहिए क्या?

मसलन—

कितनी बार माइक बंद हुआ?

कितनी बार नारे लगे?

कितनी बार सदन स्थगित हुआ?

कितनी बार सांसदों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए?

और सबसे महत्वपूर्ण—

कितनी बार जनता के असली सवालों पर सरकार को जवाब देना पड़ा?

शायद तब हमारे पास एक नई संसदीय उत्पादकता रिपोर्ट होगी।

लोकसभा 19 प्रतिशत, राज्यसभा 39 प्रतिशत—और जनता?

जनता 100 प्रतिशत परेशान!

लेकिन इस व्यंग्य के पीछे एक गंभीर सवाल है।

संसद में विरोध होना चाहिए। सरकार की आलोचना होनी चाहिए। सत्ता से असहमति लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन विरोध का उद्देश्य संसद को बंद करना नहीं, संसद के भीतर अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखना होना चाहिए।

उधर सरकार को भी यह समझना होगा कि बहुमत का अर्थ यह नहीं कि बहस की आवश्यकता समाप्त हो गई। बहुमत कानून पारित करा सकता है, लेकिन सार्थक बहस कानून को बेहतर बनाती है।

लोकतंत्र में संख्या सरकार बनाती है, लेकिन संवाद लोकतंत्र बनाता है।

इसलिए संसद के माननीय सदस्यों से एक छोटा-सा निवेदन है—

अगली बार जब सदन में हंगामा करने का मन हो तो एक मिनट के लिए बाहर की दुनिया देख लीजिए।

वहां किसान अपनी फसल का हिसाब लगा रहा है।

युवा नौकरी का।

व्यापारी टैक्स का।

मजदूर रोजी का।

पहाड़ का परिवार पलायन का।

और आम आदमी अपनी रसोई का।

सबको उम्मीद है कि उनकी आवाज संसद तक पहुंचेगी।

इसलिए संसद चले तो ऐसी चले कि देश कह सके—हां, मेरे प्रतिनिधि मेरे लिए काम कर रहे हैं।

वरना इतिहास में यह दर्ज हो जाएगा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में संसद तो थी, सांसद भी थे, माइक भी थे…

बस बहस और काम कभी-कभी छुट्टी पर चले जाते थे!


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By udaen

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