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संपादकीय

दिनेश गुसाईं UNN

उत्तराखंड: पहाड़, पानी और अधिकार — सरकार नहीं, जनता मालिक

उत्तराखंड की पहचान उसकी नदियाँ, जंगल और पहाड़ हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं पर सबसे पहले स्थानीय लोगों के अधिकार सिमटते दिखाई देते हैं। जबकि संवैधानिक सच्चाई यह है कि सत्ता का स्रोत जनता है, और सरकार केवल ट्रस्टी—मालिक नहीं। यह सिद्धांत भारतीय संविधान की आत्मा है।

ज़मीन: विकास या विस्थापन?

पहाड़ों में ज़मीन केवल संपत्ति नहीं, जीवन-आधार है। सड़क, बांध, सुरंग, या टाउनशिप—हर परियोजना “जनहित” के नाम पर आती है, पर अनुच्छेद 300A याद दिलाता है कि संपत्ति कानून के बिना नहीं ली जा सकती। सवाल यह है कि क्या उचित मुआवज़ा, स्थानीय सहमति और पर्यावरणीय न्याय वास्तव में सुनिश्चित हो रहे हैं? जब निर्णय दूर बैठे दफ्तरों में होते हैं और बोझ पहाड़ उठाते हैं, तब विकास का नैतिक आधार कमजोर पड़ता है।

जंगल: संरक्षण के नाम पर बेदखली

उत्तराखंड के जंगल सदियों से वन-समुदायों की देखरेख में रहे हैं। आज “संरक्षण” की भाषा में परंपरागत अधिकार हाशिये पर हैं। जबकि वन अधिकार कानून, 2006 स्पष्ट करता है कि जंगलों पर पहला दावा स्थानीय समुदायों का है और ग्राम सभा सर्वोच्च। यदि संरक्षण का अर्थ लोगों को बाहर करना है, तो यह संरक्षण नहीं—विच्छेदन है।

पानी: नौले, धाराएँ और निजीकरण का खतरा

यहाँ की सभ्यता नौलों और धाराओं पर टिकी है। फिर भी जलस्रोत सूख रहे हैं, नदियाँ सुरंगों में कैद हैं, और पानी धीरे-धीरे व्यापार बनता जा रहा है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पानी जीवन का हिस्सा है। पहाड़ों में जल प्रबंधन का अधिकार स्थानीय निकायों और समुदायों के बिना संभव नहीं—केंद्रीकरण यहाँ समाधान नहीं, समस्या है।

केंद्र–राज्य नहीं, जनता केंद्र में

चाहे संघ सरकार, केंद्र सरकार या भारत सरकार—नाम कुछ भी हो, सीमा एक है: संविधान। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में नीति बनाते समय स्थानीय सहमति, पारिस्थितिकी और आजीविका को केंद्र में रखना होगा। पहाड़ों को केवल “प्रोजेक्ट साइट” समझना भविष्य के लिए जोखिम है।

 अंत में जो निष्कर्ष रहता है कि उत्तराखंड में संघर्ष सरकार बनाम राज्य का नहीं, नीति बनाम नागरिक का है। ज़मीन आपकी है, जंगल समुदाय के हैं, पानी सबका है। सरकार का कर्तव्य है—ट्रस्टशिप, पारदर्शिता और न्याय। और नागरिकों का अधिकार—सवाल पूछना, सहमति देना या न देना।

यही पहाड़ों का रास्ता है—विकास के साथ अधिकार। यही उत्तराखंड की आत्मा है।


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By udaen

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