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यूं तो सब्जियों के दाम मौसम के साथ बदलते रहते हैं लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि कोई सब्जी सोने के दाम के बराबर महंगी हो सकती है। जी हां, यकीन मानिए एक ऐसी सब्जी भी है जिसके दाम आपके होश उड़ा देंगे। यह सब्जी और कोई नहीं बल्कि पहाड़ी इलाकों में उगाई जाने वाली गुच्छी है जिसके दाम 25-30 हजार रूपए किलो हैं। यह दुनिया की सबसे महंगी सब्जी मानी जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूलेंटा है। गुच्छी 2-7 सेंमी. चैड़ी व 2-10 सेंमी. लंबी होती है।

हालांकि इन दिनों सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। आमतौर पर सब्जियां 50 रूपए किलो तक आ जाती हैं या फिर सीजन के शुरूआत में किसी भी नई सब्जी के दाम 100 रूपए किलो तक होते हैं और सीजन के अंत तक वही सब्जी गिरे दामों पर बेची जाती है। वहीं गुच्छी के दाम आसमान पर बने रहते हैं। यही नहीं इसका निर्यात भी बड़ी मात्रा में किया जाता है।

यहां होती है पैदावार

गुच्छी की पैदावार हिमाचल प्रदेश, कश्मीर और हिमालय के ऊंचे हिस्सों में होती है। विटामिन बी और डी के अलावा गुच्छी में विटामिन सी और विटामिन के भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। खास बात यह है कि इसके नियमित सेवन से दिल की बीमारी नहीं होती।

क्या है इतिहास?

हालांकि फफूंदी परिवार से होने के नाते इसकी उत्पत्ति फैलस एस्क्यूलेंटस के तौर पर कार्ल लिनेउस द्वारा सन् 1753 में की गई थी। स्वीडिश कवक वैज्ञानिक इलियास मैग्नस फ्राइस ने सन् 1801 में इसे मार्कुला एस्क्यूलेंटा नाम दिया था। नेपाल में इसे गुच्छी च्याउ के नाम से जाना जाता है। आपको बता दें कि एस्क्यूलेंटा एक लेटिन शब्द है जिसका अर्थ होता है खाने योग्य। इसी शब्द पर गुच्छी का वैज्ञानिक नाम पड़ा है। आमतौर पर यूरोप व चीन में पाए जाने वाले यैलो मोरेल प्रजाति में इसे रखने की बात वैज्ञानिक रिचर्ड ने सन् 2014 में उठाई थी लेकिन लेटिन अमरीका में इसी प्रजाति के अन्य मोरेल के विभिन्न नाम रख दिए गए।

ऐसी होती है गुच्छी

गुच्छी एक प्रकार का प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला मशरूम है जिसका तना सफेद व हल्के पीले रंग का होता है। यह अंदर से खोखला होता है जबकि इसका ऊपरी हिस्सा हल्का भूरा सफेदीपन से सिलेटी भूरे रंग का बहुत ही नरम हिस्सा होता है। यह क्षारीय मिट्टी से लेकर अम्लीय मिट्टी में उगता है। गुच्छी को बसंत ऋतु की शुरूआत में जंगलों, बागों, आंगन, वाटिकाओं व हाल ही में जलकर नष्ट होने वाले क्षेत्रों में पाया जा सकता है।

दुर्लभ है इसकी पैदावार ?

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस सब्जी की खेती नहीं की जाती बल्कि यह प्राकृतिक रूप से पैदा होती है। दरअसल पहाड़ी इलाकों में पहाड़ांे पर बिजली की गड़गड़ाहट व चमक से बर्फ से यह सब्जी निकलती है। इस सब्जी को पहाड़ों पर साधु-संत ढूंढकर इकट्ठा करते हैं और ठंड के मौसम में इसका इस्तेमाल करते हैं। प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगने वाली गुच्छी फरवरी से अप्रैल माह के बीच मिलती है। हालांकि प्राकृतिक तौर पर प्राप्त होने वाली इस सब्जी को व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल करने के लिए एक निश्चित तापमान पर उगाने के लिए सन् 1982 में प्रयास किए गए थे लेकिन इसमें सफलता हासिल नहीं हुई।

औषधीय गुणों से है भरपूर

गुच्छी को बनाने के लिए ड्रायफ्रूट्स, अन्य सब्जियों व घी का इस्तेमाल किया जाता है। खास बात यह है कि यह सब्जी स्वादिष्ट होने के साथ-साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इस सब्जी को हिंदी भाषी राज्यों में स्पंज मशरूम के नाम से भी जाना जाता है।

व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल

इसका सिर्फ औषधीय महत्व ही नहीं है बल्कि गुच्छी का इस्तेमाल व्यावसायिक तौर पर भी किया जाता है। बड़ी-बड़ी कंपनियां और होटल इसे हाथोंहाथ खरीद लेते हैं। यही कारण है पहाड़ी इलाकों के लोग सीजन के समय जंगलों में रहकर ही गुच्छी इकट्ठा करते हैं। बड़ी कंपनियां व होटल 10-15 हजार रूपए प्रति किलो के हिसाब से गुच्छी की खरीद करते हैं जबकि बाजार में इसकी कीमत सोने की कीमत से कम नहीं है।

यहां है सर्वाधिक मांग

गुच्छी की मांग सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी है। पाकिस्तान, अमरीका, यूरोप, फ्रांस, इटली और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में कुल्लू की गुच्छी की खासी मांग है। इसकी उत्पत्ति के कारण इसे पूर्वोत्तर अमरीका में मे-मशरूम के नाम से भी जाना जाता है लेकिन इसके फल फरवरी से जुलाई के बीच ही मिलते हैं।

45 लाख रूपए की सब्जी का भंडारा

एक संतश्री के अनुसार सन् 1980 के सिंहस्थ में जूना अखाड़ा के एक महंत ने 45 लाख रूपए की गुच्छी की सब्जी का भंडारा सात दिन तक चलाया था।


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By udaen

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