डॉ. राकेश राणा
किसी भी समाज का इतिहास और अतीत दोनों अलग बात है। इतिहास जहां कुछ घटनाओं का घटनाक्रम मात्र है वहीं अतीत एक बेतरतीब-सा बहता समंदर। दोनों के प्रति अंध आस्था अथवा अंध अस्वीकार्यता दोनों ही खतरनाक होती है। यह आग्रह भी भोलापन है कि इतिहास और अतीत को जैसा है-वैसा ही चित्रित किया जाय। तटस्थता की यह आदत समाज-विज्ञानों की प्रवृत्ति है। लेकिन इतिहास लेखन की प्रकृति इस प्रवृत्ति पर हमेशा भारी पड़ती है। क्योंकि, इतिहास-बोध इसे अबोध मानता है। किसी भी समाज के लिए अपने अतीत को समग्रता में समझ पाना आसान नहीं है।
दरअसल, इतिहास उस समग्रता को तोड़ कर खंड-खंड में अपने हिसाब से उसे समझने का प्रयास करता है। अतीत से चुनी घटनाओं को सोदेश्यपूर्ण क्रम में सजाने के हित और अधिकार हर समाज को है और हर इतिहासकार को भी। इतिहासकार वर्तमान की आवश्यकताओं के हिसाब से अपने अतीत में झांकता है। यही वजह है कि हर पीढ़ी के इतिहासकार का अतीत अलग-अलग और अपने ढंग का दिखता है। अतीत को समझने की इस प्रक्रिया में वर्तमान जो स्वरुप ग्रहण करता है वही असली इतिहास-धर्म है। इतिहास और अतीत के मध्य चलने वाली परस्पर अंतःक्रिया ही किसी समाज की इतिहास-दृष्टि बनती है। जिसके आलोक में वह अपनी समकालीनता का आख्यान गढ़ता है। अपने वर्तमान की धारणाओं-अवधारणाओं, संस्कृति, राजनीति, धर्म, मान्यताओं और मूल्यों-मानकों को नयी व्याख्याएं प्रदान करता है। जो उसकी प्रगति और विकास के परिप्रेक्ष्य को व्यापकता प्रदान करते हैं। यही किसी व्यक्ति, समूह, समाज या राष्ट्र के लिए अपने इतिहास की असली भूमिका बनती है।
बौद्धिक हल्कों के लिए इतिहास का मुख्य काम बीते युगों की खोज का है। इस उदेश्य से कि वह वर्तमान और भविष्य का मार्गदर्शन कर सके। इतिहास की इन भूमिकाओं के दबावों से इतिहास लेखन की दशा-दिशा प्रभावित होती रहती है। किसी खास समय में खास स्वरूप ग्रहण करता दिखता रहता है। इतिहास जब अपने समय से वाद करने बैठता है तो वह विश्लेषण की तरफ बढ़ता है। वह अपने दौर की सामाजिक प्रवृत्तियों को चिन्हित करता है। जब इन सामाजिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण इतिहास-दृष्टि करती है तो अन्य सामाजिक-विज्ञानों से स्वतः ही उसका संबंध जुड़ने लगता है। इतिहास जब सामाजिक संबंधों पर जोर देता है तो वह समाजशास्त्रीय अर्थ ग्रहण करने लगता है। जब किसी व्यक्ति अर्थात निजी जीवन पर केन्द्रित होकर अर्थ अवधारणाएं देने लगता है तो व्यक्तित्व को समझते हुए वह मनोविज्ञान के करीब दिखाई पड़ता है। जब इतिहास सामाजिक बनावट और एकीकरण की बात करने लगे तो वह राजनीति का सहयोगी होने लगता है। जब किसी समाज का इतिहासकार अपने अतीत की घटनाओं की क्रमबद्धता को सामाजिक वर्ग और संघर्षों में खोजने और समझने की चेष्टा करता है तो वह अर्थशास्त्र से अर्थ ग्रहण करने लगता है। जब इतिहास ऊपर से नीचे की ओर झांकता है तो सांमतवाद-सा दिखता है और जब नीचे से ऊपर की ओर देखता है तो लोकतंत्र लगता है।
अतीत किसी भी समाज के लिए पुनर्निर्माण का आधार है। जो परम्परा के मूल्यांकन का साधन बनता और अपने निर्भय सत्य से समाज को भावी विकास की धाराओं पर विचार करने के लिए सार्थक और तार्किकता से प्रेरित कर आधार प्रदान करता है। अनुभव बताते हैं कि परम्पराएं सामाजिक विकास या ह्रास से असंपृक्त नहीं रहती हैं। उनके रुप-स्वरूप में परिवर्तन जरूर होता रहता है। विचार और सामाजिक-प्रक्रियाएं परम्परा द्वारा पुष्पित, पल्लवित और प्रभावित होती है। नये संदर्भ उन्हें नये अर्थ देते हैं। नयी शब्दावली देते हैं, नयी व्याख्याएं देते हैं। परम्पराएं अपने आप में जीवित होती हैं। समय-समय पर अपना आत्म-मूल्यांकन कर अपनी क्रियाएं बदलती हैं। परम्परा की आंतरिक गतिशीलता को स्वीकार किये बिना उसके स्वरूप को नहीं समझा जा सकता। सामाजिक पुनर्निर्माण का काम भी तभी संभव है, जब परम्परा मजबूत आधार बनने को तैयार हो। परम्परा न मिथक है न इतिहास है। उसमें दोनों के तत्व घुले-मिले हैं। परम्पराएं स्व-निर्णय से बदलती हैं। स्थिति-जन्य समझौते करती हैं। संक्रमणकाल में परम्परा का अरहस्यकरण करना राष्ट्रीय दायित्व बन जाता है। यही इतिहास की असली परीक्षा होती है। एक प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता की टिपपणी-‘इतिहासकारों को रुककर समय-समय पर स्थिति का जायजा लेना चाहिए कि जिसे हम परम्परा के रूप में स्वीकारते हैं वह स्वीकारने योग्य है भी या नहीं।’ अतीत इतिहासकार के लिए कच्चे माल का भंडार है। उसका सदुपयोग ही एक सच्चे-अच्छे इतिहासकार का पहला और पुनीत दायित्व है। तथ्यों और घटनाओं की क्रमबद्धता इतिहास लेखन की दक्षता और इतिहासकार की रुचि एवं प्रशिक्षण पर बहुत निर्भर करती है। वह घटनाओं को किस तरह अंतर्संबंधित करता है। किस घटना को केन्द्रीय महत्व मिलता है। यह जरूरी है। क्योंकि, समग्र अतीत को एक साथ प्रस्तुत करना संभव नहीं है। यही इतिहास की वह कमजोरी है जिसका फायदा सियासत सदैव उठाती है। हालांकि मानवीय निजता की तरह कुछ गोपनीय पहलू अतीत का हिस्सा भी हो सकते हैं। कुछ घटनाएं घट जाती हैं जिन पर बस नहीं होता है। उनकी चर्चा भी बहुत जरूरी या प्रीतिकर अथवा उपयोगी नहीं होती है। इतिहास लेखन में इतिहासकार के विवेक की कसौटी यही है। यहीं उसकी विद्वता का निर्णायक समय-केन्द्र भी होता है, जहां से उसका इतिहास-बोध जागता है।
अतीत के अहाते से क्या चुनकर लाना है, जो समाज के लिए धारणीय हो, संपोषणीय हो, उसके विकास और प्रगति में बाधक न हो। यह समझ किसी इतिहासकार के लिए आवश्यक शर्त की तरह है। अतीत का मोह मायावी स्वर्ण मृग की तरह है। अतीत के मोह, वर्तमान की ऊहापोह और भविष्य के प्रति सदिच्छा के लिए तमाम लोभ-लालचों, लालसाओं से ऊपर उठकर अपना इतिहास-बोध जाग्रत करना, अपनी आत्मा की आवाज सुनना, हंस के हुनर को अंगीकार कर दूध-का-दूध और पानी-का-पानी करना ही विद्वत-धर्म है।
अतीत के उन सभी तथ्यों, प्रतीकों, मिथकों, परम्पराओं, अवशेषों, मान्यताओं, प्रतिमानों, मूल्यों, मानकों, पुरातत्वों, आलेखों तथा धर्म-शास्त्रीय परम्परा के साहित्य में समाहित विचार-श्रंखलाओं में समाज के अतीत, वर्तमान और भावी संकल्पनाओं को समझने का उद्यम करना होगा। किस प्रकार इतिहास का चक्र समाज के रथ को गतिमान रखता है? निर्माण और पुनर्निर्माण का अनवरत सिलसिला अतीत के अनुभवों और अनुसंधानों से कैसे आक्सीजन लेता है? इन्हीं सब संदर्भों में इतिहास की समाज के विकास और पुनर्निर्माण में भूमिका को समझने की आवश्यकता है। आधुनिक इतिहास के दायित्व और भी बढ़ गये हैं। हम सूचनाओं से सराबोर ऐसे संसार मे जी रहे हैं जहां सत्य, तथ्य और कथ्य के बीच सामाजिक प्रतिबद्धता बनाये रखना पड़ता है। ऐसे समाज का इतिहास सामाजिकीय संघटनाओं के विश्वव्यापी मानव का इतिहास होगा। यह इतिहास-दृष्टि वैश्विक अंतर्संबंधों और लोक सन्दर्भों को समझने से ही विकसित हो सकेगी। आशा है नयी सदी में इतिहास अतीत के झरोखों से जो झांकियां प्रस्तुत करेगा, वे निश्चय ही नये विश्व को प्रगतिशील अर्थों और व्याख्याओं से सुसज्जित कर एक सभ्य, समृद्ध, समरस, शांतिपूर्ण और प्रगति-पथ पर बढ़ाती हुई दुनिया का मार्गदशन करने में काम आएगी।
(लेखक समाजशास्त्री हैं।)
