नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
आज जिस दिल्ली को देश की सत्ता, लोकतंत्र और प्रशासन का केंद्र माना जाता है, उसकी सबसे प्रतिष्ठित इमारतें—राष्ट्रपति भवन, संसद परिसर, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक और लुटियंस दिल्ली की चौड़ी सड़कें—एक ऐसे भू-दृश्य पर खड़ी हैं, जो कभी ग्रामीण जीवन, खेती और बस्तियों का हिस्सा था।
नई दिल्ली के निर्माण की कहानी अक्सर लुटियंस और बेकर की वास्तुकला, ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी और 1911 के दिल्ली दरबार के संदर्भ में बताई जाती है। लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भूमि अधिग्रहण और ग्रामीण विस्थापन है।
हालांकि, इस संदर्भ में प्रचलित दावा कि “21 गाँवों को उजाड़कर नई दिल्ली बनाई गई”, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के आधार पर सीधे-सीधे सही नहीं माना जा सकता। उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने राजधानी स्थानांतरण की परियोजना के लिए दिल्ली क्षेत्र के लगभग 150 गाँवों की करीब 17,000 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी। वहीं वर्तमान लुटियंस दिल्ली के मुख्य क्षेत्र में कम से कम सात प्रमुख गाँवों/बस्तियों—रायसीना, मालचा, कुशक, पेलांजी, दसघरा, तालकटोरा और मोतीबाग—को उनके मूल स्थान से हटाया गया।
12 दिसंबर 1911: जब दिल्ली फिर बनी सत्ता का केंद्र
12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की।
इसके बाद नई राजधानी के लिए दक्षिणी दिल्ली के क्षेत्र को चुना गया। रायसीना की पहाड़ी और उसके आसपास का इलाका नई प्रशासनिक राजधानी के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना था।
लेकिन यहां पहले से ही गांव, खेत और ग्रामीण आबादी मौजूद थी।
नई राजधानी के निर्माण के लिए औपनिवेशिक सरकार ने Land Acquisition Act, 1894 के तहत जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। 21 दिसंबर 1911 की अधिसूचना का उल्लेख बाद के न्यायिक मामलों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है।
150 गाँव और 17 हजार एकड़ जमीन
इस इतिहास का एक महत्वपूर्ण आंकड़ा लगभग 150 गाँव और 17,000 एकड़ जमीन का है।
2014-15 में सामने आए न्यायिक विवादों में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि 1911-12 में राजधानी स्थानांतरण के लिए दिल्ली के 150 गाँवों की लगभग 17,000 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई थी। इन दावों में मालचा और रायसीना की जमीन भी शामिल थी।
हालांकि, यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा।
150 गाँवों की जमीन का अधिग्रहण और 150 गाँवों का पूर्ण विस्थापन एक ही बात नहीं है।
नई दिल्ली के मुख्य प्रशासनिक क्षेत्र में जिन बस्तियों को वास्तव में उनके मूल स्थान से हटाया गया, उनमें सात प्रमुख नाम बार-बार सामने आते हैं।
वे सात गाँव कौन थे?
ऐतिहासिक रिपोर्टों में निम्न सात गाँवों का उल्लेख मिलता है—
- रायसीना
- मालचा
- कुशक
- पेलांजी
- दसघरा
- तालकटोरा
- मोतीबाग
इनमें से कई नाम आज भी दिल्ली के नक्शे पर मौजूद हैं।
लेकिन आज का मालचा मार्ग, तालकटोरा और मोतीबाग उस पुराने ग्रामीण भूगोल की स्मृति मात्र हैं। मूल गाँवों की भूमि और बस्तियां राजधानी के निर्माण में समाहित हो गईं।
रायसीना गांव से राष्ट्रपति भवन तक
आज जिस स्थान को रायसीना हिल कहा जाता है, वही क्षेत्र कभी रायसीना गांव और उसकी कृषि भूमि का हिस्सा था।
राष्ट्रपति भवन जिस स्थान पर खड़ा है, वहां कभी ग्रामीण भू-दृश्य था।
ब्रिटिश प्रशासन के लिए यह जमीन सिर्फ एक गांव नहीं थी। यहां से नई राजधानी की सत्ता का प्रतीकात्मक केंद्र बनाया जाना था।
रायसीना की पहाड़ी पर वायसराय हाउस बनाया गया, जो स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपति भवन बना।
यानी एक ही भूखंड ने दो बिल्कुल अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं को देखा—
ब्रिटिश साम्राज्य का वायसराय हाउस → स्वतंत्र भारत का राष्ट्रपति भवन।
लेकिन दोनों के बीच जमीन की कहानी वही रही—एक ग्रामीण भूगोल का शहरी सत्ता केंद्र में रूपांतरण।
मालचा: जमीन, परिवार और मुआवजे का विवाद
मालचा गांव की कहानी इस पूरे इतिहास को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मालचा की लगभग 1,792 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। बाद में इसी भूभाग का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रपति एस्टेट और लुटियंस दिल्ली के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल हुआ।
दशकों बाद मालचा और रायसीना के कुछ परिवारों के वंशजों ने दावा किया कि उनके पूर्वजों को अधिग्रहित जमीन का पूरा मुआवजा नहीं मिला।
2014-15 के दौरान ऐसे दावों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में मामले पहुंचे। एक मामले में याचिकाकर्ताओं ने 1912 के भुगतान रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि उनके पूर्वज के नाम पर 2,217 रुपये, 10 आना और 11 पैसे का मुआवजा निर्धारित था, लेकिन भुगतान का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ताओं के दावे थे; इन्हें सभी भूमि मालिकों के साथ हुई स्थिति के सार्वभौमिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
मुआवजा कितना था?
उस समय के मुआवजे को लेकर उपलब्ध द्वितीयक स्रोतों में अलग-अलग दरों का उल्लेख मिलता है। एक रिपोर्ट में कृषि भूमि के लिए लगभग 15 से 20 रुपये प्रति एकड़ और प्रति परिवार 5 रुपये का disturbance allowance बताए जाने का उल्लेख है।
लेकिन भूमि की प्रकृति, सिंचाई और संबंधित अधिग्रहण के आधार पर दरें अलग हो सकती थीं। इसलिए किसी एक दर को सभी जमीनों पर लागू मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
सिर्फ जमीन नहीं गई, जीवन-व्यवस्था बदली
भूमि अधिग्रहण का सबसे बड़ा प्रभाव केवल मकान या खेत खोने तक सीमित नहीं था।
दिल्ली के ग्रामीण समाज की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित थी।
जब खेत शहर के लिए चले गए तो ग्रामीणों की आर्थिक संरचना बदल गई।
एक अध्ययन में दिल्ली के लगभग 150 गाँवों की कृषि भूमि के अधिग्रहण को ग्रामीण जीवन के क्रमिक विघटन और कृषि से गैर-कृषि रोजगार की ओर बदलाव से जोड़ा गया है।
यही वह बिंदु है जहां नई दिल्ली का इतिहास आज के भारत के भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के सवाल से जुड़ता है।
क्या 21 गाँवों का आंकड़ा गलत है?
इसे सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
उपलब्ध प्रमुख स्रोतों में नई दिल्ली के केंद्रीय लुटियंस क्षेत्र से उजड़ी प्रमुख बस्तियों की संख्या सात बताई गई है, जबकि राजधानी निर्माण के लिए व्यापक भूमि अधिग्रहण का आंकड़ा लगभग 150 गाँव है।
इसलिए “21 गाँवों को उजाड़कर नई दिल्ली बनी” शीर्षक को यदि इस्तेमाल किया जाए तो उसके साथ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 21 की संख्या किस प्रशासनिक/भौगोलिक सूची या किस चरण के अधिग्रहण को संदर्भित करती है।
एक जिम्मेदार समाचार पोर्टल के लिए बेहतर शीर्षक होगा:
“गाँवों की जमीन पर खड़ी हुई नई दिल्ली: रायसीना से लुटियंस दिल्ली तक विस्थापन की कहानी”
या:
“राष्ट्रपति भवन की जमीन पर कभी था रायसीना गांव: नई दिल्ली के निर्माण का भूला हुआ इतिहास”
या अधिक खोजी अंदाज में:
“नई दिल्ली के नीचे दबा ग्रामीण इतिहास: 150 गाँवों की जमीन, सात बस्तियों का विस्थापन”
आज के लिए इसका क्या अर्थ है?
नई दिल्ली का इतिहास हमें विकास की एक महत्वपूर्ण कीमत की याद दिलाता है।
एक तरफ ब्रिटिश सरकार ने एक नियोजित राजधानी बनाई—चौड़ी सड़कें, प्रशासनिक भवन, विशाल हरित क्षेत्र और भव्य वास्तुकला।
दूसरी तरफ उसी परियोजना में ग्रामीण जमीन का अधिग्रहण हुआ और केंद्रीय राजधानी क्षेत्र में मौजूद पुरानी बस्तियां समाप्त हो गईं।
आज जब भारत में एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी, रेलवे परियोजनाओं, शहरी विस्तार और सरकारी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहित की जाती है, तब 1911-12 की यह कहानी एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है—
क्या किसी शहर की आधुनिकता को केवल उसकी इमारतों से मापा जाना चाहिए, या उन लोगों की कहानी से भी जिनकी जमीन पर वह शहर खड़ा हुआ?
नई दिल्ली सिर्फ लुटियंस की वास्तुकला नहीं है।
उसके नीचे रायसीना, मालचा, कुशक, पेलांजी, दसघरा, तालकटोरा और मोतीबाग जैसे पुराने ग्रामीण भू-दृश्य की स्मृतियां भी दबी हुई हैं।
और शायद यही नई दिल्ली के इतिहास का वह अध्याय है, जिसे राजधानी की चमक के बीच सबसे कम पढ़ा गया।
— विशेष रिपोर्ट | UNN न्यूज़ डेस्क
