15 अगस्त 1947।
दिल्ली में तिरंगा फहराया जा रहा था।
देश आजादी का जश्न मना रहा था।
सदियों की गुलामी के बाद भारत ने स्वतंत्रता की सुबह देखी थी।
लेकिन हिमालय की गोद में बसी टिहरी रियासत में उस दिन का सूरज एक अलग कहानी लेकर उगा था।
भारत आजाद हुआ था…
लेकिन टिहरी अभी आजाद नहीं हुई थी।
टिहरी के लोगों के लिए 15 अगस्त 1947 वह दिन नहीं था, जब वे अपनी रियासत की गुलामी से मुक्त हुए। वे तत्कालीन भारतीय संघ के नागरिक नहीं, बल्कि टिहरी गढ़वाल रियासत की प्रजा थे।
यहां सत्ता राजा की थी।
राज्य का अपना शासन था।
अपनी राजकीय परंपराएं थीं।
और राजशाही की अपनी पहचान।
तिरंगा तब टिहरी की सत्ता का प्रतीक नहीं था।
राजा का स्तुतिगान ही राजकीय समारोहों का हिस्सा था—
“रक्षन्तु बोलांदा बदरी…”
भारत में “जन गण मन” राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन टिहरी की राजशाही का अपना राजकीय संसार था।
और इसी संसार में 15 अगस्त 1947 की सुबह आई।
आजादी का जश्न… लेकिन टिहरी में निषेधाज्ञा
टिहरी की जनता भी आजादी का जश्न मनाना चाहती थी।
लेकिन राजशाही को यह मंजूर नहीं था।
रैली पर रोक।
सभा पर रोक।
भाषण पर रोक।
टिहरी में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई।
सड़कों पर सेना और पुलिस का पहरा था।
जो लोग भारत की आजादी का उत्सव मनाना चाहते थे, वे सत्ता की नजर में संदिग्ध थे।
कई कार्यकर्ता पहले से जेल में बंद थे।
और आजादी की आवाज उठाने वालों की गिरफ्तारियां जारी थीं।
विडंबना देखिए—
जिस दिन पूरे भारत में अंग्रेजी शासन की समाप्ति का उत्सव मनाया जा रहा था, उसी दिन टिहरी की जनता अपनी ही रियासत में स्वतंत्रता के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही थी।
यह संघर्ष अचानक शुरू नहीं हुआ था
इसके पीछे वर्षों का संघर्ष था।
तिलाड़ी का नरसंहार टिहरी की सामूहिक स्मृति में दर्ज हो चुका था।
श्रीदेव सुमन अपनी शहादत दे चुके थे।
राजशाही के खिलाफ जनता की आवाज लगातार मजबूत हो रही थी।
टिहरी प्रजामंडल इस संघर्ष का राजनीतिक मंच बन चुका था।
प्रजामंडल के नेताओं पर दमन हुआ।
अध्यक्ष परिपूर्णानंद पैन्यूली गिरफ्तार किए गए।
महामंत्री प्रेमलाल वैद्य, दादा दौलतराम और अनेक दूसरे कार्यकर्ता जेलों में बंद थे।
राजशाही के लिए सबसे खतरनाक शब्दों में से एक था—
“आजादी।”
क्योंकि आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं था।
टिहरी के लिए आजादी का अर्थ था—
राजशाही के निरंकुश शासन से मुक्ति।
15 अगस्त के बाद आंदोलन और तेज हुआ
15 अगस्त को टिहरी में जिस आजादी को मनाने की अनुमति नहीं मिली, उसकी प्रतिक्रिया अगले ही दिन दिखाई दी।
16 अगस्त 1947 को जनता ने हड़ताल कर दी।
यह केवल एक हड़ताल नहीं थी।
यह उस असंतोष की सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी, जो वर्षों से भीतर ही भीतर जमा हो रहा था।
धीरे-धीरे गांवों में नई राजनीतिक चेतना फैलने लगी।
आजाद पंचायतें बनने लगीं।
राजशाही की प्रशासनिक पकड़ को चुनौती मिलने लगी।
टिहरी का संघर्ष अब केवल शहर तक सीमित नहीं रहा।
वह गांवों तक पहुंच चुका था।
और जब कोई आंदोलन गांवों तक पहुंच जाता है, तो सत्ता के लिए उसे केवल बंदूक और जेल के बल पर रोकना आसान नहीं रहता।
पांच महीने बाद…
15 अगस्त 1947 को टिहरी आजाद नहीं हुई थी।
लेकिन इतिहास ने अगले कुछ महीनों में घटनाओं की दिशा बदल दी।
राजशाही और जनता के बीच संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंच गया।
11 जनवरी 1948।
किरतीनगर क्षेत्र में नागेंद्र सकलानी और मोलाराम भरदारी की शहादत हुई।
दो क्रांतिकारियों की मौत ने पूरे आंदोलन को निर्णायक मोड़ दे दिया।
जनता का आक्रोश और व्यापक हुआ।
और फिर आया—
15 जनवरी 1948।
टिहरी की जनक्रांति सफल हुई।
जिस रियासत में 15 अगस्त 1947 को आजादी का जश्न मनाने पर पाबंदी थी, उसी टिहरी में पांच महीने बाद राजशाही की सत्ता के विरुद्ध जनता की जीत का अध्याय लिखा गया।
इसलिए टिहरी के लिए 15 अगस्त की कहानी थोड़ी अलग है
भारत की आजादी की कहानी केवल 15 अगस्त 1947 को खत्म नहीं होती।
टिहरी के इतिहास में स्वतंत्रता की तारीख केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।
यह संघर्ष है।
यह तिलाड़ी की स्मृति है।
यह श्रीदेव सुमन की शहादत है।
यह जेलों में बंद प्रजामंडल कार्यकर्ताओं की कहानी है।
यह 15 अगस्त 1947 की निषेधाज्ञा है।
यह 16 अगस्त की हड़ताल है।
यह गांव-गांव बनीं आजाद पंचायतें हैं।
यह नागेंद्र सकलानी और मोलाराम भरदारी की शहादत है।
और यह 15 जनवरी 1948 की जनक्रांति है।
इसलिए जब आज हम 15 अगस्त को तिरंगा फहराते हैं, तो टिहरी की उस पीढ़ी को भी याद करना चाहिए जिसके लिए भारत की स्वतंत्रता एक मंजिल थी—लेकिन अपनी रियासत की स्वतंत्रता अभी बाकी थी।
भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ।
टिहरी की जनता ने अपनी आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा।
और कुछ महीनों बाद उस संघर्ष ने इतिहास बदल दिया।
क्योंकि आजादी केवल सत्ता हस्तांतरण का नाम नहीं है।
आजादी का असली अर्थ है—
जनता का अपने भविष्य पर अधिकार।
