पौड़ी के कंडोलिया क्षेत्र से सामने आई करीब दो हजार पेड़ों के संभावित कटान की खबर केवल एक सड़क चौड़ीकरण परियोजना की सूचना नहीं है। यह उस विकास-दृष्टि पर गंभीर सवाल खड़ा करती है, जिसमें सड़क की चौड़ाई को विकास का पैमाना और खड़े पेड़ों को विकास की सबसे आसान कीमत मान लिया जाता है।
कंडोलिया–टेका मार्ग के चौड़ीकरण के लिए पेड़ों के चिह्नीकरण की खबर ने पौड़ीवासियों और पर्यावरण प्रेमियों की चिंता बढ़ा दी है। तस्वीर में दिखाई दे रहे देवदार के पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं हैं। वे उस पहाड़ी पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं, जिसने पौड़ी शहर को उसकी पहचान, ठंडक और प्राकृतिक सौंदर्य दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सड़क चौड़ी करने के लिए हर पेड़ को काटना अनिवार्य है?
अगर पेड़ सीधे हैं तो क्या उनकी यही सबसे बड़ी गलती है कि वे सड़क की प्रस्तावित सीमा में आ गए हैं? और अगर वही पेड़ टेढ़े होते तो क्या विकास की मशीनरी उन्हें बचाने का कोई रास्ता खोजती?
यह सवाल व्यंग्य नहीं, हमारी विकास नीति की परीक्षा है।
पेड़ केवल पेड़ नहीं होते
एक देवदार को काटने के बाद उसकी जगह नया पौधा लगा देना कागज पर आसान समाधान हो सकता है, लेकिन पारिस्थितिकी में ऐसा नहीं होता। दशकों में तैयार हुआ एक परिपक्व वृक्ष केवल तना और शाखाएं नहीं बनाता। वह मिट्टी को थामता है, नमी बनाए रखने में योगदान देता है, तापमान को नियंत्रित करता है, जैव विविधता को आश्रय देता है और वर्षा के पानी के स्थानीय चक्र का हिस्सा बनता है।
किसी पहाड़ी शहर के संदर्भ में इसका महत्व और बढ़ जाता है।
आज जलस्रोतों के सूखने की चिंता पूरे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ रही है। ऐसे समय में पहाड़ी ढलानों पर मौजूद पुराने वृक्षों को काटकर फिर यह उम्मीद करना कि कुछ वर्षों बाद लगाए गए पौधे वही पर्यावरणीय भूमिका निभा देंगे, वैज्ञानिक दृष्टि से भी गंभीर सवाल पैदा करता है।
एक पेड़ लगाया जा सकता है, लेकिन एक परिपक्व जंगल बनाया नहीं जा सकता—वह समय के साथ बनता है।
सड़क चाहिए, लेकिन कैसी सड़क?
यह संपादकीय सड़क निर्माण या विकास का विरोध नहीं करता। पौड़ी जैसे पहाड़ी शहरों में बेहतर सड़कें आवश्यक हैं। यातायात, सुरक्षा और स्थानीय आवागमन की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या सड़क चौड़ीकरण का डिजाइन पेड़ों को बचाने की अधिकतम कोशिश के बाद तैयार किया गया है?
क्या सड़क की चौड़ाई में मामूली बदलाव से पेड़ों की संख्या कम की जा सकती है?
क्या रिटेनिंग वॉल, ढलान स्थिरीकरण, एकतरफा यातायात, नियंत्रित पार्किंग या अन्य इंजीनियरिंग विकल्पों का परीक्षण किया गया?
क्या सड़क के दोनों ओर समान चौड़ीकरण के बजाय केवल एक ओर का विकल्प देखा गया?
क्या हर चिह्नित पेड़ के संबंध में यह दर्ज किया गया है कि उसे काटना क्यों अनिवार्य है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या स्थानीय जनता को परियोजना की पूरी जानकारी देकर निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया गया है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
कंडोलिया पौड़ी का प्राकृतिक ताज है
पौड़ी केवल एक जिला मुख्यालय नहीं है। उसकी पहचान उसके पहाड़, जंगल, ढलान, मौसम और प्राकृतिक परिदृश्य से बनी है। कंडोलिया इसी प्राकृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शहरों में जब हरियाली खत्म होती है तो बाद में करोड़ों रुपये खर्च करके पार्क और हरित पट्टियां विकसित की जाती हैं। लेकिन पौड़ी के पास पहले से मौजूद प्राकृतिक जंगल को यदि सड़क चौड़ीकरण की कीमत पर कम कर दिया गया, तो बाद में लगाए जाने वाले पौधे उस क्षति की भरपाई नहीं कर पाएंगे।
विकास की विडंबना यही है कि हम पहले प्राकृतिक पूंजी को नष्ट करते हैं और फिर उसकी भरपाई के लिए बजट बनाते हैं।
बच्चों की उम्र के पेड़ों का सवाल
सबसे मार्मिक सवाल उन पेड़ों को लेकर है जो शायद आज हमारे बच्चों की उम्र के हैं।
जिस पेड़ को किसी परिवार ने वर्षों पहले बढ़ते हुए देखा होगा, जिस पेड़ की छाया में पीढ़ियां बड़ी हुई होंगी, उसे एक दिन मशीन की आरी से गिरा देना केवल वन विभाग की एक फाइल में दर्ज संख्या नहीं हो सकती।
दो हजार पेड़ दो हजार संख्याएं नहीं हैं।
वे हजारों पक्षियों के बसेरे हैं, मिट्टी की पकड़ हैं, हवा की गुणवत्ता में योगदान हैं, जलचक्र का हिस्सा हैं और आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक विरासत हैं।
सरकार से विरोध नहीं, जवाबदेही की मांग
सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि पर्यावरण की चिंता को विकास विरोधी कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन भविष्य में होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की जिम्मेदारी से बचना आसान नहीं होगा।
यदि परियोजना आवश्यक है तो सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि—
- कुल कितने पेड़ प्रभावित होंगे?
- इनमें कितने देवदार और अन्य प्रजातियों के पेड़ हैं?
- कितने पेड़ों को बचाने के विकल्पों का परीक्षण किया गया?
- परियोजना का पर्यावरणीय प्रभाव क्या होगा?
- जलस्रोतों और ढलानों पर संभावित प्रभाव का अध्ययन हुआ या नहीं?
- पेड़ों के बदले प्रस्तावित प्रतिपूरक वनीकरण कहां और कितने क्षेत्र में होगा?
- और क्या स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों की राय ली गई है?
पारदर्शिता किसी भी विकास परियोजना की पहली शर्त होनी चाहिए।
अब फैसला पौड़ी को भी करना होगा
यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। पौड़ी के नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे विकास के प्रश्न को भावनात्मक नारे से आगे ले जाएं और तथ्य आधारित जनसंवाद खड़ा करें।
यदि सड़क वास्तव में जरूरी है तो उसके बेहतर विकल्प खोजे जाएं। यदि पेड़ों की कटाई अपरिहार्य है तो उसका वैज्ञानिक और सार्वजनिक औचित्य सामने रखा जाए। और यदि बिना बड़े पैमाने पर पेड़ काटे सड़क का समाधान संभव है तो सरकार को वह रास्ता अपनाना चाहिए।
क्योंकि आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने पेड़ काटे जाएंगे।
सवाल यह है कि हम अपने शहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा छोड़ना चाहते हैं?
एक ऐसा पौड़ी जहां सड़कें चौड़ी हों लेकिन जंगल सिकुड़ते जाएं?
या ऐसा पौड़ी जहां विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कायम हो?
कंडोलिया के देवदार आज मौन हैं। लेकिन आने वाली पीढ़ियां जरूर पूछेंगी—जब उन्हें काटा जा रहा था, तब पौड़ी चुप क्यों था?
इसलिए कंडोलिया को बचाने की मांग किसी एक संगठन, दल या व्यक्ति की मांग नहीं होनी चाहिए। यह पौड़ी के नागरिक समाज की सामूहिक आवाज होनी चाहिए।
सड़क भी चाहिए, विकास भी चाहिए—लेकिन जंगल की कीमत पर नहीं।
कंडोलिया केवल आज का जंगल नहीं है।
यह पौड़ी की आने वाली पीढ़ियों की सांस है।
