Spread the love

देहरादून: विकास की राजधानी या कंक्रीट का जंगल?

UNN:उत्तराखंड के गठन को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन 25 वर्षों में देहरादून ने राजधानी के रूप में जिस तेजी से विस्तार किया, वह राज्य की प्रशासनिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक जरूर है, लेकिन इसी विकास के साथ एक ऐसा सवाल भी खड़ा हो गया है, जिसे अब टाला नहीं जा सकता—क्या देहरादून विकास की राजधानी बन रहा है या धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगल में बदल रहा है?

सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया है कि राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में हुए कुल वन कटान का 47 प्रतिशत अकेले देहरादून जिले में हुआ है। यदि यह आंकड़ा मूल सरकारी अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो यह केवल एक पर्यावरणीय आंकड़ा नहीं, बल्कि पिछले ढाई दशकों की विकास नीति पर गंभीर टिप्पणी है।

देहरादून कभी अपने जंगलों, नदियों, नालों, साल के वृक्षों और प्राकृतिक हरियाली के लिए जाना जाता था। इसकी पहचान केवल राजधानी के रूप में नहीं थी; यह एक ऐसा शहर था जहां शहरी जीवन और प्रकृति के बीच एक संतुलन दिखाई देता था। आज वही संतुलन तेजी से टूटता नजर आ रहा है।

सवाल यह नहीं है कि विकास क्यों हो रहा है। सवाल यह है कि विकास की कीमत कौन चुका रहा है?

सड़क चाहिए, आवास चाहिए, अस्पताल चाहिए, स्कूल चाहिए, उद्योग चाहिए और रोजगार भी चाहिए। लेकिन क्या इन सभी जरूरतों को पूरा करने का एकमात्र रास्ता पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक क्षेत्रों के कंक्रीटीकरण से होकर गुजरता है? यदि जवाब नहीं है, तो फिर सरकारों को यह बताना होगा कि वैकल्पिक और टिकाऊ शहरी नियोजन कहां है?

देहरादून में लगातार बढ़ता निर्माण केवल जमीन के इस्तेमाल का मामला नहीं है। पेड़ कटते हैं तो उसके साथ पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। वृक्ष वर्षा के पानी को जमीन में पहुंचाने, तापमान नियंत्रित करने, वायु गुणवत्ता सुधारने और मिट्टी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके हटने के बाद कंक्रीट की सतह बढ़ती है और प्राकृतिक जल निकासी बाधित होती है। इसका परिणाम अचानक आने वाली बाढ़, जलभराव, बढ़ती गर्मी और भविष्य के जलसंकट के रूप में सामने आ सकता है।

विडंबना यह है कि उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में विकास की बहस अभी भी अक्सर केवल सड़क की चौड़ाई, भवनों की ऊंचाई और जमीन के व्यावसायिक मूल्य के इर्द-गिर्द घूमती है। हमें यह समझना होगा कि जंगल कोई खाली जमीन नहीं हैं। वे हमारी जल सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा और भविष्य की अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं।

देहरादून के संदर्भ में एक और गंभीर प्रश्न है—क्या राजधानी बनने के बाद शहर का मास्टर प्लान उसकी प्राकृतिक क्षमता को ध्यान में रखकर बनाया गया या विकास की मांगों के अनुसार प्रकृति को लगातार समायोजित किया गया?

यदि किसी शहर की आबादी बढ़ती है तो नियोजित विकास आवश्यक है। लेकिन नियोजित विकास और अनियंत्रित विस्तार में अंतर होता है। पहला शहर को भविष्य के लिए तैयार करता है, दूसरा भविष्य की समस्याओं को जन्म देता है।

आरटीआई से सामने आया कथित 47 प्रतिशत का आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल पेड़ों की संख्या का सवाल नहीं है। यह इस बात की जांच का आधार बनना चाहिए कि पिछले 25 वर्षों में किस-किस परियोजना के लिए कितने पेड़ काटे गए, कितनी वन भूमि का उपयोग बदला, कितने प्रतिपूरक पौधे लगाए गए और उनमें से वास्तव में कितने पेड़ जीवित हैं।

सरकार को इन सवालों का जिला स्तर पर सार्वजनिक श्वेतपत्र जारी करना चाहिए। इसमें वन भूमि के डायवर्जन, पेड़ कटान, प्रतिपूरक वनीकरण, निर्माण परियोजनाओं और पर्यावरणीय स्वीकृतियों का पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।

क्योंकि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि विकास आवश्यक है।

विकास किसके लिए और किस कीमत पर—यह बताना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

देहरादून को बचाने का अर्थ विकास रोकना नहीं है। इसका अर्थ है विकास की परिभाषा बदलना। शहर के भीतर हर खाली जमीन को निर्माण योग्य भूखंड मानने की मानसिकता बदलनी होगी। पुराने पेड़ों को विकास की बाधा नहीं, बल्कि शहर की प्राकृतिक आधारभूत संरचना मानना होगा।

शहरी नियोजन में ‘ग्रीन बजट’ और ‘ट्री बजट’ जैसी अवधारणाओं को लागू किया जा सकता है। किसी परियोजना की लागत में केवल सड़क, भवन और पुल की कीमत नहीं, बल्कि पर्यावरणीय क्षति की वास्तविक लागत भी शामिल होनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात—प्रतिपूरक पौधरोपण को केवल कागज पर दर्ज संख्या नहीं, बल्कि जीवित वृक्षों के रूप में मापा जाना चाहिए। एक दशक पुराने पेड़ को काटकर दस छोटे पौधे लगा देना पर्यावरणीय क्षति की वास्तविक भरपाई नहीं है।

देहरादून आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अभी भी समय है कि शहर को ऐसी दिशा दी जाए जहां विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हों।

लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। प्रशासनिक पारदर्शिता चाहिए। नागरिक भागीदारी चाहिए। और सबसे बढ़कर यह स्वीकार करना होगा कि जंगल विकास की कीमत नहीं हैं। जंगल ही विकास की बुनियादी पूंजी हैं।

उत्तराखंड ने राज्य बनने के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। अगले 25 वर्षों के लिए हमें यह तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को हम कैसा देहरादून सौंपना चाहते हैं—ऐसा शहर जहां पहाड़, जंगल, नदियां और इंसान साथ रह सकें, या ऐसा शहर जहां हरियाली की तस्वीरें केवल पुराने एलबमों में बची हों।

यदि आज भी हमने चेतावनी को नजरअंदाज किया, तो अनूप नौटियाल की आशंका—“देहरादून सिर्फ एक कंक्रीट का जंगल बनकर रह जाएगा”—सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, आने वाले समय की वास्तविकता बन सकती है।

अब फैसला सरकार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को करना है—हमें विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो हमारे भविष्य को ही काटकर खड़ा किया जाए।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *