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PIB Delhi

गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रही महिलाओं के लिए आजीविका के अवसरों और समय पर मिलने वाली वित्तीय सहायता तक पहुंच, उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करने और अधिक सुरक्षित भविष्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

यह दर्शाते हुए कि आजीविका संबंधी सहायता किस प्रकार किसी परिवार को आर्थिक कठिनाइयों से उबरने में मदद कर सकती है। बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर स्थित ग्राम और पंचायत करणपुरा की 32 वर्षीय अनुसूचित जाति की महिला रूबी देवी का उदाहरण सामने आता है।

उन्होंने कक्षा 8 तक पढ़ाई की है और अब एक जनरल स्टोर चला रही हैं। सतत जीविकोपार्जन योजना (एसजेवाई) से जुड़ने से पहले रूबी दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करती थीं। वही उनके पति स्वर्गीय राम कृष्ण चौधरी ताड़ी बेचकर आजीविका कमाते थे।

वर्ष 2016 में रूबी के पति गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उचित इलाज के अभाव में उनका निधन हो गया। दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी और मायके से बहुत कम सहयोग मिलने के कारण रूबी को अकेले ही परिवार संभालना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई और दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया। बच्चों का पालन-पोषण और उनकी शिक्षा रूबी के लिए बड़ी चुनौती बन गई। आर्थिक तनाव और कठिन परिस्थितियों का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा।

रूबी के जीवन में बदलाव तब शुरू हुआ जब एसजेवाई अभियान के दौरान उनका चयन हुआ। संगम जीविका महिला ग्राम संगठन के माध्यम से उन्हें किराना दुकान स्थापित करने के लिए सहायता प्राप्त हुई।

व्यवसाय से संबंधित संपत्तियां प्राप्त करने से पहले उन्होंने व्यवसाय को चलाने और उसका प्रबंधन समझने के लिए तीन दिन की सी बी ई डी प्रशिक्षण लिया। शुरुआत में उन्हें प्रगति जीविका महिला ग्राम संगठन से एसआईएफ सहायता के रूप में ₹10,000 मिले। इसके बाद क्रय समिति के माध्यम से उन्हें किराना दुकान के लिए ₹20,000 और ₹27,000 की सहायता मिली। उन्हें सात महीने तक ₹1,000 प्रति माह की दर से कुल ₹7,000 की एलजीएफ सहायता भी मिली।  इससे उनके खाने संबंधी खर्चों में मदद हुई।

अपने व्यवसायिक कौशल को मजबूत करने के लिए रूबी ने तीन महीने के अंतराल पर तीन बार रिफ्रेशर प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। उन्हें पीएम-अजय योजना के अंतर्गत ₹17,000 की सहायता मिली। इससे उन्हें अपने व्यवसाय और आजीविका संबंधी गतिविधियों को और मजबूत तथा विस्तारित करने में मदद मिली। इसके अलावा उन्हें मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के अंतर्गत ₹10,000 की सहायता भी प्राप्त हुई।

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एसजेवाई से जुड़ने से पहले रूबी दिहाड़ी मजदूरी से केवल लगभग ₹2,000–₹3,000 प्रति माह कमाती थीं। आज वह अपने किराना और जनरल स्टोर व्यवसाय से लगभग ₹15,000–₹20,000 प्रति माह कमा रही हैं। वर्तमान में उनकी कुल संपत्तियों का मूल्य लगभग ₹1,45,640 है। योजना से जुड़ने से पहले उनका बैंक खाता भी नहीं था। आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ उनमें बचत की आदत विकसित हुई और उन्होंने शुरुआत में प्रतिदिन ₹10 बचाना शुरू किया।

रूबी की आजीविका में आए बदलाव ने उनके बच्चों की शिक्षा और भविष्य को भी बेहतर बनाया है। उनके दोनों बच्चे अब नियमित रूप से सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। इनमें से एक कक्षा 6 और दूसरा कक्षा 4 में पढ़ रहा है। पहले गरीबी के कारण उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने में कठिनाई होती थी। आज रूबी उनकी शिक्षा का खर्च उठाने में सक्षम हैं और उनकी इच्छा है कि भविष्य में उनके दोनों बच्चे सरकारी नौकरी प्राप्त करें।

रूबी कई सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और सेवाओं से भी जुड़ी हैं। इनमें राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड, गैस कनेक्शन, बिजली कनेक्शन, इंदिरा आवास, शौचालय योजना, नल जल योजना और बीमा संबंधी लाभ शामिल हैं। स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए वह नजदीकी सरकारी अस्पतालों में जाती हैं। संगम जीविका ग्राम संगठन से जुड़ने के कारण उन्हें सामाजिक और सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल होने का अवसर भी मिला है।

उनका बदलाव केवल आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं है। पहले उनके पति के पारंपरिक ताड़ी बेचने के व्यवसाय के कारण गांव में उनके परिवार को कम सम्मान की नजर से देखा जाता था। उन्हें अक्सर सामाजिक कार्यक्रमों या समारोहों में भी आमंत्रित नहीं किया जाता था। आज उनके सफल व्यवसाय, दृढ़ संकल्प और सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी ने उन्हें समाज में अधिक सम्मान दिलाया है। अब लोग उन्हें सम्मानपूर्वक “रूबी दीदी” कहकर संबोधित करते हैं और गांव के कार्यक्रमों में आमंत्रित करते हैं।

परिवार पर आर्थिक बोझ कम होने और आजीविका मजबूत होने के बाद रूबी अब अपनी किराना दुकान का विस्तार कर एक बड़ा और अधिक स्थिर व्यवसाय स्थापित करने की आकांक्षा रखती हैं। वह अपनी आजीविका को और मजबूत करने तथा परिवार के लिए बेहतर अवसर पैदा करने के लिए भविष्य में अतिरिक्त वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण प्राप्त करने की उम्मीद रखती हैं।

रूबी देवी की यात्रा—बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रही एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर ₹15,000–₹20,000 प्रति माह कमाने वाली आत्मविश्वासी जनरल स्टोर संचालक बनने तक—यह दर्शाती है कि समय पर मिलने वाली आजीविका सहायता, प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ाव महिलाओं को आर्थिक कठिनाइयों से उबरने, अधिक आत्मनिर्भर बनने तथा अपने समुदाय में गरिमा और सम्मान पुनः प्राप्त करने में मदद कर सकता है।


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By udaen

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