नियम जरूरी हैं, लेकिन दशकों से घर और दुकान साथ चलाने वालों की आजीविका भी कानून के दायरे में ही आती है
सुप्रीम कोर्ट का 22 सितंबर 2026 का आदेश देश में अनियोजित और स्वीकृत भूमि उपयोग के विपरीत होने वाली व्यावसायिक गतिविधियों पर प्रशासन की जिम्मेदारी को स्पष्ट करता है। जिन क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से केवल आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है और जहां व्यावसायिक उपयोग की अनुमति नहीं है, वहां नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई और सीलिंग को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है। साथ ही अदालत ने अधिकारियों को ‘पिक एंड चूज’ यानी चुनिंदा कार्रवाई से बचने की कड़ी हिदायत दी है।
लेकिन उत्तराखंड के संदर्भ में इस आदेश को केवल ‘आवासीय मकान में दुकान मिली तो सील कर दो’ के रूप में पढ़ना न तो कानून की पूरी तस्वीर है और न पहाड़ की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता।
उत्तराखंड के पुराने शहरों में घर और बाजार अलग-अलग नहीं, बल्कि कई जगह एक-दूसरे के साथ विकसित हुए हैं।
देहरादून की पुरानी बस्तियां हों, हरिद्वार के पुराने बाजार हों, ऋषिकेश की पर्यटन आधारित बस्तियां हों, हल्द्वानी का तेजी से फैला शहरी क्षेत्र हो या कोटद्वार जैसे शहर—कई जगह परिवार अपने घर के एक हिस्से से वर्षों से दुकान, कार्यालय या छोटा व्यवसाय चला रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या ऐसे सभी परिवारों को उसी श्रेणी में रखा जाएगा जिसमें बिना अनुमति के बनाया गया बड़ा व्यावसायिक भवन, गोदाम, होटल या ऐसा प्रतिष्ठान आता है जो आवासीय क्षेत्र की पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है?
जवाब ‘हां’ नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और क्या नहीं कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से केवल आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित क्षेत्रों में स्वीकृत उपयोग के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियों पर कार्रवाई की बात कही है। लेकिन जिस क्षेत्र का उपयोग स्पष्ट रूप से तय नहीं है या जहां मिश्रित उपयोग का प्रश्न बनता है, वहां अदालत ने फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।
इसलिए उत्तराखंड में किसी भी कार्रवाई से पहले सबसे पहला सवाल होना चाहिए—
क्या संबंधित क्षेत्र वास्तव में और वैधानिक रूप से केवल आवासीय है?
इसके बाद देखा जाना चाहिए कि भूखंड का स्वीकृत भूमि उपयोग क्या है, भवन का नक्शा क्या कहता है, संबंधित निकाय की अनुमति क्या है और वास्तविक गतिविधि किस प्रकृति की है।
उत्तराखंड की अपनी व्यवस्था भी बदल रही है
यह बहस ऐसे समय हो रही है जब उत्तराखंड सरकार ने 20 नवंबर 2025 को Unified Zoning Regulations जारी किए हैं। राज्य के आधिकारिक रिकॉर्ड में यह विनियम दर्ज है। इसके अलावा भूमि उपयोग परिवर्तन यानी CLU की प्रक्रिया को भी अलग से विनियमित किया गया है।
इसका अर्थ साफ है—उत्तराखंड में आने वाले समय में Land Use और भी महत्वपूर्ण होने वाला है।
लेकिन इसी के साथ सरकार को एक और प्रश्न का उत्तर देना होगा—
जो शहर आज दिखाई दे रहे हैं, वे बने कैसे?
कई पुराने बाजार उस समय विकसित हुए जब आज जैसे मास्टर प्लान, जोनिंग और भवन उपयोग की व्यवस्था या तो मौजूद नहीं थी या वर्तमान स्वरूप में लागू नहीं थी। परिवारों ने मकान बनाए, नीचे दुकानें खोलीं, बच्चों को रोजगार दिया और स्थानीय अर्थव्यवस्था खड़ी की।
आज केवल वर्तमान नक्शे की एक श्रेणी देखकर उस पूरी सामाजिक-आर्थिक यात्रा को अवैध घोषित कर देना समस्या को हल करने के बजाय नई समस्या पैदा कर सकता है।
कोटद्वार का सवाल
कोटद्वार जैसे शहर में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
पुराने आबादी वाले क्षेत्रों में अनेक परिवारों के लिए मकान केवल रहने की जगह नहीं है। उसी भवन का एक हिस्सा दुकान है, कहीं छोटा कार्यालय है, कहीं पारिवारिक व्यवसाय है। कई लोग इसी आय से बच्चों की शिक्षा, परिवार का खर्च और स्थानीय रोजगार चलाते हैं।
ऐसे में प्रशासन को कार्रवाई से पहले मोहल्लेवार सर्वेक्षण करना चाहिए।
कितने भवन वास्तव में आवासीय हैं?
कितने में छोटा पारिवारिक व्यवसाय है?
कितने में बड़े स्तर की व्यावसायिक गतिविधि है?
कितने भवनों में पार्किंग, यातायात, अग्नि सुरक्षा या पर्यावरण संबंधी गंभीर समस्या पैदा हो रही है?
और कितने मामले केवल भूमि उपयोग की तकनीकी विसंगति के हैं?
इन सवालों के जवाब के बिना सीलिंग न्यायसंगत प्रशासन नहीं, केवल प्रशासनिक कार्रवाई बनकर रह जाएगी।
देहरादून से ऋषिकेश तक एक जैसी नीति कैसे चलेगी?
देहरादून के पुराने शहर और नई नियोजित कॉलोनी की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हो सकतीं।
ऋषिकेश में पर्यटन के कारण आवासीय क्षेत्रों के आसपास होटल, होम-स्टे, योग केंद्र, कैफे और अन्य सेवाएं विकसित हुई हैं।
हरिद्वार में धार्मिक पर्यटन और स्थानीय बाजारों ने भूमि उपयोग का स्वरूप बदला है।
हल्द्वानी में तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने पुराने आवासीय क्षेत्रों को व्यापारिक गतिविधियों के करीब ला दिया है।
और पहाड़ के छोटे कस्बों में तो कई बार सड़क ही बाजार और बाजार ही आबादी है।
इसलिए एक ही डंडे से पूरे उत्तराखंड को हांकने की नीति व्यावहारिक नहीं होगी।
सरकार को ‘सीलिंग नीति’ नहीं, ‘शहरी संक्रमण नीति’ बनानी चाहिए
सरकार को अब तीन स्तर पर नीति बनानी चाहिए।
पहला—गंभीर अवैध व्यावसायिक उपयोग।
बड़े होटल, गोदाम, वर्कशॉप या ऐसे प्रतिष्ठान जो बिना अनुमति आवासीय क्षेत्र में संचालित हैं और जिनसे यातायात, अग्नि सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ता है—उन पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
दूसरा—दशकों पुराने छोटे कारोबार।
घर के हिस्से में चल रही दुकान, पारिवारिक कार्यालय, छोटा क्लिनिक या अन्य सीमित गतिविधियों के लिए नियमों के भीतर समाधान तलाशा जाए।
तीसरा—पुराने मिश्रित उपयोग वाले बाजार।
जहां वास्तविकता लंबे समय से Mixed Use की है, वहां सरकार को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो भूमि उपयोग परिवर्तन और निर्धारित शुल्क के माध्यम से वैधानिक रास्ता उपलब्ध कराया जा सकता है। उत्तराखंड का नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग स्वयं भूमि उपयोग परिवर्तन की व्यवस्था संचालित करता है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या कार्रवाई समान होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिक एंड चूज’ के खिलाफ विशेष रूप से चेताया है।
यही चेतावनी उत्तराखंड के प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
यदि किसी सड़क पर दस भवन समान प्रकार से व्यावसायिक उपयोग में हैं तो कार्रवाई का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए।
किसी प्रभावशाली व्यक्ति की संपत्ति बच जाए और छोटे दुकानदार की दुकान सील हो जाए—ऐसी धारणा भी कानून के शासन के लिए नुकसानदेह होगी।
कानून की असली ताकत उसकी समानता में है।
आजीविका भी संवैधानिक चिंता है
भारत का संविधान नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने और वैध आजीविका के अवसरों से जोड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी को नियम तोड़कर किसी भी भूमि का व्यावसायिक उपयोग करने का अधिकार मिल जाता है।
लेकिन इसका अर्थ यह जरूर है कि प्रशासन जब किसी व्यक्ति की आजीविका पर सीधा प्रभाव डालने वाली कार्रवाई करे तो वह कानून, प्रक्रिया, समानता और मानवीय परिणामों को नजरअंदाज न करे।
इसलिए जहां सुधार संभव है वहां सुधार का अवसर, जहां भूमि उपयोग परिवर्तन संभव है वहां वैधानिक प्रक्रिया और जहां गतिविधि वास्तव में प्रतिबंधित है वहां कानून का पालन—यही संतुलित रास्ता है।
उत्तराखंड को तय करना होगा—शहर सिर्फ नक्शे से बनेंगे या लोगों से भी?
उत्तराखंड आज अपने शहरी भविष्य के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है।
एक ओर अनियोजित निर्माण, अतिक्रमण और अवैध व्यावसायिक उपयोग को रोकना जरूरी है। दूसरी ओर छोटे व्यापार, स्वरोजगार और पुराने बाजारों को अचानक समाप्त करना भी सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा कर सकता है।
इसलिए सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अंधाधुंध सीलिंग अभियान के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के शहरों को व्यवस्थित करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
हर शहर का सर्वे हो।
हर पुराने बाजार का भूमि उपयोग स्पष्ट हो।
आवासीय, व्यावसायिक और मिश्रित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति सामने आए।
जहां नियम तोड़े गए हैं वहां कार्रवाई हो।
जहां नियमों में सुधार की गुंजाइश है वहां रास्ता निकले।
और जहां दशकों से लोगों की आजीविका जुड़ी है वहां बिना वैकल्पिक व्यवस्था के उनके जीवन पर बुलडोजर न चलाया जाए।
कानून का राज जरूरी है। लेकिन कानून का राज तभी मजबूत होगा जब कानून बड़े और छोटे—दोनों पर समान रूप से लागू हो।
उत्तराखंड को ऐसा शहर नहीं चाहिए जहां नक्शा तो बच जाए लेकिन आदमी उजड़ जाए।
उसे ऐसा शहर चाहिए जहां नियोजन भी हो, नियम भी हों, पर्यावरण भी बचे और मेहनत से चल रही छोटी दुकान भी बिना उचित प्रक्रिया के न उजड़े।
यही न्यायपूर्ण शहरी विकास की कसौटी है।
