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सुप्रीम कोर्ट का आदेश नियमों के पालन का रास्ता दिखाता है, लेकिन उत्तराखंड में दशकों से घर और दुकान साथ-साथ चलाने वालों की आजीविका का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है

आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश ने देशभर में नगर नियोजन और भूमि उपयोग के नियमों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जिन क्षेत्रों को केवल आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है, वहां स्वीकृत भूमि उपयोग के विपरीत व्यावसायिक गतिविधि पाए जाने पर कार्रवाई की जाए और अधिकारियों को चुनिंदा कार्रवाई यानी ‘पिक एंड चूज’ से बचना चाहिए।

लेकिन उत्तराखंड की जमीन पर इस आदेश को लागू करना उतना सरल नहीं है। यहां देहरादून से लेकर हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी, कोटद्वार और छोटे कस्बों तक अनेक ऐसे इलाके हैं जहां घर और कारोबार दशकों से साथ-साथ विकसित हुए हैं।

देहरादून इसका बड़ा उदाहरण है। शहर के विकास के साथ कई इलाकों में जिस भूमि का उपयोग कभी आवासीय था, वहां समय के साथ दुकानें, कार्यालय और अन्य गतिविधियां विकसित हुईं। सरकारी दस्तावेजों में भी देहरादून के मास्टर प्लान और वास्तविक भूमि उपयोग के बीच बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं।

ऐसे में यदि आज किसी पुराने मोहल्ले में घर के सामने किराने की दुकान, मेडिकल स्टोर, छोटा कार्यालय, क्लिनिक या अन्य पारिवारिक व्यवसाय चल रहा है, तो उसका मामला किसी नए बने बड़े व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स या गोदाम के समान नहीं माना जा सकता।

देहरादून में सवाल सिर्फ नक्शे का नहीं

देहरादून के पुराने आबादी वाले क्षेत्रों में कई परिवार पीढ़ियों से एक ही भवन में रह भी रहे हैं और वहीं से अपना छोटा कारोबार भी चला रहे हैं। शहर के विस्तार के साथ कई मुख्य सड़कों के आसपास आवासीय इलाके धीरे-धीरे व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र बन गए।

अब यदि ऐसे सभी प्रतिष्ठानों पर एक साथ सीलिंग की कार्रवाई होती है तो सवाल उठेगा कि क्या दशकों से बनी सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता को केवल मौजूदा नक्शे की एक श्रेणी से समाप्त किया जा सकता है?

यही वजह है कि प्रशासन को हर मामले में यह देखना होगा कि संबंधित भूखंड का स्वीकृत Land Use क्या है, भवन का नक्शा क्या कहता है और वहां किस प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि हो रही है।

ऋषिकेश और पर्यटन क्षेत्र की अलग चुनौती

ऋषिकेश में स्थिति और जटिल है। पर्यटन के कारण अनेक इलाकों में आवासीय भवनों के साथ होम-स्टे, छोटे कार्यालय, कैफे, योग केंद्र और अन्य सेवाएं विकसित हुई हैं।

लेकिन दूसरी ओर यदि किसी आवासीय कॉलोनी के बीच बड़ा व्यावसायिक भवन बनाया जा रहा है, पार्किंग की समस्या पैदा हो रही है या यातायात और अग्नि सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ रहा है, तो उसे केवल ‘पुराना कारोबार’ कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

यही अंतर नीति बनाने वालों को समझना होगा—छोटे पारिवारिक स्वरोजगार और बड़े अनधिकृत व्यावसायिक निर्माण को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

हरिद्वार में भी भूमि उपयोग का प्रश्न पुराना है

हरिद्वार में धार्मिक पर्यटन, आश्रम, होटल, धर्मशाला और व्यापार के विस्तार ने भूमि उपयोग को हमेशा जटिल बनाया है। सरकारी दस्तावेजों में हरिद्वार विकास क्षेत्र में आवासीय, व्यावसायिक, कार्यालय और अन्य भूमि उपयोग अलग-अलग दर्ज हैं।

इसलिए यहां भी सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि भवन में कारोबार हो रहा है या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि वह गतिविधि किस क्षेत्र में, किस स्वीकृति के आधार पर और किस पैमाने पर चल रही है।

उत्तराखंड ने खुद बदले हैं Land Use के नियम

यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड सरकार ने नवंबर 2025 में Unified Zoning Regulations जारी किए हैं। राज्य के आधिकारिक रिकॉर्ड में यह विनियमन दर्ज है।

नए नियमों के बाद केवल सड़क चौड़ी होने के आधार पर आवासीय भूखंड को व्यावसायिक उपयोग की अनुमति मिलने की पुरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं।

इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में उत्तराखंड के शहरों में Land Use का प्रश्न और महत्वपूर्ण होने वाला है।

लेकिन समाधान सिर्फ सीलिंग नहीं

सरकार को तीन अलग-अलग श्रेणियां बनानी चाहिए।

पहली—स्पष्ट और गंभीर उल्लंघन।
बिना अनुमति बड़े व्यावसायिक भवन, गोदाम, वर्कशॉप या ऐसी गतिविधियां जो यातायात, सुरक्षा और पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या पैदा करती हैं, उन पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो।

दूसरी—पुराने छोटे कारोबार।
जो परिवार दशकों से उसी भवन में रहते भी हैं और सीमित स्तर पर कारोबार भी करते हैं, उनके मामलों का अलग सर्वेक्षण हो। जहां नियम अनुमति दें वहां नियमितीकरण, उपयोग परिवर्तन या अन्य वैधानिक रास्ते तलाशे जाएं।

तीसरी—मिश्रित उपयोग वाले पुराने इलाके।
जहां वास्तविक स्थिति लंबे समय से आवासीय और व्यावसायिक दोनों तरह की है, वहां सरकार को स्पष्ट Mixed Use नीति बनानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे क्षेत्रों के संबंध में जहां उपयोग स्पष्ट रूप से केवल आवासीय या व्यावसायिक निर्धारित नहीं है, मिश्रित उपयोग के प्रश्न पर स्थिति स्पष्ट होने तक यथास्थिति बनाए रखने की बात कही है।

कोटद्वार जैसे शहरों के लिए संदेश

कोटद्वार, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और दूसरे पुराने कस्बों में समस्या और भी अलग है। कई बाजार स्वाभाविक रूप से घरों के आसपास विकसित हुए हैं। एक ही भवन में परिवार ऊपर रहता है और नीचे छोटी दुकान चलाता है।

यदि ऐसे हजारों छोटे कारोबार अचानक बंद होते हैं तो उसका असर केवल मकान मालिक पर नहीं पड़ेगा। स्थानीय कर्मचारी, ग्राहक, किरायेदार और पूरी बाजार व्यवस्था प्रभावित होगी।

इसलिए प्रशासन को कार्रवाई से पहले मोहल्लेवार सर्वेक्षण, भूमि उपयोग का सत्यापन और वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि का वर्गीकरण करना चाहिए।

कानून भी रहे, आजीविका भी

नगर नियोजन जरूरी है। आवासीय कॉलोनियों में बड़े होटल, गोदाम, वर्कशॉप या भारी यातायात पैदा करने वाले प्रतिष्ठान नहीं होने चाहिए। लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां छोटे कारोबार और स्वरोजगार स्थानीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं, हर दुकान को अतिक्रमण और हर कारोबारी को नियम तोड़ने वाला मान लेना भी उचित नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्रशासन को कानून लागू करने का अवसर देता है। लेकिन उत्तराखंड की सरकार के सामने उससे बड़ा काम है—पुराने बसे हुए इलाकों और नई शहरी व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना।

सरकार चाहे तो हर शहर में ऐसे क्षेत्रों की पहचान करे जहां वास्तविकता Mixed Use की है और उसके लिए स्पष्ट नियम बनाए। जहां कारोबार बंद करना जरूरी है, वहां वैकल्पिक व्यवस्था और उचित समय दिया जाए। जहां सुधार संभव है, वहां सुधार का अवसर मिले।

नियम टूटें तो कार्रवाई हो, लेकिन दशकों से बसे परिवारों की रोजी-रोटी को केवल एक सील की मार से खत्म करना समाधान नहीं हो सकता।

उत्तराखंड को ऐसा शहरी मॉडल चाहिए जिसमें नक्शे का कानून भी बचे, शहर की व्यवस्था भी सुधरे और छोटे आदमी की दुकान भी बिना वजह न उजड़े।

यही सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भावना और उत्तराखंड की जमीनी हकीकत के बीच सही संतुलन होगा।


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By udaen

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